आज के दौर में स्मार्टफोन हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है, लेकिन इसी के साथ बच्चों और युवाओं के लिए डिजिटल सुरक्षा एक बड़ी चुनौती बन गई है। हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट और केंद्र सरकार ने एक बेहद सख्त रुख अपनाते हुए टेक दिग्गज कंपनी गूगल (Google) और एप्पल (Apple) को निर्देश दिए हैं कि वे अपने प्लेटफॉर्म यानी 'प्ले स्टोर' और 'ऐप स्टोर' से उन सभी ऐप्स को तुरंत हटाएँ जो अश्लीलता (Pornography) और अपराध (Crime) को बढ़ावा दे रहे हैं। कोर्ट की टिप्पणी बेहद गंभीर है, जिसमें कहा गया है कि ऐसे ऐप्स न केवल समाज की मर्यादा को ठेस पहुंचा रहे हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ी को भी बर्बाद कर रहे हैं।
दिल्ली हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी
एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि गूगल और एप्पल जैसी बड़ी कंपनियों की यह जिम्मेदारी है कि वे अपने प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री की निगरानी करें। कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा कि कई ऐसे ऐप्स धड़ल्ले से चल रहे हैं जो बिना किसी उम्र के सत्यापन (Age Verification) के अश्लील सामग्री और आपराधिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने वाले वीडियो दिखा रहे हैं। अदालत ने इन कंपनियों से पूछा कि उनके 'सेफ्टी फिल्टर' और 'कंटेंट मॉडरेशन' सिस्टम इन ऐप्स को पकड़ने में नाकाम क्यों रहे? कोर्ट का मानना है कि डिजिटल स्वतंत्रता के नाम पर नैतिकता और कानून के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता।
सरकार का एक्शन मोड
कोर्ट के साथ-साथ सरकार भी अब इस मामले में पूरी तरह 'एक्शन मोड' में नजर आ रही है। आईटी मंत्रालय (MeitY) ने कंपनियों को स्पष्ट कर दिया है कि अगर वे आईटी नियमों का पालन नहीं करती हैं और अश्लील या आपराधिक ऐप्स पर कार्रवाई करने में विफल रहती हैं, तो उन्हें मिलने वाली कानूनी छूट (Safe Harbour) छीनी जा सकती है। इसका मतलब यह है कि अगर किसी ऐप के कारण कोई अपराध होता है, तो उस ऐप के साथ-साथ उसे होस्ट करने वाली कंपनी (जैसे गूगल या एप्पल) को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। सरकार अब इन प्लेटफॉर्म्स की नियमित ऑडिटिंग करने की योजना बना रही है।
ऐप्स के जरिए बढ़ता अपराध
विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ पोर्नोग्राफी ही नहीं, बल्कि कई ऐसे ऐप्स भी हैं जो 'डार्क वेब' जैसी गतिविधियों, सट्टेबाजी और हिंसक कंटेंट को बढ़ावा दे रहे हैं। कई ऐप्स युवाओं को कम समय में गलत तरीके से पैसा कमाने या अपराध की ओर आकर्षित करने वाले गेमिंग और वीडियो दिखाते हैं। दिल्ली पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियों ने भी अपनी रिपोर्ट में बताया है कि कई साइबर अपराधों की जड़ें इन्ही संदिग्ध ऐप्स से जुड़ी होती हैं। ऐसे में इन पर लगाम लगाना राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा, दोनों के लिए अनिवार्य हो गया है।
गूगल और एप्पल की जिम्मेदारी
आमतौर पर ये कंपनियाँ तर्क देती हैं कि वे केवल एक प्लेटफॉर्म (Intermediary) हैं और डेवलपर क्या अपलोड करता है, इस पर उनका पूरा नियंत्रण नहीं होता। लेकिन नए आदेशों के बाद उन्हें अपनी पॉलिसी में बड़ा बदलाव करना होगा। उन्हें अब आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस (AI) और मानव समीक्षा (Human Review) के जरिए ऐसे ऐप्स को फिल्टर करना होगा जो नियमों का उल्लंघन करते हैं। इसके अलावा, यूजर की शिकायतों पर 24 से 48 घंटों के भीतर कार्रवाई करना भी अब अनिवार्य होगा।
