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BRICS का लोकल करेंसी में बढ़ता कारोबार, डॉलर के दबदबे को चुनौती या बचाव?

BRICS को आज पूरी दुनिया अमेरिकी नेतृत्व वाले G7 के अल्टरनेटिव के तौर पर देख रही है। G7 ग्लोबल इकोनॉमी पर वर्चस्व रखने वाली 7 बड़ी इकोनॉमी वाले देश हैं।

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डॉलर को चुनौती
Authored by: यतींद्र लवानिया
Updated Sep 10, 2026, 15:40 IST
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BRICS Vs USD : अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत उसकी घातक सैन्य क्षमता नहीं, बल्कि दुनिया का डॉलर में कारोबार करना है। US Dollar पूरी दुनिया में आज ग्लोबल ट्रेड में इस्तेमाल होने वाली सबसे बड़ी मुद्रा है। JP Morgan की "डी-डॉलराइजेशन: इज द यूएस डॉलर लूजिंग इट्स डोमिनेंस?" रिसर्च के मुताबिक अमेरिकी डॉलर आज भी फॉरेन एक्सचेंज ट्रांजैक्शन () में करीब 90% हिस्सेदारी रखता है।

इसी रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि डॉलर धीरे-धीरे अपनी ताकत खो रहा है। लेकिन, फिर भी आज दुनिया में दूसरी कोई ऐसी मुद्रा नहीं है, जो आने वाले दशकों में भी डॉलर को पूरी तरह रिप्लेस कर सके। डॉलर को सबसे ज्यादा चुनौती फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व के मोर्चे पर मिल रही है। 2021 से अब तक इसमें डॉलर की हिस्सेदारी 2 फीसदी से ज्यादा घट गई है।

अब भी कायम है डॉलर का दबदबा

अब भी कायम है डॉलर का दबदबा

BRICS को क्यों माना जा रहा डॉलर के लिए चुनौती?

BRICS दुनिया की सबसे बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं का संगठन है। इसमें भारत, रूस, चीन, ब्राजील और साउथ अफ्रीका के साथ कुल 11 सदस्य देश हैं, जो दुनिया की करीब 40% GDP, 50% Population और 36% जमीन रखते हैं। इसके अलावा ग्लोबल ट्रेड में ब्रिक्स की हिस्सेदारी करीब 25% है। असल में यही डॉलर के लिए सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि इन देशों का वैश्विक आर्थिक प्रभाव डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देने में सक्षम है। ये देश लगातार अपना ट्रेड लोकल करेंसी में बढ़ा रहे हैं। यहां तक कि SCO और BRICS की अपनी करेंसी की बात भी हो रही है। यही वजह है कि BRICS को डी-डॉलराइजेशन की शुरुआत माना जा रहा है।

BRICS करेंसी पर क्या है भारत की स्थिति?

भारत डी-डॉलराइजेशन का झंडाबरदार बनने के बजाय रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण और BRICS के भीतर वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था मजबूत करना चाहता है। 2024 में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी स्पष्ट किया है कि भारत की ऐसी कोई नीति नहीं है और BRICS के भीतर भी डॉलर को लेकर एक जैसी राय नहीं है।

BRICS का लोकल करेंसी में कारोबार

BRICS देशों ने स्थानीय मुद्रा कारोबार को बढ़ाने के लिए मोटे तौर पर तीन दिशाओं में काम शुरू किया है। द्विपक्षीय मुद्रा निपटान, वैकल्पिक भुगतान नेटवर्क और बहुपक्षीय वित्तीय संस्थानों की भूमिका बढ़ाना। रूस-चीन व्यापार इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। आपके स्रोत के मुताबिक दोनों देशों के बीच 90% से ज्यादा कारोबार अब युआन और रूबल में हो रहा है। भारत और रूस ने भी रुपये में व्यापार निपटान का रास्ता अपनाया था, खासकर रूस से कच्चे तेल की खरीद के मामले में। BRICS के आंतरिक व्यापार का 25% से ज्यादा हिस्सा अब स्थानीय मुद्राओं में निपटाया जा रहा है।

अब तक क्या कदम उठाए गए?

