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ईरान युद्ध के बीच तेल से छप्परफाड़ कमाई! दुनिया हुई मालामाल, भारतीय कंपनियां क्यों बेहाल?

फरवरी से अब तक लगातार ग्लोबल ऑयल मार्केट तनाव में है। लेकिन, ऑयल कंपनियों की चांदी हो गई है। होर्मुज संकट दुनिया की टॉप कंपनियों के लिए यह आपदा में अवसर साबित हुआ है। लेकिन, भारतीय कंपनियां कहां चूक गईं?

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ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध के बाद क्रूड के दाम बढ़े फिर भी तेल कंपनियों का मुनाफा बढ़ा
Authored by: Yateendra Lawaniya
Updated Aug 5, 2026, 15:28 IST
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US Iran War Crude Oil Crisis : ईरान-इजरायल युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) में लंबे समय से जारी तनाव ने पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार को झकझोर दिया है। तेल सप्लाई बाधित होने की आशंका के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंचे स्तर पर बनी रहीं। आमतौर पर माना जाता है कि जब क्रूड महंगा होता है, तो सभी तेल कंपनियों की कमाई घट जाती है।

लेकिन इस बार तस्वीर बिल्कुल अलग है। अमेरिका, यूरोप और सऊदी अरब की दिग्गज तेल कंपनियां रिकॉर्ड मुनाफा कमा रही हैं। हालांकि, भारत की सरकारी तेल कंपनियां जरूर हजारों करोड़ रुपये के घाटे में पहुंच गई हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब पूरी दुनिया में तेल महंगा हुआ, तो विदेशी कंपनियों के लिए यह कमाई का मौका कैसे बन गया और भारत की सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs) नुकसान में क्यों चली गईं?

पहले समझिए, आखिर हुआ क्या है?

ईरान युद्ध के कारण दुनिया के सबसे अहम समुद्री तेल मार्ग होर्मुज स्ट्रेट पर संकट गहरा गया। दुनिया के कुल समुद्री तेल कारोबार का करीब 20% हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। जब इस मार्ग पर खतरा बढ़ा, तो बाजार में तेल की कमी की आशंका पैदा हुई और कच्चे तेल की कीमतें तेजी से चढ़ गईं। तेल की कीमत बढ़ने का मतलब यह नहीं कि हर कंपनी को फायदा होगा। फायदा इस बात पर निर्भर करता है कि कंपनी का कारोबार किस मॉडल पर चलता है।

बड़ी कंपनियों ने कैसे कमाया अरबों डॉलर?

अमेरिका की ExxonMobil और Chevron, यूरोप की Shell और BP, तथा सऊदी अरब की Saudi Aramco जैसी कंपनियां सिर्फ पेट्रोल-डीजल बेचने का काम नहीं करतीं। ये कंपनियां तेल की खोज करती हैं, जमीन या समुद्र से उसका उत्पादन करती हैं, उसे रिफाइन करती हैं और फिर दुनिया भर में बेचती भी हैं। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है, तो इन अपस्ट्रीम बिजनेस वाली कंपनियों को सबसे बड़ा फायदा मिलता है। क्योंकि, जिस तेल को निकालने की लागत पहले से तय होती है, उसे वे कहीं अधिक कीमत पर बेच पाती हैं।

किस कंपनी को कितना मुनाफा हुआ?

यही वजह है कि जून तिमाही में एक्सॉनमोबिल ने लगभग 14.5 अरब डॉलर, शेवरॉन ने 12 अरब डॉलर, शेल ने करीब 10 अरब डॉलर, बीपी ने 5.73 अरब डॉलर और सऊदी अरामको ने 32.69 अरब डॉलर का मुनाफा दर्ज किया। इप कंपनियों का यह पिछले कई वर्षों का सबसे मजबूत प्रदर्शन रहा। हालांकि, दिलचस्प बात यह रही कि रिलायंस इंडस्ट्रीज को इस दौरान रिकॉर्ड प्रॉफिट हुआ है।

