Putin-Jinping meeting : रूस-यूक्रेन युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देशों के समीकरण को बदल दिया है। इस युद्ध के बाद अमेरिका के नेतृत्व में नाटो देशों ने रूस को अलग-थलग करने की कोशिश की है लेकिन वे अपने इस अभियान में पूरी तरह सफल नहीं हुए हैं। यूक्रेन मसले पर रूस को चीन का समर्थन मिला है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मास्को यात्रा दोनों देशों के बीच बढ़ती करीबी का साफ संकेत हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके रणनीतिक एवं सामरिक मायने हैं। रणनीतिकार मानते हैं कि रूस और चीन के बीच निकटता दोनों को फायदा पहुंचाएगी। यहां हम समझेंगे चीन और रूस की बढ़ती नजदीकी के मायने क्या हैं और कैसे दोनों दिश मिलकर अमेरिकी प्रभाव को कम कर सकते हैं।
चीन और रूस में बढ़ रही नजदीकी।
अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचाएगी रूस-चीन की करीबी
बीजिंग और मास्को जितने एक दूसरे के करीब आएंगे अमेरिका सहित पश्चिमी देशों के हितों को उतना ही नुकसान पहुंचेगा। रूस और चीन की जुगलबंदी से अमेरिका कमजोर होगा। चीन के दखल से खाड़ी के दो विरोधी देश सऊदी अरब और ईरान में ऐतिहासिक समझौता हुआ है। सऊदी अरब और ईरान की दोस्ती को अमेरिका के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है। इसी तरह पांचों महाद्वीप में जहां भी रूस और चीन का दबदबा बढ़ेगा उससे वाशिंगटन का कूटनीतिक असर कम होगा। देशों जिनपिंग की मास्को यात्रा से यह संकेत गया है कि अमेरिका की लाख कोशिशों के बावजूद रूस अलग-थलग नहीं पड़ा है बल्कि उसे दुनिया की एक महाशक्ति का साथ मिला है। चीन को अपने साथ लाकर पुतिन अमेरिका को एक बड़ा कूटनीतिक झटका दिया है। यह बात अलग है कि रूस का समर्थन करने के पीछे जिनपिंग की अपनी महात्वाकांक्षाएं एवं योजनाएं है।
संयुक्त रूप से अमेरिकी दबदबे को चुनौती दे सकते हैं बीजिंग-मास्को
साल 1991 में यूएसएसआर के विघटन के बाद रूस सैन्य एवं आर्थिक रूप से कमजोर हुआ। हापांकि, राष्ट्रपति पुतिन के प्रयासों से उसने अपनी खोई हुई शक्ति दोबारा पाने की कोशिश की है लेकिन सुपरपावर का वह रुतबा वह हासिल नहीं कर सका जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद और उसके बिखराव से पहले तक था। बीते दशकों में रूस सैन्य एवं आर्थिक दोनों मोर्चों पर कमजोर हुआ है और इसका असर उसके कूटनीतिक प्रभाव पर भी पड़ा है। पश्चिमी देशों के आर्थिक प्रतिबंधों और यूक्रेन युद्ध में फंसे रूस के लिए आर्थिक एवं सैन्य मदद चाहिए होगी। मास्को को यह मदद एवं सहयोग चीन से मिल सकता है।
संयुक्त सैन्याभ्यास बढ़ाएंगे रूस और चीन
चीन रूस से गैस एवं तेल की खरीदारी बड़ी मात्रा में करता है। दूसरा इस तरह की रिपोर्टें भी आईं कि चीन रूस को हथियारों की आपूर्ति करने वाला है। जाहिर है कि चीन का सहयोग रूस के लिए एक बड़ी राहत होगी। अमेरिकी घेरेबंदी से परेशान चीन को भी एक मजबूत साथी चाहिए। रूस में उसे अपना एक साझेदार नजर आ रहा है। जिनपिंग के मास्को यात्रा के दौरान दोनों देशों ने कहा है कि आने वाले समय में वे अपना संयुक्त सैन्याभ्यास नियमित रूप से करेंगे और अपनी सेनाओं के बीच सहयोग और बढ़ाएंगे। कहावत है कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। यह भावना दोनों देशों को एक साथ ला रही है। मास्को में जिनपिंग ने अमेरिका और नाटो को अपने निशाने पर लिया। अपने संयुक्त बयान में पुतिन और शी ने कहा कि एशिया में नाटो के बढ़ते प्रभाव एवं वर्चस्व से दोनों देश चिंतित हैं। चीन और रूस ने वाशिंगटन पर वैश्विक सुरक्षा को कमजोर करने का आरोप लगाया।
यूक्रेन संकट खत्म करने के लिए चीन ने पेश की योजना
यूक्रेन संकट दूर करने के लिए जिनपिंग ने एक योजना पेश की है। पुतिन ने कहा कि वह यूक्रेन में जारी संकट के समाधान की चीनी राष्ट्रपति की योजना का स्वागत करते हैं। रूसी राष्ट्रपति का कहना है कि चीन की शांति योजना यूक्रेन में लड़ाई के समाधान के लिए एक आधार प्रदान कर सकती है बशर्ते कि पश्चिमी देश इसके लिए तैयार हों। पुतिन का आरोप है कि चीन की इस योजना पर अमेरिका और पश्चिमी देश कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। जाहिर है कि यूक्रेन में युद्ध जारी रखना है या इसे खत्म करना है, इसके बारे में अंतिम फैसला जेलेंस्की नहीं बल्कि अमेरिका करेगा। लेकिन अमेरिका के तेवरों और पश्चिमी देशों की ओर से यूक्रेन को हो रही हथियारों की आपूर्ति से नहीं लगता कि रूस-यूक्रेन युद्ध निकट भविष्य में खत्म होगा। इसे इस बात से भी समझा जा सकता है कि जिनपिंग मास्को से निकलने की तैयारी ही कर रहे थे कि पश्चिमी देशों ने कीव के लिए करीब 16 अरब डॉलर के लोन पैकेज की घोषणा की।