चीन का CIPS और रूस का SPFS जैसे वैकल्पिक वित्तीय नेटवर्क पश्चिमी सिस्टम पर निर्भरता कम करने की कोशिश हैं। 2024 के कजान BRICS Summit में BRICS Bridge और BRICS Pay जैसे प्रस्तावों पर भी चर्चा हुई थी। 2026 में भारत की BRICS अध्यक्षता के दौरान राष्ट्रीय मुद्राओं में सीमा-पार लेनदेन और New Development Bank की भूमिका अहम वित्तीय एजेंडे में शामिल हैं।

डॉलर और स्विफ्ट के मुकाबले अब तक ब्रिक्स की तैयारी

डॉलर और स्विफ्ट के मुकाबले अब तक ब्रिक्स की तैयारी

क्या है सबसे बड़ी मुश्किल?

स्थानीय मुद्रा में व्यापार सुनने में आसान लगता है। एक देश अपनी करेंसी में भुगतान करे और दूसरा अपनी करेंसी में। दिक्कत तब आती है जब दोनों देशों के बीच व्यापार संतुलित नहीं होता। भारत-रूस कारोबार इसका उदाहरण है। रूस से भारत ने बड़ी मात्रा में तेल खरीदा, लेकिन रूस के लिए भारत से उतने ही पैमाने पर सामान खरीदना संभव नहीं था। नतीजा यह हुआ कि रूसी बैंकों के वोस्ट्रो खातों में रुपये जमा होते गए। रिसर्च नोट्स के मुताबिक भारत ने रूसी बैंकों को इन फंड्स को भारतीय ट्रेजरी बिल और सरकारी प्रतिभूतियों में लगाने की अनुमति भी दी, लेकिन रुपये की सीमित परिवर्तनीयता के कारण पैसा रूस के लिए उतना उपयोगी नहीं था।

करेंसी बदली कितना असान?

डॉलर को दुनिया भर में आसानी से खरीदा-बेचा जा सकता है। इसके उलट कई BRICS मुद्राओं पर पूंजी नियंत्रण या दूसरे नियामकीय प्रतिबंध हैं। चीन का युआन इसका प्रमुख उदाहरण है। चीन में पूंजी खाते पर नियंत्रण और एक्सचेंज रेट के सरकारी प्रबंधन की वजह से युआन की वैश्विक भूमिका बढ़ने के बावजूद उसकी स्वीकार्यता डॉलर के स्तर तक नहीं पहुंची है। यही कारण है कि किसी देश के लिए सिर्फ यह कहना पर्याप्त नहीं कि वह डॉलर छोड़कर युआन, रुपया या रूबल में व्यापार करेगा। सवाल यह भी है कि जमा हुई उस करेंसी को बाद में वह कहां और कितनी आसानी से इस्तेमाल कर सकता है।

क्या है लोकल करेंसी ट्रेड की सीमा?

मान लीजिए किसी BRICS देश के पास अरबों डॉलर के बराबर किसी दूसरी BRICS करेंसी का ट्रेड सरप्लस आ गया। उसे इस पैसे को किसी सुरक्षित और लिक्विड परिसंपत्ति में रखना होगा। अमेरिका के पास इसके लिए विशाल Treasury market है। विदेशी केंद्रीय बैंक और संस्थाएं अमेरिकी सरकारी बॉन्ड में बड़ी रकम पार्क कर सकती हैं। BRICS देशों में वैसा कोई एकीकृत और गहरा बाजार फिलहाल मौजूद नहीं है। इसी को स्थानीय करेंसी व्यवस्था की एक बड़ी संरचनात्मक सीमा बताते हैं। यही वह हिस्सा है, जहां डॉलर को चुनौती देना सबसे मुश्किल हो जाता है। मुद्रा सिर्फ भुगतान का माध्यम नहीं होती; वह बचत और निवेश की परिसंपत्ति भी होती है।

डॉलर के मुकाबले ब्रिक्स के सामने कई चुनौतियां

डॉलर के मुकाबले ब्रिक्स के सामने कई चुनौतियां

क्यों भरोसे का संकट बड़ी चुनौती?

BRICS में भारत और चीन दो बड़े सदस्य हैं। दोनों देशों के बीच भारी व्यापार असंतुलन है। इसके अलावा दोनों देशों के बीच सीमा विवाद भी है। ऐसे में BRICS करेंसी या किसी एक देश की करेंसी में ब्रिक्स का ट्रेड भरोसे का संकट भी खड़ा करता है। मसलन, जिस तरह अमेरिका अभी दुनिया में मनमाने तरीके से डॉलर में ट्रेड बैन कर किसी भी देश की इकोनॉमी को मसल देता है। अगर ऐसी ही स्थिति में BRICS में बनी, तो फिर क्या होगा, इस सवाल का जवाब अब भी नहीं मिल रहा है। यही वजह है कि साझा BRICS करेंसी का विचार अभी बेहद दूर की चीज नजर आता है।

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