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देश में 'यो-यो' मानसून से गहराता संकट, खेती और बिजली सप्लाई दोनों खतरे में, समझें कैसे?

'यो-यो' मानसून (Yo-Yo Monsoon) इस समय भारत के लिए एक बड़ा सिरदर्द बना हुआ है। ‘यो-यो मानसून’ का मतलब सिर्फ असमान्य बारिश से नहीं है। यह उस बदलते मौसम पैटर्न की ओर इशारा है, जिसमें मूसलाधार बारिश और लंबे सूखे के चलते कई संकट एक साथ पैदा हो रहे हैं। अगर यह पैटर्न आगे भी रहा, तो भारत की खेती, बिजली व्यवस्था, खाद्य महंगाई और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संभालना मुश्किल होगा।

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मानसून संकट
Authored by: Alok Kumar
Updated Jul 21, 2026, 13:09 IST
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भारत में मानसून की बारिश का पैटर्न शक्तिशाली अल नीनो और ग्लोबल वार्मिंग की वजह से लगातार बदल रहा है। इससे मौसम का मिजाज अनिश्चित हो गया है, जिससे खेती-किसानी पर बुरा असर पड़ने और पावर ग्रिड पर दबाव बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है। बता दें कि इस साल जून महीने में समान्य से 40% कम बारिश हुई। वहीं, जुलाई महीने की शुरुआत में मुंबई समेत देश के कई हिस्सों में अचानक भारी बारिश हुई, जिससे पूरी व्यवस्था चरमरा गई। यह 'यो-यो' मानसून (Yo-Yo Monsoon) पैटर्न के कारण हुआ है। आइए समझते हैं कि 'यो-यो' मानसून किस तरह खेती से लेकर पावर ग्रिड के लिए संकट खड़ा कर रहा है।

क्या है ‘यो-यो मानसून’?

आमतौर पर मानसून के दौरान बारिश कुछ दिनों या हफ्तों में अपेक्षाकृत लगातार होती है। किसान इसी आधार पर बुवाई, सिंचाई और फसल की देखभाल का कैलेंडर तैयार करते हैं। लेकिन ‘यो-यो मानसून’ में ऐसा नहीं होता है। इस पैटर्न में-

पहले: बारिश में लंबा ब्रेक

फिर: अचानक तेज बारिश

इसके बाद: दोबारा सूखा दौर

और फिर: कम समय में भारी बारिश

इसमें कुल बारिश का आंकड़ा ही पूरी कहानी नहीं बताता। असली समस्या यह है कि बारिश कब, कितनी और कितने दिनों में होती है। अगर पूरे महीने की बारिश कुछ ही दिनों में हो जाए और बाकी समय सूखा रहे, तो सालाना आंकड़ा सामान्य दिख सकता है, लेकिन किसान और जल संसाधन दोनों संकट में आ जाते हैं।

‘यो-यो मानसून’ भारत के लिए कैसे बड़ा खतरा?

देश की लगभग आधी खेती योग्य जमीन सिंचाई के लिए अभी भी बारिश पर निर्भर है, ‘यो-यो मानसून’ पैटर्न फसलों की बुवाई में बाधा डाल रहे हैं, जिससे ग्रामीण आय खतरे में पड़ रही है और खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ने का जोखिम पैदा हो रहा है। साथ ही, मानसून में अचानक आने वाले ठहराव की वजह से शहरी इलाकों में उमस बढ़ रही है, जिससे ठंडक के लिए बिजली की मांग बढ़ रही है।

किसानों के लिए ‘यो-यो मानसून’ क्यों बना काल?

बिगड़ता है बुवाई का कैलेंडर: किसानों के लिए ‘यो-यो मानसून’ सबसे बड़ा खतरा बन गया है। किसान आमतौर पर पहली अच्छी बारिश के बाद खेत तैयार कर बुवाई शुरू करते हैं। लेकिन अगर शुरुआती बारिश के बाद लंबा सूखा पड़ जाए, तो बीज अंकुरित होने के बाद पौधों को पर्याप्त नमी नहीं मिलती। इससे फसलों की बुवाई पर बहुत ही बुरा असर पड़ता है। वहीं, दूसरी ओर, अगर किसान बारिश का इंतजार करते रहें और अचानक बहुत तेज बारिश हो जाए, तो खेतों में पानी भर सकता है। इससे बुवाई में देरी होती है।

