H-1B Visa Row: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन H-1B और L-1 वीजा एक्सटेंशन (नवीनीकरण) के नियमों को और सख्त व महंगा करने जा रहा है। अमेरिका के होमलैंड सिक्योरिटी विभाग और कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन (CBP) द्वारा तैयार किए गए नए प्रस्ताव के तहत अब अमेरिका में पहले से काम कर रहे कर्मचारियों के वीजा एक्सटेंशन पर भी अतिरिक्त शुल्क लागू किया जाएगा। इस कदम से अमेरिका में कार्यरत भारतीय तकनीकी पेशेवरों और उन्हें स्पॉन्सर करने वाली भारतीय व अमेरिकी टेक कंपनियों पर बड़ा वित्तीय बोझ पड़ेगा।
H -1B वीजा फीस में बढ़ोतरी की तैयारी
क्या है नया प्रस्तावित शुल्क नियम?
मौजूदा नियमों के अनुसार, अमेरिका में 50 या उससे अधिक कर्मचारियों वाली जिन कंपनियों में 50% से अधिक कार्यबल H-1B या L-1 वीजाधारकों का होता है, उन्हें '9-11 रिस्पॉन्स एंड बायोमेट्रिक एंट्री-एग्जिट फीस' (9-11 Response Fees) देनी होती है। यह शुल्क सिर्फ नए H-1B आवेदनों ($4,000) और L-1 आवेदनों ($4,500) पर या नियोक्ता बदलने की स्थिति में ही वसूला जाता है।
कितना शुल्क देना होगा?
ट्रंप प्रशासन के नए नियम लागू होने के बाद कंपनियों को अपने मौजूदा कर्मचारियों के H-1B और L-1 वीजा एक्सटेंशन (नवीनीकरण) कराने पर भी हर बार यह अतिरिक्त $4,000 से $4,500 का शुल्क देना होगा।
भारतीय पेशेवरों पर क्यों पड़ेगा सबसे ज्यादा असर?
H-1B वीजा कार्यक्रम के तहत अमेरिका जाने वाले विदेशी पेशेवरों में भारतीयों की हिस्सेदारी लगभग 71% है। टीसीएस (TCS), इंफोसिस (Infosys), विप्रो (Wipro) जैसी भारतीय आईटी दिग्गज कंपनियों के साथ-साथ अमेजन, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी अमेरिकी टेक कंपनियां बड़ी संख्या में भारतीय इंजीनियरों को नियुक्त करती हैं। एक्सटेंशन पर अतिरिक्त शुल्क लगने से कंपनियों की परिचालन लागत काफी बढ़ जाएगी।
नौकरियों और एक्सटेंशन पर जोखिम
कंपनियां अतिरिक्त वित्तीय बोझ से बचने के लिए वीजा एक्सटेंशन आवेदनों को सीमित कर सकती हैं, जिससे अमेरिका में रह रहे भारतीय कर्मचारियों की नौकरियों और निवास पर अनिश्चितता बढ़ सकती है।
अमेरिका का तर्क
ट्रंप प्रशासन की ओर से कहा गया है कि इन नीतियों का मुख्य उद्देश्य वीजा प्रणाली में हो रहे कथित दुरुपयोग को रोकना और अमेरिकी कामगारों के अधिकारों व नौकरियों की सुरक्षा करना है। अमेरिकी श्रम विभाग ने पहले ही इस दिशा में 'प्रोजेक्ट फायरवॉल' (Project Firewall) जैसे कड़े जांच अभियानों की शुरुआत की है ताकि कंपनियां कम वेतन पर विदेशी पेशेवरों को रखने के बजाय अमेरिकी नागरिकों को प्राथमिकता दें।