रिफाइनिंग से भी हुई मोटी कमाई

युद्ध के दौरान सिर्फ कच्चा तेल ही महंगा नहीं हुआ, बल्कि पेट्रोल, डीजल और जेट फ्यूल जैसे उत्पादों के दाम भी बढ़ गए। इससे रिफाइनिंग मार्जिन में भी जबरदस्त सुधार आया। जिन कंपनियों के पास बड़े रिफाइनिंग नेटवर्क हैं, उन्होंने एक तरफ महंगे तेल का फायदा उठाया तो दूसरी तरफ महंगे ईंधन बेचकर अतिरिक्त कमाई भी की। यही वजह है कि उनके मुनाफे में कई गुना उछाल देखने को मिला।

क्रूड के दाम बढ़ने का मिला फायदा

क्रूड के दाम बढ़ने का मिला फायदा

भारतीय कंपनियों की कहानी क्यों अलग है?

भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। इंडियन ऑयल (IOC), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) जैसी सरकारी कंपनियां ज्यादातर कच्चा तेल खरीदकर उसे रिफाइन करती हैं और फिर घरेलू बाजार में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी बेचती हैं। यानी ये कंपनियां तेल का उत्पादन बहुत कम करती हैं। इसलिए जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होता है तो सबसे पहले इनकी खरीद लागत बढ़ जाती है।

जितना महंगा खरीदा, उतना महंगा बेचा नहीं

भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें पूरी तरह बाजार के भरोसे नहीं छोड़ी जातीं। सरकार महंगाई और आम लोगों पर पड़ने वाले असर को भी ध्यान में रखती है। युद्ध के दौरान कच्चा तेल लगातार महंगा होता गया, लेकिन कंपनियां उसी अनुपात में पेट्रोल और डीजल के दाम नहीं बढ़ा सकीं। यानी लागत बढ़ती गई, लेकिन बिक्री से उतनी कमाई नहीं हुई। इसी वजह से इनके मार्केटिंग मार्जिन पर भारी दबाव आया और मुनाफा घटकर घाटे में बदल गया।

एलपीजी कारोबार ने भी बढ़ाया दबाव

सरकारी तेल कंपनियां सिर्फ पेट्रोल और डीजल ही नहीं बेचतीं, बल्कि घरेलू एलपीजी सिलेंडर की सप्लाई भी करती हैं। कई बार घरेलू गैस सिलेंडर की कीमतें राजनीतिक और सामाजिक कारणों से लागत के हिसाब से नहीं बढ़ाई जातीं। ऐसे में कंपनियां पहले नुकसान उठाती हैं और बाद में सरकार से मुआवजे की उम्मीद करती हैं। यदि मुआवजा समय पर नहीं मिलता तो तिमाही नतीजों पर उसका सीधा असर पड़ता है।

किस कंपनी को कितना नुकसान हुआ?

अप्रैल-जून तिमाही में सरकारी तेल कंपनियों के नतीजे चौंकाने वाले रहे। HPCL को 11,526 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा हुआ। BPCL को 3,962 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ और IOC को 2,661 करोड़ रुपये का घाटा हुआ। यानी तीनों सरकारी कंपनियों का संयुक्त घाटा 18,149 करोड़ रुपये तक पहुंच गया।

सबसे बड़ा फर्क क्या है?

असल अंतर बिजनेस मॉडल का है। विदेशी कंपनियां तेल निकालती भी हैं और बेचती भी हैं। इसलिए तेल महंगा होने पर उनकी कमाई बढ़ जाती है।वहीं, भारतीय सरकारी कंपनियां मुख्य रूप से तेल खरीदकर बेचने का काम करती हैं। जब खरीद महंगी हो जाए और बिक्री की कीमतें सीमित रहें तो नुकसान होना तय है। यानी एक ही वैश्विक संकट ने विदेशी कंपनियों के लिए रिकॉर्ड मुनाफे का रास्ता खोल दिया, जबकि भारतीय सरकारी कंपनियों के लिए यही संकट भारी घाटे की वजह बन गया।

आगे क्या होगा?

अगर होर्मुज में तनाव बना रहता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा रहता है, तो भारतीय सरकारी तेल कंपनियों पर दबाव जारी रह सकता है। हालांकि यदि वैश्विक कीमतों में गिरावट आती है, सरकार कंपनियों को राहत देती है या खुदरा ईंधन की कीमतों में बदलाव होता है, तो उनकी वित्तीय स्थिति में सुधार संभव है।

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