Sleeper Bus Safety: यमुना एक्सप्रेसवे पर 23 सितंबर की रात स्लीपर बस में लगी आग की घटना ने लंबी दूरी की बसों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस घटना में 9 यात्रियों की मौत की खबर है । शुरुआती जांच में आग की वजह AC सिस्टम में स्पार्क को बताया गया है। बीते दिनों में इस तरह की कई घटनाएं घट चुकी हैं। हालांकि, सवाल यही कि स्लीपर बस में आग क्यों लगती है, यात्रियों को बाहर निकलने में कहां और क्या मुश्किल आती है। सेफ्टी में कहां चूक होती है, स्लीपर बस में रात को ट्रैवल करते समय यात्रियों को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए और सुरक्षा को लेकर कौन-से बदलाव किए जाने चाहिए-
स्लीपर बस में आग क्यों लगती है?
स्लीपर बस में आग लगने के कई कारण हो सकते हैं। इनमें इलेक्ट्रिकल शॉर्ट सर्किट, वायरिंग में खराबी, AC सिस्टम की समस्या, इंजन या लुब्रिकेंट ऑयल का गर्म हिस्से के संपर्क में आना, टायर से जुड़ी समस्या और गैर-मानक तरीके से किए गए इलेक्ट्रिकल या बॉडी मॉडिफिकेशन शामिल हो सकते हैं। खासकर, स्लीपर बसों में AC, लाइट, चार्जिंग प्वाइंट और दूसरे इलेक्ट्रिकल उपकरण लगातार इस्तेमाल होते हैं। अगर वायरिंग सही तरीके से इंसुलेटेड या फिट नहीं है, अतिरिक्त लोड है या किसी हिस्से में खराबी है तो गर्मी और स्पार्क पैदा हो सकता है। हालांकि हर बस में आग का कारण एक जैसा नहीं होता।
सफर से पहले यात्रियों को किन बातों का रखना चाहिए ध्यान
यात्री अक्सर बस चुनते समय किराया, AC, बर्थ और यात्रा के समय को देखते हैं, लेकिन सेफ्टी फीचर्स पर ध्यान नहीं देते। लंबी दूरी की स्लीपर बस में सफर करने से पहले कुछ छोटी लेकिन चीजों पर ध्यान देना जरूरी है।
ऑटो एक्सपर्ट, Tutu Dhawan के अनुसार, यात्रियों को बस में बैठने के बाद सबसे पहले यही चेक करना चाहिए कि इमरजेंसी डोर और एस्केप हैच कहां हैं। सिर्फ उनका मौजूद होना काफी नहीं है। यह भी देखें कि उनके सामने सामान, सीट या कोई दूसरी चीज रास्ता तो नहीं रोक रही।
इसके अलावा, जहां इमरजेंसी हैमर दिया गया हो, उसकी लोकेशन भी याद रखना जरूरी है। अगर आपकी बर्थ के पास इमरजेंसी एग्जिट है तो उसका इस्तेमाल कैसे किया जाता है, यह समझना जरूरी है।
इसके अलावा, अगर यात्री रात में ट्रैवल कर रहे हैं तो मोबाइल फोन को फुल चार्ज कर रखना भी जरूरी है। फोन को रात भर चार्जिंग पर रखने से बचना चाहिए। अगर बस में फोन को चार्ज कर रहे हैं तो यह जरूर देख लें कि चार्जिंग पॉइंट, वायर या अडैप्टर ठीक तरह से काम कर रहे हों और वे असमान्य रूप से गर्म न हो रहे हों।
आग लग जाए तो यात्री क्या करें?
