अमेरिका के मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी की बड़ी जीत ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए राजनीतिक और नीतिगत चुनौतियां बढ़ा दी हैं। डेमोक्रेट्स ने अमेरिकी संसद के दोनों सदनों सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में अपना नियंत्रण हासिल कर लिया है। इससे ट्रंप प्रशासन की कई योजनाओं पर लगाम लग सकती है। टैरिफ, विदेश नीति, सरकारी खर्च और रूस से जुड़े प्रतिबंधों जैसे मुद्दों पर अब राष्ट्रपति को विपक्ष के कड़े सवालों का सामना करना पड़ सकता है।
अमेरिका में सत्ता के इस बदले समीकरण का असर सिर्फ वहां तक सीमित नहीं रहेगा। भारत के व्यापार, आईटी सेक्टर, फार्मा उद्योग, ऊर्जा आयात और शेयर बाजार पर भी इसका प्रभाव देखने को मिलेगा। हालांकि, ट्रंप के कमजोर होने से हर मामले में भारत को राहत मिलेगी, ऐसा नहीं है। कुछ क्षेत्रों में नए अवसर बन सकते हैं, तो कुछ में चुनौतियां बढ़ सकती हैं। आइए समझते हैं कि मध्यावधि चुनाव में ट्रंप के कमजोर होने का भारत पर क्या असर हो सकता है।
AI पर दबाब से भारतीय IT सेक्टर को मिलेगा फायदा
अमेरिका में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का तेजी से विस्तार हो रहा है। डेटा सेंटर, AI सर्वर और सेमीकंडक्टर कंपनियों में बड़े पैमाने पर निवेश किया जा रहा है। लेकिन अमेरिकी राजनीति में बदलाव से AI से जुड़ी कंपनियों के वैल्यूएशन में उतार-चढ़ाव आ सकता है। डेमोक्रेट्स पहले से ही एआई और डेटा सेंटर को लेकर विरोध करते हैं। डेटा सेंक्ट के कारण बढ़ती बिजली खपत और पानी की बर्बादी का मुद्दा उठाते रहे हैं।
ऐसे में माना जा रहा है कि डेमोक्रेट्स के मजबूत होने से AI कंपनियों के शेयरों में दबाव बढ़ेगा। इसकी शुरुआत हो गई है। गुरुवार को टेक हेवी इंडेक्स नैस्डेक में एआई और चिप से जुड़े स्टॉक्स में भारी बिकवाली के चलते 2.5 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हुआ है। यह बिकवाली जारी रह सकती है। इसका फायदा भारतीय आईटी कंपनियों को होगा। भारतीय आईटी कंपनियों के शेयरों में तेजी आ सकती है।
भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर क्या असर?
जानकारों का कहना है कि डेमोक्रेट्स के अमेरिकी कांग्रेस में मजबूत होने से भारत और अमेरिका के बीच व्यापार वार्ता में तत्काल बड़े बदलाव की संभावना कम है। इसकी वजह यह है कि अमेरिका में घरेलू उद्योगों और श्रमिकों को संरक्षण देने के मुद्दे पर दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों का रुख काफी हद तक समान है।
हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप के पास कुछ मौजूदा कानूनी प्रावधानों के तहत कांग्रेस की नई मंजूरी के बिना भी टैरिफ लगाने की शक्तियां हैं। हालांकि, अब प्रशासन की नीतियों पर संसदीय निगरानी और पूछताछ बढ़ सकती है। इससे ट्रंप टैरिफ को लेकर अब पहले जैसा डर नहीं दिखा पाएंगे। उनको अचानक टैरिफ बढ़ाने या व्यापार से जुड़े एकतरफा फैसले लेने में मुश्किलें आएंगी। यह भारत के लिए व्यापार वार्ता में बेहतर शर्तों पर बातचीत करने का अवसर बना सकता है।
H-1B वीजा और इमिग्रेशन पर क्या होगा असर?
