Times Now Navbharat
live-tv
Premium

BRICS की ताकत से बदलेगा ग्लोबल गेम! समझें ट्रेड, करेंसी और कूटनीति में भारत का गेमप्लान

11 से 13 सितंबर 2026 के बीच राष्ट्रीय राजधानी का भारत मंडपम में 18वां BRICS शिखर सम्मेलन का आयोजन होगा। दुनिया में भारत के बढ़ते दबदबे के बीच इस समिट पर पूरी दुनिया की नजर है।

Image
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026
Authored by: आलोक कुमार
Updated Sep 8, 2026, 15:01 IST
Follow on Google News

BRICS Summit 2026: 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी के लिए नई दिल्ली पूरी तरह तैयार है। 11 से 13 सितंबर के बीच भारत मंडपम में होने वाली इस बैठक के लिए राष्ट्रीय राजधानी को दुल्हन की तरह सजाया जा रहा है। इस बार का BRICS समिट कई मायनों में खास है। BRICS अपनी स्थापना के 20 साल पूरे कर रहा है और ऐसे समय में यह सम्मेलन हो रहा है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीतियों और मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव व तेल संकट के बीच पूरी दुनिया आर्थिक अनिश्चितता से जूझ रही है।

ऐसे में 11 देशों वाले इस विस्तारित BRICS समूह पर वैश्विक अर्थव्यवस्था की नजरें टिकी हैं। पश्चिमी और अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती देने, लोकल करेंसी में व्यापार बढ़ाने और नई कूटनीतिक लाइन तय करने के मोर्चे पर यह सम्मेलन भारत के लिए एक बड़ा 'गेम-चेंजर' साबित हो सकता है। आइए समझते हैं कि कैसे यह सम्मेलन भारत की वैश्विक छवि को मजबूत करने और उसके आर्थिक हितों को सुरक्षित करने का सबसे बड़ा मौका बनकर आया है।

ब्रिक्स बनाम G7: आंकड़ों के नजरिए से समझें

दुनियाभर की नजर ब्रिक्स देशों पर क्यों है, आइए इसको समझते हैं। साल 2000 में, परचेजिंग पावर पैरिटी (PPP) के आधार पर ब्राजील, रूस, भारत और चीन की संयुक्त हिस्सेदारी वैश्विक GDP का लगभग 23% थी, जबकि G7 की हिस्सेदारी लगभग 52% थी। 2024 तक स्थिति उलट गई है। 11 सदस्यों वाले विस्तारित ब्रिक्स की हिस्सेदारी वैश्विक GDP (PPP) का लगभग 36.8% हो गई, जबकि G7 की हिस्सेदारी 29% से भी कम हो गई।

BRICS अब दुनिया के कुल व्यापार का लगभग एक-चौथाई हिस्सा है। 2024 में BRICS देशों के बीच सामान का व्यापार 1.17 खरब डॉलर तक पहुंच गया, जो दो दशकों में 84 अरब डॉलर से लगभग 13 गुना ज्यादा है। इस समूह के पास कुल मिलाकर करीब 5.2 खरब डॉलर का विदेशी रिजर्व है और यह दुनिया के कुल मिनरल कोल (खनिज कोयले) उत्पादन का 78.2% हिस्सा है। विकास की बात करें तो, BRICS देशों की औसत विकास दर 2025 में 3.8% और 2026 में 3.7% रहने का अनुमान है, जो G7 के औसत से तीन गुना से भी ज्यादा है। ब्रिक्स ने काफी समय में अमेरिका समेत पश्चिमी देशों को अपनी ताकत का अहसास करा दिया है। इस हनक से अमेरिका समेत यूरोपीय देश डरे हुए हैं।

अमेरिकी को कैसे मिल रही चुनौती?

अमेरिकी टैरिफ की मार झेल रहे देशों के लिए BRICS एक सुरक्षा कवच बनता जा रहा है। वैश्विक जीडीपी का लगभग 39% और अंतरराष्ट्रीय व्यापार का 23% हिस्सा कवर करने वाला यह समूह अब पश्चिमी बाजारों पर अपनी निर्भरता कम कर आपस में व्यापार बढ़ाने (Intra-BRICS Trade) पर जोर दे रहा है। भारत के लिए यह अपनी मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज सेक्टर को नए बाजारों तक पहुंचाने का सबसे बड़ा मौका है।

भारत के पास क्या हैं बड़े मौके?

ऊर्जा सुरक्षा: रूस और ईरान जैसे तेल उत्पादक देशों के साथ सीधे संवाद के जरिए भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और कच्चे तेल की कीमतों को स्थिर रखने का रास्ता निकाल सकता है।

चीन के साथ सीमा तनाव का समाधान: सम्मेलन के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारतीय नेतृत्व के बीच होने वाली द्विपक्षीय बातचीत से दोनों देशों के बीच व्यापार और कूटनीतिक बर्फ पिघलने की उम्मीद जताई जा रही है।

ग्लोबल सप्लाई चेन का नया केंद्र: पश्चिम और चीन के बीच जारी ट्रेड-वॉर के बीच भारत BRICS देशों के लिए सप्लाई चेन का सबसे भरोसेमंद विकल्प ( बनकर उभर सकता है।

भारत की सभी से तालमेल बिठाने की कोशिश

BRICS में भारत की भागीदारी उसकी 'मल्टी-अलाइनमेंट' (कई देशों के साथ तालमेल बिठाने) की व्यापक रणनीति को दिखाती है। नई दिल्ली किसी गठबंधन की शर्तों से बंधे बिना एक ही समय में BRICS, G20, Quad और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में हिस्सा लेती है। BRICS का उदय भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक तालमेल के शुरुआती दौर में हुआ था। भारत की 'मल्टी-अलाइनमेंट' की नीति का मकसद अलग-अलग ताकतवर गुटों में से किसी एक को चुनना नहीं, बल्कि अपने लिए काम करने की गुंजाइश बनाना रहा है।

BRICS को लेकर चीन-रूस क्यों आक्रामक?

