Times Now Navbharat Explainer: दुनिया में कई ऐसी इमारतें हैं जो अपनी खूबसूरती और बेजोड़ वास्तुकला के लिए जानी जाती हैं। लेकिन क्या आप किसी ऐसी इमारत की कल्पना कर सकते हैं, जिसे बनने में एक या दो दशक नहीं, बल्कि पूरे 144 साल का वक्त लग गया? स्पेन के बार्सिलोना शहर में स्थित ऐतिहासिक और भव्य चर्च 'बेसिलिका डी ला सग्रादा फैमिलिया (Basílica de la Sagrada Família) के साथ ऐसा ही हुआ है। साल 1882 में शुरू हुआ इस चर्च का निर्माण कार्य आखिरकार अपने अंतिम चरण में है और इसे साल 2026 तक पूरी तरह मुकम्मल करने का लक्ष्य रखा गया है। यह साल इसके मुख्य शिल्पकार एंटोनी गौडी (Antoni Gaudí) की 100वीं पुण्यतिथि भी है।
सग्रादा फैमिलिया पूरा होने के करीब; दुनिया के सबसे ऊंचे चर्च को बनने में 144 साल क्यों लगे? (istock)
लेकिन सवाल उठता है कि आधुनिक तकनीक और असीमित संसाधनों के इस दौर में भी एक चर्च को पूरा करने में 14 सदियां (144 साल) क्यों लग गईं? आइए Times Now Navbharat Explainer में समझते हैं इसके पीछे के 5 सबसे बड़े और हैरान करने वाले कारण।
जीसस क्राइस्ट के सेंट्रल टावर (जो 566 फीट ऊंचा है) के पूरा होने के बाद चर्च अपनी पूरी ऊंचाई तक पहुंच गया। यह तब हुआ जब इस ढांचे पर लगभग 100 टन वजन वाला 55-फीट का क्रॉस लगाया गया। यह बेसिलिका का 18वां और आखिरी टावर है, जिसकी कल्पना आर्किटेक्ट एंटोनी गौडी ने की थी, जिन्हें 'भगवान का आर्किटेक्ट' कहा जाता है।
दिलचस्प बात यह है कि यह काम कैटलन आर्किटेक्ट की मौत की 100वीं बरसी पर हुआ। फिर भी, कई लोग सोचेंगे कि चर्च को बनने में 140 साल से ज्यादा का समय क्यों लगा।
ब्लूमबर्ग के अनुसार, गौडी इस प्रोजेक्ट से तब जुड़े जब इसे शुरू हुए एक साल हो चुका था। शुरुआत में, इटली के एक बेसिलिका (एक तरह का चर्च) जैसा साधारण ढांचा बनाने का विचार था। लेकिन गौडी इससे संतुष्ट नहीं थे। इसके बजाय, गौडी ने अपनी बाकी जिंदगी का ज्यादा हिस्सा सग्रादा फैमिलिया के निर्माण में लगा दिया।
एंटोनी गौडी को पता था, वे नहीं देख पाएंगे पूरा हुआ चर्च
यह आउटलेट उनके प्लान को 'आर्ट नोव्यू (Art Nouveau) में उनके प्रयोगों का चरम' और पवित्र वास्तुकला का एक बिल्कुल अनोखा उदाहरण बताता है। इसमें यह भी कहा गया है कि इस प्रोजेक्ट के लिए गोथिक कैथेड्रल जैसे आकार और जटिलता की जरूरत थी, लेकिन इसमें लगभग कहीं भी समकोण (right angles) नहीं थे। असल में, गौडी इस बेसिलिका को पत्थर में बाइबिल मानते थे, जिसमें धार्मिक प्रतीकों को प्राकृतिक आकृतियों और एडवांस्ड ज्यामिति के साथ मिलाया गया था।
BBC के अनुसार, उन्होंने प्राचीन इंजीनियरिंग, खासकर 'कैटेनरी आर्च' (catenary arch) से प्रेरणा ली थी। यह एक ऐसा नैचुरली स्टेबल कर्व है जो वजन को अच्छे से बांटता है। पारंपरिक गोथिक बट्रेस (gothic buttresses) को न अपनाते हुए, गौडी ने पेड़ की तरह शाखाओं वाले कॉलम डिजाइन किए जो उस विशाल ढांचे को सहारा दे सकें। इसका नतीजा एक ऑर्गेनिक, लगभग जीवित लगने वाला आर्किटेक्चर था, जिसने इंजीनियरिंग और कला के बीच के अंतर को मिटा दिया।
