लखनऊ में 'रावण' के साथ नहीं जलेंगे 'कुंभकरण' और 'मेघनाद' के पुतले, वजह है बेहद खास

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  • Updated Oct 3, 2022, 11:23 PM IST

Kumbhakaran and Meghnad effigies: पुतले जलाने की परंपरा करीब तीन सदी पहले शुरू की गई थी। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम तक संतों द्वारा दोनों परंपराओं का संचालन किया गया। लखनऊ के नवाब भी रामलीला देखने जाया करते थे। विद्रोह के बाद सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा समारोह को आगे बढ़ाया गया।

Kumbhakaran and Meghnad effigies burn: उत्तर प्रदेश में 300 से अधिक वर्षो के बाद ऐशबाग रामलीला समिति ने इस दशहरे पर रावण के साथ कुंभकरण और मेघनाद के पुतले जलाने की प्रथा को बंद करने का निर्णय लिया है।आयोजकों ने कहा, इसका कारण यह है कि सभी रामायण ग्रंथों में उल्लेख है कि कुंभकरण और मेघनाद ने रावण को भगवान राम के खिलाफ लड़ने से रोकने की कोशिश की थी, वह भगवान राम को विष्णु का अवतार मानते थे, लेकिन जब रावण ने उनकी सलाह नहीं मानी तो उन्हें युद्ध में भाग लेना पड़ा।

Ravana effigies

प्रतीकात्मक फोटो

यह विचार सबसे पहले ऐशबाग दशहरा और रामलीला समिति के अध्यक्ष हरिश्चंद्र अग्रवाल और सचिव आदित्य द्विवेदी ने पांच साल पहले रखा था, लेकिन अन्य सदस्यों ने इसे इस आधार पर खारिज कर दिया कि तीनों का पुतला जलाना 300 साल पुरानी परंपरा का हिस्सा है।

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