सोना-चांदी ने इस साल निवेशकों को निराश किया है। दोनों कीमती धातु की कीमत पिछले साल के रिकॉर्ड हाई से नीचे है। वहीं, दूसरी ओर मिडिल ईस्ट युद्ध और वैश्विक अनिश्चितता के बावजूद, हाल के महीनों में कॉपर की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। गुरुवार को MCX पर कॉपर ने 1430 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंय गया। वहीं, मंगलवार को लंदन मेटल एक्सचेंज (LME) पर कॉपर की कीमत 14,708 डॉलर प्रति टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गईं। बता दें कि पिछले साल दिसंबर में कॉपर की कीमतें 12,000 डॉलर प्रति टन के स्तर को पार कर गई थीं।
अगर तांबे के भाव पर नजर डालें तो साल 2023 में कीमत 700 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास थी। यानी करीब 3 साल में कीमत डबल हो गई है। मार्केट एक्सपर्ट, कॉपर के भाव में उछाल को 'महा-रैली' कह रहे हैं। आखिर ऐसा क्या हुआ कि अचानक तांबे की कीमत में इतनी बड़ी तेजी आई है। आइए समझते हैं।
तांबे की कीमत में क्यों जारी तेजी?
कमोडिटी मार्केट के एक्सपर्ट और केडिया एडवाइजरी के डायरेक्टर अजय केडिया ने बताया कि कॉपर की कीमतों में आई ऐतिहासिक तेजी केवल एक सामान्य बाजार चक्र नहीं है, बल्कि यह अमेरिकी टैरिफ की चिंता, सप्लाई की किल्लत और मांग का मिला-जुला असर है। केडिया ने बताया कि डोनाल्ड ट्रंप ने कॉपर, चांदी और अन्य क्रिटिकल मेटल्स पर टैरिफ लगाने का ऐलान किया था। इसे बाजार में पैनिक बाइंग और जमाखोरी को बढ़ावा दिया है।
ये टैरिफ जनवरी 2027 से लागू हो सकते हैं। इसके साथ ही, वैश्विक स्तर पर कॉपर की सप्लाई पिछले 10 वर्षों के निचले स्तर पर पहुंच चुकी है। कच्चे तेल की कीमत बढ़ने के कारण खदानों की उत्पादन लागत बढ़ी है, जिसके चलते तांबा महंगा हुआ है।
दूसरी तरफ, सोलर एनर्जी, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV) और AI डेटा सेंटर्स की वजह से तांबे की इंडस्ट्रियल डिमांड में बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। सप्लाई का संकट, महंगी माइनिंग और ग्रीन-टेक बूम- इन तीन मजबूत कारकों के चलते कॉपर लंबी अवधि के लिए एक मजबूत बुल रन में प्रवेश कर चुका है। इससे आने वाले समय में चांद की कीमत में तेजी जारी रहने की उम्मीद है।
इस कारण भी तांबा हो रहा महंगा
जानकारों का कहना है कि मुद्राओं में अवमूल्यन और वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों के बीच निवेशकों ने शुरुआत में सोने-चांदी को सुरक्षित ठिकाना बनाया था। लेकिन जब सोना-चांदी बहुत महंगे हो गए, तो बड़े ग्लोबल मैक्रो फंड्स और संस्थागत निवेशकों का रुख 'हार्ड एसेट' के रूप में तांबे (की ओर हो गया। इसने कॉपर में भारी सट्टेबाज़ी और संस्थागत खरीदारी को जन्म दिया। इस कारण भी तांबा महंगा हो रहा है।
साल के अंत तक कहां जा सकता है भाव?
टैरिफ से जुड़ी अनिश्चितता के कारण शॉर्ट टर्म में कॉपर में भारी उतार-चढ़ाव बना रह सकता है, लेकिन सीमित आपूर्ति और मजबूत मांग के कारण लंबी अवधि में तेजी बनी रहेगी। ऐसे में अगर आप निवेशक हैं तो गिरावट को मौके के तौर पर ले सकते हैं। अगर दुनिया में तांबे की मांग इसी तरह बनी रही, तो साल के अंत तक लंदन मेटल एक्सचेंजपर तांबे की कीमत 16,500 डॉलर प्रति टन और MCX पर 1,600 रुपये प्रति किलो तक पहुंचने की उम्मीद है।
रिकॉर्ड हाई पर तांबा
तांबे की कीमत में तेजी क्यों है अच्छी खबर?
आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए तांबा (रेड मेटल) बहुत जरूरी है। इसका इस्तेमाल घरों और मैन्युफैक्चरिंग से लेकर पावर ग्रिड, क्लीन एनर्जी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिफेंस तक में होता है। इसलिए, इसकी कीमत को अक्सर अर्थव्यवस्था की सेहत का पैमाना माना जाता है। तांबे की कीमतों में बढ़ोतरी को मजबूत आर्थिक विकास का संकेत माना जाता है, जबकि कीमतों में गिरावट से आर्थिक सुस्ती की चिंता बढ़ जाती है। हालांकि, मौजूदा तेजी की कहानी कुछ अलग ही लग रही है।
अब आगे क्या?
कॉपर की कीमतों में तेजी के बावजूद यह मान लेना सही नहीं होगा कि कीमतें लगातार एक ही दिशा में जाएंगी। टैरिफ पर अमेरिकी नीति में बदलाव, डॉलर की चाल, चीन की मांग, वैश्विक आर्थिक वृद्धि और नई माइन सप्लाई जैसे फैक्टर आगे कीमतों को प्रभावित कर सकते हैं। हाल में अमेरिकी प्रशासन ने रिफाइंड कॉपर पर संभावित टैरिफ को लेकर फैसला टाल दिया है, क्योंकि ऊंची कॉपर कीमतें अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों की लागत बढ़ा सकती हैं। इससे बाजार में उतार-चढ़ाव भी देखने को मिल सकता है।