गौडी के जीवनी लेखक और कला इतिहासकार गिज वैन हेन्सबर्गेन ने बीबीसी को बताया, 'वे साफ तौर पर गणित में बहुत दिलचस्पी रखते थे, लेकिन ऐसा हमेशा इसलिए था क्योंकि वे इसे बनाने वाले (ईश्वर) का काम मानते थे।' वैन हेन्सबर्गेन के अनुसार, गौडी गुरुत्वाकर्षण और कैटेनरी आर्च को ईश्वरीय आविष्कार मानते थे। उनके लिए यह एक शानदार मुख्य विषय (leitmotif) जैसा रहा होगा, जो महान वास्तुकार के तौर पर ईश्वर की ओर इशारा करता है।
गौडी को पता था, नहीं देख पाएंगे बना हुआ पूरा चर्च
गौडी को शुरू से ही पता था कि वे इस प्रोजेक्ट को पूरा होते हुए नहीं देख पाएंगे। उन्होंने बेसिलिका के लिए अपने जीवन के 40 से ज्यादा साल समर्पित कर दिए, लेकिन 1926 में जब एक ट्राम की टक्कर से उनकी मौत हुई, तब तक इसका सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा ही बन पाया था।
उस समय चर्च के मशहूर टावरों में से सिर्फ एक ही पूरा हो पाया था और उनकी मौत के बाद यह प्रोजेक्ट धीमा पड़ गया। हालांकि, गौडी को इसका अंदाजा था और उन्होंने भविष्य के आर्किटेक्ट्स की मदद के लिए डिटेल्ड मॉडल बनाए थे। फिर भी, काम की रफ्तार बहुत धीमी हो गई। जल्द ही, एक और बड़ी रुकावट आई।
युद्ध, विनाश और खोए हुए ब्लूप्रिंट का संकट
साल 1936 में भड़के स्पेनिश गृहयुद्ध (Spanish Civil War) ने सग्रादा फैमिलिया चर्च के निर्माण को सबसे गहरा जख्म दिया। CNN की रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध के दौरान अराजक तत्वों ने बेसिलिका के कई हिस्सों को आग के हवाले कर दिया था, जिसमें एंटोनी गौडी द्वारा बनाए गए मूल नक्शे, स्केच और प्लास्टर के अमूल्य 3D मॉडल्स पूरी तरह नष्ट हो गए। इस भारी नुकसान के कारण बाद के दशकों में काम करने वाले आर्किटेक्ट्स के सामने एक बड़ा संकट खड़ा हो गया। उन्हें गौडी की सोच को सीधे कॉपी करने के बजाय पुरानी तस्वीरों, बचे-कुचे नोट्स और मलबे से मिले टुकड़ों के आधार पर उनके विज़न को नए सिरे से डिकोड और री-कंस्ट्रक्ट करना पड़ा, जो एक बेहद थका देने वाली प्रक्रिया थी।
गौडी की ज्यामिति (Geometry) का जादुई फॉर्मूला
इन तमाम रुकावटों के बावजूद गौडी का डिजाइन दर्शन कभी नहीं मरा। चर्च के मौजूदा मुख्य वास्तुकार जोर्डी फौली (Jordi Faulí) ने मीडिया आउटलेट को दिए एक इंटरव्यू में इसके पीछे का दिलचस्प राज खोला। उन्होंने बताया कि गौडी के काम के पीछे जो ज्यामितीय लॉजिक (Geometric Logic) था, उसे समझ लेने के बाद बिना पूरे नक्शों के भी उनके इरादों को समझना आसान हो गया था।
जोर्डी फौली ने कहा, 'गौडी ने सिर्फ एक इमारत नहीं बनाई, बल्कि डिजाइनिंग का एक पूरा सिस्टम तैयार किया था। जब हम उनके बचे हुए मॉडल्स के टुकड़ों या उनकी तस्वीरों का विश्लेषण करते हैं, तो हम उन्हें आसानी से डिकोड कर लेते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि हम उन सतहों (Surfaces) और उनके इंटरसेक्शन को अच्छी तरह समझते हैं जिनका इस्तेमाल गौडी ने इस प्रोजेक्ट में किया था।'
बजट का संकट और कोविड-19 की मार
चर्च के निर्माण में इतनी लंबी देरी की दूसरी सबसे बड़ी वजह इसका अनोखा फंडिंग मॉडल रहा है। सग्रादा फैमिलिया एक 'एक्सपिएटरी टेम्पल' (Expiatory Temple) है, जिसका मतलब है कि इसका निर्माण पूरी तरह से आम लोगों के गुप्त दान और यहां आने वाले पर्यटकों के टिकट से मिलने वाले पैसों पर ही निर्भर है।
