पड़ोसी देश पाकिस्तान पिछले काफी समय से अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है। कभी चीन तो कभी सऊदी अरब के सामने हाथ फैलाने वाले पाकिस्तान के लिए अब एक बड़ी और राहत भरी खबर आई है। एशियाई विकास बैंक (ADB) ने पाकिस्तान की कंगाली दूर करने और उसकी डूबती अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए 92 हजार करोड़ रुपये (करीब 11 अरब डॉलर) की भारी-भरकम सहायता राशि को मंजूरी दे दी है। यह खबर ऐसे समय में आई है जब पाकिस्तान में महंगाई आसमान छू रही है और आम जनता बुनियादी जरूरतों के लिए भी तरस रही है। इस बड़ी मदद को पाकिस्तान के लिए एक 'संजीवनी' के रूप में देखा जा रहा है।
कहां करेगा पैसों का इस्तेमाल
पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसके पास अपने विदेशी कर्ज की किस्तें चुकाने तक के पैसे नहीं बचे थे। ऐसे में ADB की यह मदद पाकिस्तान को दिवालिया (Default) होने से बचा सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, इस 92 हजार करोड़ की राशि का इस्तेमाल मुख्य रूप से देश के बुनियादी ढांचे, ऊर्जा क्षेत्र में सुधार और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए किया जाएगा। पाकिस्तान में बिजली संकट और पुराने पड़ चुके पावर ग्रिड्स एक बड़ी समस्या हैं, जिसके कारण वहां उद्योगों का चलना मुश्किल हो गया है। ADB चाहता है कि इस फंड के जरिए पाकिस्तान अपनी ऊर्जा व्यवस्था को सुधारे ताकि भविष्य में वह आत्मनिर्भर बन सके।
क्या हैं शर्तें?
हालांकि, यह मदद बिना किसी शर्त के नहीं मिली है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं जब भी इतनी बड़ी राशि देती हैं, तो वे कड़े आर्थिक सुधारों की मांग करती हैं। पाकिस्तान को अपनी कर व्यवस्था (Tax System) को मजबूत करना होगा और सरकारी खर्चों में कटौती करनी होगी। अक्सर देखा गया है कि पाकिस्तान को मिलने वाली मदद का एक बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज के ब्याज को चुकाने में ही चला जाता है। जानकारों का मानना है कि अगर इस बार भी पाकिस्तान ने इस पैसे का सही इस्तेमाल नहीं किया, तो वह कर्ज के ऐसे जाल में फंस जाएगा जिससे निकलना नामुमकिन होगा।
दुनिया भर की नजरें इस बात पर भी हैं कि एक तरफ जहां ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था दबाव में है, वहीं पाकिस्तान को इतनी बड़ी फंडिंग मिलना उसके लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है। पाकिस्तान की जनता को उम्मीद है कि इस पैसे से कम से कम बिजली के बिलों और रोजमर्रा की चीजों के दामों में कुछ कमी आएगी। लेकिन असल चुनौती यह है कि क्या वहां की सरकार इस फंड का पारदर्शी तरीके से इस्तेमाल कर पाएगी या यह पैसा भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाएगा।