यात्रियों को अपना सामान बचाने की कोशिश छोड़ सबसे पहले खुद को बचाने पर ध्यान देना चाहिए। आग या धुआं दिखाई दे तो बैग, जूते या दूसरी चीजें लेने में समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। ड्राइवर या स्टाफ की चेतावनी मिलते ही तुरंत अपनी बर्थ से निकलकर उपलब्ध इमरजेंसी एग्जिट की ओर बढ़ना चाहिए। अगर धुआं ऊपर जमा हो रहा है तो नीचे झुककर या जितना संभव हो कम ऊंचाई पर रहते हुए आगे बढ़ना मददगार हो सकता है। धुएं में सांस लेना बेहद खतरनाक हो सकता है। मुंह और नाक को कपड़े से ढकना कुछ हद तक धुएं के सीधे संपर्क को कम कर सकता है, लेकिन इसे पूर्ण सुरक्षा नहीं माना जाना चाहिए।
Sleeper Bus Safety
अगर मुख्य दरवाजा बंद या आग की चपेट में है तो वैकल्पिक इमरजेंसी एग्जिट का इस्तेमाल करना चाहिए। यही वजह है कि यात्रा शुरू होने से पहले निकास रास्तों की जानकारी होना जरूरी है।
बस ऑपरेटरों की भी अहम जिम्मेदारी
हालांकि, ऑटो एक्सपर्ट्स मानते हैं कि सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी केवल यात्री की नहीं हो सकती। बस ऑपरेटर, ड्राइवर, कंडक्टर, बस बॉडी बिल्डर और फिटनेस जांच करने वाली एजेंसियों की भी अहम भूमिका होती है।
यमुना एक्सप्रेसवे पर घटी इस घटना को लेकर ड्राइवर और कंडक्टर की ही लापरवाही सामने आई है। बताया जा रहा है कि कुछ यात्रियों ने बस में कुछ जलने जैसी बदबू महसूस करते ही ड्राइवर और कंडक्टर को इसकी जानकारी दी थी, लेकिन दोनों ने ही इस ओर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने कहा कि बस में इस तरह की बदबू आना आम बात है और वे बस चलाते समय भी बीड़ी या सिगरेट पीते रहे। सबसे दुखद तो यह रहा कि बस के अंदर आग की लपटें उठने के बाद भी यात्रियों ने बस रोकने की गुहार लगाई लेकिन ड्राइवर ने बस नहीं रोकी, देखते ही देखते बस में तेजी से आग फैल गई और पूरी बस धुंए से भर गई। इस हादसे में भी यात्रियों की जान जाने से बच सकती थी अगर ड्राइवर और कंडक्टर की ओर से समय पर बस रोक दी जाती।
ऑटो एक्सपर्ट Tutu Dhawan के मुताबिक, एसी बस में आग लगने की स्थिति में ड्राइवर और कंडक्टर की जिम्मेदारी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। ड्राइवर को बस की वायरिंग, AC सिस्टम, इंजन और दूसरे जरूरी हिस्सों में किसी असामान्य आवाज, धुएं, जलने की गंध या तापमान बढ़ने जैसे संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और ऐसी स्थिति में बस को सुरक्षित जगह पर तुरंत रोकना चाहिए। आग लगने पर ड्राइवर और कंडक्टर की प्राथमिक जिम्मेदारी यात्रियों को घबराए बिना जल्द से जल्द बस से बाहर निकालना, इमरजेंसी गेट और एस्केप हैच को खोलना तथा फायर एक्सटिंग्विशर का सही तरीके से इस्तेमाल करना है।
इसके अलावा, कंडक्टर को खास तौर पर इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कोई यात्री बर्थ या सामान के कारण अंदर न फंसे और सभी यात्रियों को सुरक्षित दूरी तक पहुंचाया जाए। इसके साथ ही दोनों को यात्रियों को इमरजेंसी एग्जिट की जानकारी देने और नियमित रूप से बस के फायर सेफ्टी उपकरणों की स्थिति जांचने की जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए।
सेफ्टी को लेकर कौन-से बदलाव होने चाहिए
सबसे पहले तो यही जरूरी है कि नियमों का पालन केवल कागजों पर नहीं, बल्कि सड़क पर चल रही हर बस में होना चाहिए। फिटनेस जांच के दौरान इमरजेंसी डोर खोलकर देखना, एस्केप हैच की कार्यक्षमता जांचना और रास्ते में किसी तरह की रुकावट की जांच करना जरूरी है। फायर डिटेक्शन और सप्रेशन सिस्टम की नियमित टेस्टिंग होनी चाहिए। केवल सिस्टम लगा होना काफी नहीं है, यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि वह समय पर अलार्म दे और आग को नियंत्रित करने में काम करे।
इसके अलावा, बसों में अनधिकृत मॉडिफिकेशन पर सख्ती की जरूरत है। खासकर वायरिंग, AC, बैटरी, चार्जिंग पॉइंट, लाइटिंग और बर्थ लेआउट में किए गए बदलावों की जांच होनी चाहिए।
सेफ्टी को लेकर इस बात को भी ध्यान में रखे जाने की जरूरत है कि ड्राइवर और कंडक्टर को नियमित फायर-इमरजेंसी ट्रेनिंग दी जाए। उन्हें पता होना चाहिए कि आग दिखते ही बस कहां रोकनी है, यात्रियों को किस रास्ते से बाहर निकालना है और फायर एक्सटिंग्विशर का इस्तेमाल कैसे करना है।
यात्रियों को भी बस में एक छोटा-सा सेफ्टी-ब्रीफिंग मिलना चाहिए। जैसे विमान में टेकऑफ से पहले सुरक्षा निर्देश दिए जाते हैं, वैसे ही लंबी दूरी की स्लीपर बस में इमरजेंसी डोर, हैच और फायर एक्सटिंग्विशर की जानकारी दी जा सकती है।