चर्च के गेट को लेकर भी विवाद
इस वजह से बाहरी परिस्थितियों का असर सीधे इसके निर्माण पर पड़ा:
कोविड-19 का झटका: कोरोना महामारी के दौरान जब दुनिया थम गई और पर्यटन पूरी तरह ठप हो गया, तो चर्च का काम भी पूरी तरह रुक गया था। CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, फंडिंग का मुख्य जरिया (टिकटों की बिक्री) अचानक बंद हो जाने के कारण निर्माण कार्य की रफ्तार बेहद धीमी हो गई।
2025 में जबरदस्त बाउंस-बैक: महामारी का दौर बीतने के बाद जैसे ही पर्यटन उद्योग ने दोबारा रफ्तार पकड़ी, इस प्रोजेक्ट को भी नई जिंदगी मिल गई। हाल ही में साल 2025 तक यहां हर साल आने वाले पर्यटकों की संख्या रिकॉर्ड 50 लाख के करीब पहुंच गई। इस बंपर टूरिज्म से मिले भारी-भरकम वित्तीय सहयोग ने काम की रफ्तार को कई गुना बढ़ा दिया है।
इंजीनियरिंग की सीमाएं और मीनारों का भारी वजन
अगर इतिहास में कोई युद्ध या महामारी न भी आती, तो भी इस बेसिलिका की अपनी जटिलता ऐसी थी कि इसे बनने में दशकों का समय लगना तय था। गौडी का यह डिजाइन उस दौर की स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग की सीमाओं को चुनौती दे रहा था। BBC की एक रिपोर्ट के अनुसार, इंजीनियर्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन आसमान छूती मीनारों के विशालकाय वजन को संभालना और उन्हें बिना किसी पारंपरिक लोहे-कंक्रीट के ढांचे के केवल पत्थरों के संतुलन पर टिकाना था, जिसने आधुनिक विज्ञान को भी सोचने पर मजबूर कर दिया।
पत्थरों को तेज हवा के दबाव और टूटने से बचाने के लिए इंजीनियर्स ने आधुनिक 'प्री-स्ट्रेस्ड स्टोन पैनल्स' और स्टील टेंडन का इस्तेमाल किया है, जो पत्थरों को आपस में जकड़ कर मजबूत रखते हैं।
CNN के अनुसार, डिजिटल मॉडलिंग, कंप्यूटर से चलने वाली स्टोन-कटिंग (मशीनों से पत्थरों की कटाई) और औद्योगिक फैब्रिकेशन ने पिछले कुछ दशकों में निर्माण कार्य की रफ्तार को कई गुना बढ़ा दिया है।
चर्च की मुख्य मीनार (Tower of Jesus Christ) के शीर्ष पर लगने वाला 100 टन वजनी क्रॉस स्टेनलेस स्टील और कंक्रीट से जमीन पर अलग-अलग हिस्सों में तैयार किया गया, जिसे बाद में क्रेन से ऊपर ले जाकर असेंबल किया गया। वजन घटाने और मजबूती के लिए इसमें ऐसे आधुनिक स्टेनलेस स्टील का इस्तेमाल हुआ है, जो गौडी के जमाने में मौजूद नहीं था।
नया विवाद: घर तोड़े जाने का विरोध और AI का इस्तेमाल
चर्च का मुख्य ढांचा भले ही अपनी पूरी ऊंचाई छू चुका है, लेकिन इसका मुख्य प्रवेश द्वार (Glory Façade) अभी बनना बाकी है। CNN के अनुसार, इस गेट को बनाने के लिए आस-पास की कई रिहायशी इमारतों (घरों) को तोड़ा जा सकता है, जिसका स्थानीय निवासी कड़ा विरोध कर रहे हैं।
वहीं, BBC की रिपोर्ट के मुताबिक, आज इस ऐतिहासिक इमारत की सुरक्षा और पत्थरों में आने वाली दरारों की जांच करने के लिए ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
जब शिल्पकार एंटोनी गौडी से पूछा गया था कि यह चर्च कब पूरा होगा, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा था, मेरे क्लाइंट (भगवान) को कोई जल्दी नहीं है।' आज 144 साल बाद उनका वो सपना पूरा होने के कगार पर है।