चीन और रूस लगातार BRICS को पश्चिमी देशों के दबदबे के मुकाबले एक ताकत के तौर पर पेश करते हैं। वे इसे अमेरिका के नेतृत्व वाली संस्थाओं और डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देने वाले मंच के तौर पर देखते हैं। बीजिंग ने इस गुट के विस्तार को आगे बढ़ाया है। वह बड़े BRICS को 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) का नेतृत्व करने और पश्चिमी देशों के प्रभाव को सीमित करने के जरिया मानता है। वहीं, SWIFT से बाहर किए जाने और कड़े प्रतिबंधों का सामना कर रहे मॉस्को के लिए BRICS एक अहम आर्थिक जीवनरेखा है।

इसके उलट, भारत और ब्राजील BRICS को मुख्य रूप से एक आर्थिक और सुधार-उन्मुख समूह के तौर पर देखते हैं। भारत पश्चिमी देशों का विरोध करने के उस उत्साह में शामिल नहीं है जो व्यवस्था को बदलने की चाहत रखने वालों में दिखता है।

क्या पश्चिमी देश ब्रिक्स को खतरा मान रहे?

तुरंत नहीं! पश्चिमी देश ब्रिक्स को मौजूदा तरराष्ट्रीय व्यवस्था के तत्काल विकल्प के तौर पर नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक शक्ति के बंटवारे को धीरे-धीरे बदलने में सक्षम एक मंच के तौर पर देखते हैं। हां, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नजरिया बिल्कुल अलग है। उन्होंने धमकी दिया था कि अगर ब्रिक्स देश कोई नई मुद्रा बनाई या अमेरिकी डॉलर की जगह किसी दूसरी मुद्रा का समर्थन किया, तो वे उन पर 100% टैरिफ लगा देंगे। इन धमकियों का असर हुआ और ब्रिक्स की एक साझा मुद्रा का विचार काफी हद तक ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

इसके बजाय, ब्रिक्स सदस्य राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार के द्विपक्षीय निपटान की ओर बढ़े हैं, जो एक ज़्यादा व्यावहारिक और विकेंद्रीकृत तरीका है। रूस और चीन अब अपने द्विपक्षीय व्यापार का 90% से ज्यादा हिस्सा रूबल और युआन में निपटाते हैं। रूस और भारत ने अपने प्रत्यक्ष भुगतान का लगभग 90% हिस्सा राष्ट्रीय मुद्राओं में स्थानांतरित कर लिया है, जिसे भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अधिकृत 'स्पेशल रुपया वोस्ट्रो अकाउंट्स' के जरिए आसान बनाया गया है।

भारत और यूएई जुलाई 2023 से रुपया-दिरहम स्थानीय मुद्रा निपटान प्रणाली का संचालन कर रहे हैं, जबकि भारत और इंडोनेशिया ने जुलाई 2026 में रुपया-रुपिया निपटान ढांचा शुरू किया। स्थानीय मुद्रा में व्यापार साल-दर-साल 163% बढ़कर 2026 के शुरुआती दो महीनों में ही 8.45 अरब डॉलर तक पहुंच गया।

ब्रिक्स में भारत की रणनीति

ब्रिक्स में भारत की रणनीति

क्या डॉलर का दबदबा होगा खत्म?

इस बार दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स समिट में BRICS Pay सिस्टम को लॉन्च होने की संभावना है। यह सिस्टम अलग-अलग देशों के पेमेंट नेटवर्क—जैसे रूस का SPFS, चीन का CIPS, भारत का UPI और ब्राजरल का Pix—को आपस में जोड़ेगा। इससे सदस्य देश डॉलर कॉरेस्पोंडेंट बैंकों के जरिए लेन-देन किए बिना आपस में व्यापार का निपटान कर सकेंगे।

यह एक तरह से पिछले दरवाजे से 'डी-डॉलरलाइजेशन' (डॉलर पर निर्भरता कम करना) की कोशिश है। भारत का नजरिया किसी एक सुपरनैशनल करेंसी (कई देशों की साझा मुद्रा) के बजाय इंटरऑपरेबल सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) को बढ़ावा देने का रहा है। यह रुख UPI की सफलता से बनी भारत की डिजिटल पेमेंट सोच को दिखाता है। फिर भी, कुछ सीमाएं हैं, ग्लोबल सेंट्रल बैंक रिज़र्व में डॉलर की हिस्सेदारी अभी भी 57.13% (Q1 2026) है, और BRICS का कोई भी सदस्य देश बड़े पैमाने पर रुपया, युआन या रैंड का रिज़र्व नहीं बना रहा है।

End of Article