जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने को तैयार हैं, तब दुनिया के अधिकांश देशों को अपनी अर्थव्यवस्था बचाने की चिंता सताने लगी है। लेकिन चीन इस मामले में थोड़ा अलग है। दरअसल, ईरान और चीन के बीच एक ऐसा व्यापारिक रिश्ता है, जिसमें 'डिस्काउंट' ही सबसे बड़ा फैक्टर है। ईरान पर अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए कड़े प्रतिबंधों के कारण वह अपने तेल को खुलेआम अंतरराष्ट्रीय बाजार में नहीं बेच पाता। ऐसे में चीन उसका सबसे बड़ा और भरोसेमंद ग्राहक बनकर उभरा है, और इसी का फायदा चीन को भारी भरकम छूट के रूप में मिलता है।
हैरान कर देने वाली कीमतें
रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान चीन को कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय मानक यानी ब्रेंट क्रूड की कीमत से लगभग 5 से 10 डॉलर प्रति बैरल कम पर बेचता है। अगर हम इसे भारतीय रुपयों में समझें, तो ईरान से मिलने वाला कच्चा तेल चीन को बहुत सस्ता पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की एक बैरल (159 लीटर) की कीमत अगर 9,000 रुपये के आसपास है, तो चीन को यही तेल भारी डिस्काउंट के बाद काफी कम दाम पर मिलता है। जानकारों का कहना है कि अगर सभी खर्चों और छूट को जोड़ दिया जाए, तो चीन को ईरान से मिलने वाला कच्चा तेल करीब 40 से 45 रुपये प्रति लीटर के हिसाब से पड़ता है (यह कच्चे तेल की कीमत है, रिफाइंड पेट्रोल की नहीं)।
प्रतिबंधों का फायदा उठा रहा है चीन
ईरान और रूस जैसे देशों पर लगे प्रतिबंधों ने चीन के लिए सस्ती ऊर्जा का रास्ता खोल दिया है। चूंकि ईरान को डॉलर में व्यापार करने में दिक्कत आती है, इसलिए चीन अक्सर उसे अपनी मुद्रा 'युआन' में भुगतान करता है या फिर 'बार्टर सिस्टम' (चीजों के बदले तेल) के जरिए व्यापार करता है। ईरान के पास तेल बेचने के विकल्प कम हैं, इसलिए वह चीन की शर्तों पर तेल बेचने को मजबूर है। इसका सीधा फायदा चीन की मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री को मिलता है, क्योंकि वहां ईंधन और बिजली की लागत कम हो जाती है, जिससे चीन के उत्पाद पूरी दुनिया में सस्ते और प्रतिस्पर्धी बने रहते हैं।
भारत और बाकी दुनिया पर इसका असर
चीन की यह 'सस्ती तेल रणनीति' अन्य देशों के लिए चिंता का विषय है। भारत जैसे देश, जो अपनी जरूरत का अधिकांश तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार से ऊंचे दामों पर खरीदते हैं, उनके लिए चीन के साथ प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा, अमेरिका के लिए भी यह एक बड़ा सिरदर्द है, क्योंकि चीन की इस खरीद के कारण ईरान पर लगाए गए प्रतिबंध उतने प्रभावी नहीं रह जाते जितने की उम्मीद की गई थी।
