दुनियाभर के बाजारों के लिए 30 अप्रैल का दिन बड़ी हलचल लेकर आया है। कच्चे तेल (Crude Oil) की अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क, ब्रेंट क्रूड (Brent) की कीमतें अचानक उछलकर 120 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। तेल की कीमतों में यह तेजी मामूली नहीं है, बल्कि इसने पिछले कई महीनों के रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। इस उछाल के पीछे सबसे बड़ा कारण अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता Geopolitical Tensions है। खाड़ी देशों में युद्ध जैसी स्थिति बनने और सप्लाई चेन बाधित होने के डर ने निवेशकों और तेल कंपनियों के बीच अफरा-तफरी का माहौल पैदा कर दिया है। कच्चा तेल महंगा होने से तेल कंपनियों को भारी नुकसान हो रहा है। इसलिए अब पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ सकते हैं। हालांकि सरकार की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं है।
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर है, जहां दोनों देश अपनी शर्तों पर अड़े हुए हैं। ईरान पीछे हटने को तैयार नहीं है और ट्रंप प्रशासन ब्लॉकेड हटाने के पक्ष में नहीं दिख रहा। इस बीच, फेड रिजर्व ने ब्याज दरों को 3.5% से 3.75% के बीच स्थिर रखा है। साथ ही, यूएई द्वारा OPEC और OPEC+ छोड़ने के संकेतों ने बाजार में अनिश्चितता बढ़ा दी है। इन वैश्विक परिस्थितियों के चलते कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है और गुरुवार सुबह ब्रेंट क्रूड 3 डॉलर की बढ़त के साथ 120 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया है।
ब्लॉकेड का डर
ताजा संकट की शुरुआत अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य और कूटनीतिक गतिरोध बढ़ने से हुई है। अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाए गए कड़े प्रतिबंधों और खाड़ी क्षेत्र में नौसैनिक गतिविधियों में वृद्धि ने दुनिया को डरा दिया है। दरअसल, दुनिया का एक बड़ा तेल निर्यात इसी क्षेत्र से होकर गुजरता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तनाव युद्ध में बदलता है, तो कच्चे तेल की आपूर्ति (Supply) पूरी तरह ठप हो सकती है। इसी 'सप्लाई फियर' की वजह से बाजार में तेल की मांग अचानक बढ़ गई है और कीमतें आसमान छूने लगी हैं।
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका अब ईरान की लंबे समय तक घेराबंदी (Blockade) करने की योजना बना रहा है, जिससे कच्चे तेल के बाजार में जबरदस्त उबाल आ गया है। इस तनाव का सीधा असर बुधवार को देखने को मिला, जब ब्रेंट क्रूड की कीमतें 120 डॉलर के स्तर को पार कर गईं और कुछ समय के लिए 122 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं। दूसरी ओर, ईरान ने भी कड़े तेवर दिखाते हुए चेतावनी दी है कि वह अमेरिकी पाबंदियों के जवाब में 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' से गुजरने वाले तेल के जहाजों की आवाजाही को बाधित करना जारी रखेगा, जिससे वैश्विक तेल सप्लाई पर संकट गहरा गया है।
आम आदमी की जेब पर सीधा असर
कच्चे तेल की कीमतों में होने वाली हर हलचल का सीधा संबंध हमारी और आपकी जेब से होता है। भारत अपनी जरूरत का करीब 80 प्रतिशत से ज्यादा तेल विदेशों से आयात करता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 120 डॉलर के स्तर को पार करता है, तो सरकारी तेल कंपनियों के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतें स्थिर रखना मुश्किल हो जाता है। आने वाले दिनों में देश के प्रमुख शहरों में ईंधन के दामों में बड़ी बढ़ोतरी देखी जा सकती है। ईंधन महंगा होने का मतलब है कि माल ढुलाई महंगी होगी, जिससे फल, सब्जी और अन्य रोजमर्रा की चीजों के दाम भी बढ़ जाएंगे।
तेल की कीमतों में तेजी के साथ-साथ डॉलर भी मजबूत हो रहा है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए दोहरी मार जैसा है। भारत को तेल खरीदने के लिए डॉलर में भुगतान करना पड़ता है। तेल महंगा होने से देश का 'आयात बिल' बढ़ जाता है, जिससे चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) बढ़ने का खतरा रहता है। इसका सीधा असर भारतीय रुपये की वैल्यू पर भी पड़ता है। अगर कच्चा तेल लंबे समय तक 120 डॉलर के ऊपर बना रहा, तो इससे देश की आर्थिक विकास दर और महंगाई दर (Inflation) पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