भारी बारिश से नुकसान: मान लीजिए किसी इलाके में पूरे महीने में 300 मिलीमीटर बारिश होनी थी। अगर यह बारिश 20-25 दिनों में धीरे-धीरे होती है, तो खेती के लिए यह काफी उपयोगी हो सकती है। लेकिन अगर वही 300 मिलीमीटर बारिश सिर्फ 3-4 दिनों में हो जाए और अगले 20 दिन बारिश न हो, तो किसानों पर बहुत ही बुरा असर होता है। अत्यधिक बारिश के दौरान खेतों में पानी भर जाता है, जिससे नई बोई गई फसलें खराब होने का खतरा बढ़ जाता है।

ग्रामीण आय पर बुरा असर: ‘यो-यो मानसून’ पैटर्न का सबसे बुरा असर फसलों के उत्पादन पर होता है। असमान्य बारिश के चतले फसलों की बुवाई नहीं हो पाती है। अगर कहीं होती है तो बाद में सूखे के कारण पैदावार घट जाती है। बता दें कि आज भी देश की लगभग आधी खेती योग्य जमीन सिंचाई के लिए मानूसनी बारिश पर निर्भर है। फसलों के उत्पादन घटने से किसानों की आय प्रभावित होती है। इससे ग्रीमीण आय पर बुरा असर होता है। इतना ही नहीं, खाने-पीने के सामान भी महंगे होते हैं, जिससे महंगाई बढ़ती है।

असमान्य बारिश के कारण बढ़ी बिजली की मांग

दक्षिण भारत के बेंगलुरु में पिछले हफ्ते 112 सालों में जुलाई का सबसे गर्म दिन दर्ज किया गया। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने चेतावनी दी है कि कई इलाकों में दिन का तापमान सामान्य से लगभग 3°C से 5°C ज्यादा रहा। यह असमान्य बारिश के कारण हुआ। अगर मानसून में ज्यादा ब्रेक (बारिश में रुकावट) होते हैं, तो ज्यादा गर्म दौर भी आते हैं। अल नीनो इफेक्ट यही करा रहा है। इसके चतले बहुत ज्यादा सक्रिय मौसम सिस्टम है जो लंबे समय के सामान्य पूर्वानुमानों को गलत साबित कर रहा है। इससे देशभर में बिजली की मांग बढ़ रही है। यह पावर ग्रिड पर दबाब बढ़ा रहा है।

मानसून का बदलता पैटर्न

मानसून का बदलता पैटर्न

बिजली सप्लाई पर कैसे पड़ता है असर?

आम तौर पर माना जाता है कि मानसून की दस्तक के साथ ही बिजली की खपत घट जाती है, लेकिन 'यो-यो मानसून' का अनिश्चित पैटर्न ऐसा नहीं होने देता है। 'यो-यो मानसून' के दौरान जब बारिश में लंबा ब्रेक आता है, तो भीषण गर्मी और उमस के कारण एसी, कूलर और सिंचाई पंपों का इस्तेमाल अचानक बढ़ जाता है, जिससे पीक पावर डिमांड रिकॉर्ड स्तर (हाल के वर्षों में 270 से 280 GW तक) को छूने लगती है। दूसरी ओर, जब अति-बारिश का दौर शुरू होता है, तो जलाशयों में पानी की अनियंत्रित आवक से जलविद्युत (हाइड्रोपावर) प्रबंधन कठिन हो जाता है और अचानक अत्यधिक पानी आने पर बांधों के फाटक खोलने पड़ते हैं, जिससे बाढ़ का जोखिम भी पैदा हो जाता है।

बिजली क्षेत्र के लिए यह दोहरी चुनौती का रूप ले लेता है, जहां एक तरफ बारिश के लंबे सूखे से मांग में अप्रत्याशित उछाल आता है, वहीं दूसरी तरफ मूसलाधार बारिश सप्लाई नेटवर्क की कमर तोड़ देती है। तेज आंधी, बाढ़ और भूस्खलन के कारण ट्रांसमिशन लाइनें, बिजली के पोल और सब-स्टेशन क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, जिससे ग्रिड का संतुलन बनाए रखना और निर्बाध सप्लाई देना बेहद मुश्किल हो जाता है। यानी 'यो-यो मानसून' में न केवल सूखा पावर ग्रिड की परीक्षा लेता है, बल्कि अत्यधिक बारिश भी वितरण इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए भारी संकट खड़ी कर देती है।

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