Trump Dilemma Over Saudi Arabia: न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फिलहाल यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी अरब के साथ मिलकर अमेरिकी हवाई हमले करने का फैसला टाल दिया है। ट्रंप पिछले दो हफ्तों से इस मुद्दे पर लगातार अपना रुख बदलते रहे हैं। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने ट्रंप से फोन पर हूतियों के खिलाफ मदद की अपील की थी। इसके बाद ट्रंप ने पेंटागन को हूतियों पर हवाई हमले की तैयारी के निर्देश दिए थे। हालांकि, रविवार तक उन्होंने फिर अपना रुख बदल लिया और फिलहाल हमले से पीछे हट गए।
हूती विद्रोहियों पर फिलहाल हमला नहीं करेगा अमेरिका
रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी कमांडरों ने हमले के लिए टारगेट लिस्ट तैयार कर ली थी और अमेरिकी विमानों के लिए बम भी लोड किए जा रहे थे। हमले की कार्रवाई शुरू होने ही वाली थी, लेकिन ट्रंप ने इसे रोक दिया।
ईरान के खिलाफ जंग में सऊदी अरब का साथ जरूरी
ट्रंप के सामने सबसे बड़ी दुविधा यह है कि अमेरिका को ईरान के खिलाफ चल रही जंग में सऊदी अरब के सहयोग की जरूरत है। वहीं, हूतियों ने अब तक अमेरिकी जहाजों पर हमला करने से परहेज किया है, लेकिन सऊदी अरब के खिलाफ हमले तेज किए हैं। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, सऊदी अरब पहले भी अमेरिकी फैसलों पर अपना प्रभाव दिखा चुका है। मई में सऊदी अरब ने अमेरिका को अपने हवाई क्षेत्र और सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी थी, जिसके कारण अमेरिका की वाणिज्यिक तेल टैंकरों को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में सैन्य सुरक्षा देने की योजना प्रभावित हुई थी।
हूतियों के खिलाफ कार्रवाई आसान नहीं
न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, अमेरिकी अधिकारियों और मध्य-पूर्व में काम कर चुके पूर्व राजनयिकों को संदेह है कि सीमित अमेरिकी हवाई हमले हूतियों को बातचीत के लिए मजबूर कर पाएंगे। 2025 में अमेरिका ने हूतियों के खिलाफ करीब 50 दिनों तक हवाई अभियान चलाया था। इस दौरान अमेरिकी सेना ने 1,000 से ज्यादा ठिकानों को निशाना बनाया था। इसके बावजूद हूतियों ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों और जहाजों पर हमले जारी रखे।
बाद में ट्रंप ने हूतियों के साथ युद्धविराम का ऐलान किया था। इसके बाद हूतियों ने अमेरिकी जहाजों पर हमले रोक दिए थे। अब अमेरिकी अधिकारियों को आशंका है कि अगर अमेरिका दोबारा हूतियों पर हमला करता है, तो वे फिर अमेरिकी जहाजों को निशाना बना सकते हैं। इससे लाल सागर और बाब-अल-मंदब जलडमरूमध्य में तेल और गैस की आवाजाही पर भी असर पड़ सकता है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप के सामने फिलहाल दोहरी चुनौती है—सऊदी अरब की सुरक्षा में मदद करना और साथ ही ईरान के खिलाफ युद्ध में सऊदी सहयोग को बनाए रखना।
शर्तें पूरी होने तक न होर्मुज स्ट्रेट खुलेगा, न अमेरिका से बातचीत
उधर, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दोबारा खोलने और अमेरिका के साथ पिछली बातचीत की प्रक्रिया में लौटने से इनकार कर दिया है। ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने कहा कि जब तक अमेरिका तेहरान की शर्तें पूरी नहीं करता, तब तक ईरान अपने रुख में बदलाव नहीं करेगा।
गालिबाफ के मुताबिक, ईरान ने मध्यस्थों के जरिए अमेरिका तक अपनी मांगें और शर्तें स्पष्ट रूप से पहुंचा दी हैं। उन्होंने कहा कि ईरानी लोगों के अधिकारों को मान्यता देने और अमेरिका की ओर से अपनी प्रतिबद्धताएं पूरी करने के बाद ही बातचीत के पुराने ढांचे में लौटने या होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने की संभावना बन सकती है। गालिबाफ का बयान ऐसे समय आया है जब ईरान के केंद्रीय सैन्य कमान ने भी चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका ने ईरान के खिलाफ दोबारा सैन्य कार्रवाई की, तो अमेरिकी ठिकानों और क्षेत्र में अमेरिकी हितों को निशाना बनाया जा सकता है।
