Gap Between Railway Tracks: रेलवे ट्रैक (Railway Tracks) पर आपने अक्सर देखा होगा कि पटरियों के जोड़ (Joint) के बीच थोड़ा-सा गैप छोड़ा जाता है। इस गैप को लेकर बहुत से लोगों को लगता है कि यह निर्माण में गलती या डिजाइन का हिस्सा भर है, लेकिन असल में इसके पीछे एक बड़ा वैज्ञानिक कारण होता है, जिसकी जानकारी बहुत कम लोगों को होती है। इस गैप को लेकर यह जानकारी आपके लिए काफी रोचक हो सकती है। आइए जानते पटरियों के बीच ये छोटा-सा गैप क्यों छोड़ा जाता है-
Railway Tracks (Photo: iStock)
पटरियों के जोड़ पर क्यों दिया जाता है गैप?
Railway Tracks (Photo: iStock)
रेलवे पटरियों के जोड़ पर थोड़ा सा गैप देना जरूरी है क्योंकि धातु (Metal) गर्म होने पर फैलती है और ठंडी होने पर सिकुड़ती है। रेलवे ट्रैक ज्यादातर लोहे या स्टील से बनाए जाते हैं। जब गर्मियों में तेज धूप पड़ती है, तो पटरियों का तापमान काफी बढ़ जाता है। तापमान बढ़ने पर स्टील की लंबाई भी थोड़ी बढ़ जाती है। इसी वजह से रेलवे ट्रैक के जोड़ के बीच थोड़ा खाली स्थान छोड़ा जाता है, ताकि फैलने के लिए जगह मिल सके।
जोड़ पर गैप न दिया जाए तो क्या होगा?
अगर रेलवे ट्रैक में यह गैप न छोड़ा जाए, तो गर्मियों में पटरियां मुड़ सकती हैं और बड़ा हादसा भी हो सकता है।
इसे ऐसे समझ सकते हैं कि अगर पटरियों के बीच गैप न हो तो गर्मी में धातु फैलने के दौरान पटरियां एक-दूसरे पर दबाव डालने लगेंगी। इससे ट्रैक टेढ़ा या मुड़ा हुआ हो सकता है। इस स्थिति को बकलिंग (Buckling) कहा जाता है। ऐसी स्थिति ट्रेन की स्टेबिलिटी को प्रभावित कर सकती है और दुर्घटना का खतरा बढ़ सकता है। वहीं, सर्दियों में इसका उल्टा प्रभाव देखने को मिलता है। ठंड के मौसम में धातु सिकुड़ती है, जिससे पटरियों के बीच का गैप थोड़ा बढ़ जाता है। यही वजह है कि इंजीनियर तापमान के हिसाब से ट्रैक डिजाइन करते हैं, ताकि गर्मी और ठंड दोनों मौसमों में रेलवे लाइन सुरक्षित बनी रहे।
गैप थर्मल एक्सपैंशन के सिद्धांत पर आधारित
रेलवे ट्रैक के जोड़ पर छोड़ा गया यह गैप थर्मल एक्सपैंशन के सिद्धांत पर आधारित होता है। फिजिक्स में इसे पदार्थों का ऊष्मीय प्रसार (Thermal Expansion) कहा जाता है। यही सिद्धांत बिजली के तारों, पुलों और बड़े मेटल स्ट्रक्चर में भी इस्तेमाल किया जाता है।
हालांकि आजकल कई जगहों पर मॉडर्न वेल्डेड ट्रैक्स का इस्तेमाल किया जा रहा है। इनमें लंबी पटरियों को जोड़कर लंबा ट्रैक बनाया जाता है। लेकिन इनमें भी एक्सपैंशन और कॉन्ट्रैक्शन को संभालने के लिए विशेष इंजनीयरिंग तकनीकें अपनाई जाती हैं। इंजीनियर ट्रैक में स्ट्रेस बैलेंस बनाए रखने के लिए अलग-अलग तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं।
पटरियों में होने वाली वेल्डिंग की गुणवत्ता होगी बेहतर
इसके अलावा, सरकार अब रेल पटरियों में होने वाली वेल्डिंग की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए एक नई तकनीक के इस्तेमाल करेगी। इस तकनीक का नाम मैग्नेटिक पार्टिकल टेस्टिंग (Magnetic Particle Testing) है, जो आपस में जोड़े जाने वाली वेल्डिंग के सूक्ष्म दोषों को पहचानने में काफी कारगर मानी जाती है।