अमेरिका में इमिग्रेशन नीति भारतीय पेशेवरों और आईटी कंपनियों के लिए अहम मुद्दा है। H-1B वीजा के जरिए बड़ी संख्या में भारतीय टेक्नोलॉजी प्रोफेशनल अमेरिका में काम करते हैं। लेकिन डेमोक्रेट्स के सत्ता में मजबूत होने से इमिग्रेशन नियमों में ढील मिलने की उम्मीद है। H-1B वीजा और हाई-स्किल्ड विदेशी कामगारों के प्रति डेमोक्रेटिक पार्टी का रुख नरम माना जाता है। कांग्रेस में डेमोक्रेटिक नियंत्रण होने से भारतीय आईटी पेशेवरों और छात्रों के लिए नियमों को अत्यधिक कठोर बनाने वाले विधेयकों को रोकना आसान होगा, जिससे अमेरिका जाने वाले प्रोफेशनल्स को थोड़ी राहत मिल सकती है।
कच्चे तेल की कीमतों में आएगी गिरावट
अमेरिकी चुनावों में डेमोक्रेट्स की जीत का एक बड़ा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी पड़ा है। कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के नीचे आ गई है। वहीं, ट्रंप के कमजोर होने से अगर पश्चिम एशिया में तनाव कम होता है और होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते तेल और गैस की आपूर्ति सामान्य होती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में और गिरावट आ सकती है।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक है। देश अपनी जरूरत का 88 फीसदी से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता होने से भारत को कई स्तरों पर फायदा मिल सकता है।
- देश का कच्चे तेल का आयात बिल घट सकता है।
- पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।
- महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
- तेल विपणन कंपनियों की वित्तीय स्थिति बेहतर हो सकती है।
- रुपये और चालू खाते के घाटे पर दबाव कम हो सकता है।
भारत हर साल करीब 1.8 से 2 अरब बैरल कच्चे तेल का आयात करता है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमत में प्रति बैरल 1 डॉलर की बढ़ोतरी से सालाना आयात बिल करीब 2 अरब डॉलर बढ़ सकता है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में मामूली बदलाव भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए काफी मायने रखता है।
रूस से सस्ता तेल खरीदना हो सकता है मुश्किल
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट भारत के लिए राहत की बात है, लेकिन रूस से तेल आयात को लेकर नई मुश्किलें पैदा हो सकती हैं। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए थे। इसके बाद रूस ने भारतीय रिफाइनरियों को रियायती कीमतों पर कच्चा तेल बेचना शुरू किया। भारत ने इस मौके का फायदा उठाया और रूस उसका सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया।
ट्रंप प्रशासन ने हाल के महीनों में रूस के साथ ऊर्जा कारोबार को लेकर कुछ नरम रुख दिखाया है। लेकिन कांग्रेस में डेमोक्रेट्स का नियंत्रण बढ़ने से रूस के खिलाफ प्रतिबंधों को लेकर दबाव बढ़ सकता है। डेमोक्रेट्स रूस की तेल कंपनियों, बैंकों और शिपिंग नेटवर्क पर सख्त प्रतिबंध लगाने की मांग कर सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो भारतीय रिफाइनरियों के लिए रूसी तेल का भुगतान करना, टैंकरों की व्यवस्था करना और बीमा हासिल करना मुश्किल हो सकता है।
भारत पर अमेरिकी चुनाव का असर
बदलाव भारत के लिए अवसर और चुनौतियां दोनों लाया
अमेरिकी कांग्रेस में डेमोक्रेट्स की मजबूत स्थिति भारत के लिए अवसर और चुनौतियां दोनों लेकर आई है। AI और वैश्विक निवेश में बदलाव से भारतीय बाजार को फायदा मिलने की संभावना है। H-1B वीजा, इमिग्रेशन, फार्मा, टेक्सटाइल और दूसरे निर्यात क्षेत्रों को अमेरिकी नीति में स्थिरता से राहत मिल सकती है। तेल के मामले में तस्वीर थोड़ी जटिल है। अगर रूस पर अमेरिकी प्रतिबंध सख्त हुए तो भारतीय रिफाइनरियों के लिए रूसी तेल खरीदना महंगा और मुश्किल हो सकता है।
कुल मिलाकर, अमेरिका में बदला राजनीतिक समीकरण भारत के लिए सिर्फ राहत की खबर नहीं है। आने वाले महीनों में AI निवेश, व्यापार समझौते, वीजा नियम और ऊर्जा सुरक्षा पर अमेरिकी नीतियों का रुख भारत के आर्थिक हितों को प्रभावित कर सकते हैं।
