आज के दौर में चिकित्सा खर्च और अस्पतालों में इलाज की लागत जिस तेजी से आसमान छू रही है, उसे देखते हुए एक सही और पर्याप्त हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी का होना बेहद जरूरी हो गया है। अधिकांश लोग एक बार पॉलिसी खरीद लेते हैं और उसके बाद हर साल बिना सोचे-समझे सिर्फ प्रीमियम की राशि चुकाकर उसे रिन्यू (Renew) कर देते हैं। उन्हें लगता है कि उनकी पुरानी पॉलिसी के सारे वादे और शर्तें वैसी ही रहेंगी जैसी शुरुआत में थीं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इंश्योरेंस कंपनियां अक्सर रिन्यूअल के समय कुछ ऐसी चालें चलती हैं या नियमों में ऐसे बारीक बदलाव कर देती हैं, जो क्लेम के वक्त आपकी जेब पर भारी पड़ सकते हैं? अगर आप भी अपनी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी को रिन्यू करने जा रहे हैं, तो कंपनियों के इन 'हिडन ट्रिक्स' (Hidden Tricks) और छुपी हुई शर्तों से सावधान रहना बहुत जरूरी है।
कंपनियों की हिडेन ट्रिक्स
सबसे पहला और बड़ा ट्रिक जो कंपनियां अक्सर अपनाती हैं, वह है रिन्यूअल के वक्त चुपके से 'को-पेमेंट' (Co-payment) या 'डिडक्टिबल्स' (Deductibles) की शर्त जोड़ देना या उसके प्रतिशत को बढ़ा देना। को-पेमेंट का सीधा मतलब यह होता है कि अस्पताल के कुल बिल का एक निश्चित हिस्सा (जैसे 10% या 20%) खुद मरीज को अपनी जेब से देना होगा, और कंपनी सिर्फ बाकी का हिस्सा चुकाएगी। कई बार कंपनियां बिना किसी बड़े बदलाव की घोषणा के पॉलिसी के नवीनीकरण दस्तावेजों में इस क्लॉज को चुपचाप शामिल कर देती हैं। पॉलिसीधारक सोचते हैं कि उनका प्रीमियम पुराना ही है या मामूली बढ़ोतरी हुई है, तो सब ठीक होगा। लेकिन जब वे अस्पताल में क्लेम के लिए जाते हैं, तब उन्हें पता चलता है कि बिल का एक बड़ा हिस्सा उन्हें खुद भुगतना पड़ रहा है। इसलिए रिन्यूअल नोटिस को हमेशा ध्यान से पढ़ें।
'रूम रेंट लिमिट' (Room Rent Limit) या अस्पताल के कमरे के किराये की सीमा से जुड़ा है। अस्पताल में भर्ती होने पर मिलने वाले कमरे के किराये पर कंपनियां एक कैपिंग (सीमित दायरा) लगा देती हैं। मान लीजिए आपकी पुरानी पॉलिसी में रूम रेंट पर कोई सीमा नहीं थी, लेकिन रिन्यूअल के समय कंपनी ने इसे आपके सम इंश्योर्ड (Sum Insured) का 1% तय कर दिया। ऐसी स्थिति में यदि आपका सम इंश्योर्ड 5 लाख रुपये है, तो आपको केवल 5,000 रुपये प्रतिदिन तक का कमरा मिलेगा। यदि आप अस्पताल में इससे महंगा कमरा चुनते हैं, तो न केवल कमरे का अतिरिक्त किराया बल्कि आनुपातिक रूप से (Proportionate Deduction) डॉक्टर की विजिटिंग फीस, ऑपरेशन थियेटर का खर्च और अन्य मेडिकल चार्ज भी आपकी जेब से कट जाते हैं। कंपनियां अक्सर रिन्यूअल के समय इस लिमिट में बदलाव कर देती हैं, जिस पर ग्राहक अक्सर ध्यान नहीं देते।
इसके अलावा, 'डिजीज-स्पेसिफिक सब-लिमिट्स' (Disease-specific Sub-limits) यानी कुछ खास बीमारियों के आधार पर खर्च की सीमा तय करना भी कंपनियों का एक पुराना तरीका है। इसके तहत मोतियाबिंद, पथरी, घुटने के रिप्लेसमेंट या हर्निया जैसी कुछ आम बीमारियों के इलाज के लिए खर्च की एक अधिकतम सीमा तय कर दी जाती है, भले ही आपकी कुल पॉलिसी का कवर कितना भी बड़ा क्यों न हो। रिन्यूअल के समय कंपनियां कई बार नई बीमारियों को इस सब-लिमिट के दायरे में डाल देती हैं। इसके साथ ही, आपको यह भी जांचना चाहिए कि क्या कंपनी ने आपके पसंदीदा अस्पतालों को अपने 'कैशलेस नेटवर्क' (Cashless Network) से बाहर तो नहीं कर दिया है। नेटवर्क अस्पतालों की सूची समय-समय पर बदलती रहती है, इसलिए रिन्यूअल से पहले अपने नजदीकी और भरोसेमंद अस्पतालों की उपलब्धता जरूर जांच लें।
इस बात का भी रखें ख्याल
एक जिम्मेदार पॉलिसीधारक के रूप में आपको भी रिन्यूअल प्रक्रिया के दौरान बेहद सतर्क रहना चाहिए। यदि बीते एक साल में आपको या आपके परिवार के किसी सदस्य को कोई नई बीमारी (जैसे हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज या दिल से जुड़ी समस्या) हुई है, तो रिन्यूअल के वक्त कंपनी को इसकी सही और पारदर्शी जानकारी जरूर दें। इसे छुपाने पर भविष्य में कंपनी आपके पूरे क्लेम को खारिज कर सकती है। साथ ही, हमेशा रिन्यूअल की आखिरी तारीख से कम से कम 15 से 20 दिन पहले ही इस पूरी प्रक्रिया को शुरू कर दें। यदि आप अपनी मौजूदा कंपनी की शर्तों, छुपे हुए नियमों या बढ़ते प्रीमियम से खुश नहीं हैं, तो आपके पास 'पॉलिसी पोर्टेबिलिटी' (Policy Portability) का बेहतरीन विकल्प होता है, जिसके जरिए आप अपने पुराने नो-क्लेम बोनस और वेटिंग पीरियड के फायदों को बरकरार रखते हुए किसी दूसरी बेहतर कंपनी में शिफ्ट हो सकते हैं।
