मोबाइल फोन्स आज के समय में बेहद जरूरी चीज बन चुका है। बिना मोबाइल फोन्स के हमारे कई जरूरी काम रुक सकते हैं। अगर मोबाइल फोन्स में रिचार्ज प्लान न हो तो यह किसी काम का नहीं है। आपको बता दें कि भारत में मोबाइल फोन इस्तेमाल करने वाले दो तरह के यूजर्स हैं जिसमें स्मार्टफोन और फीचर मोबाइल फोन यूजर्स शामिल हैं। स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले यूजर्स के लिए इंटरनेट डेटा एक जरूरी चीज बन जाता है। इंटरनेट के जरिए वे यूट्यूब देखना, सोशल मीडिया चलाना, ऑफिस वर्क करना, रील्स स्क्रॉल करना आदि काम करते हैं। लेकिन वहीं एक ऐसा बड़ा तबका है जो सिर्फ कॉलिंग और जरूरी मैसेज के लिए फीचर फोन का इस्तेमाल करता है। हालांकि हैरानी वाली बात यह है कि भले ही दोनों ही यूजर्स की जरूरत अलग-अलग हो लेकिन रिचार्ज प्लान्स के लिए लगभग एक जैसा ही पैसा खर्च करना पड़ता है।
देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं जो मोबाइल में डेटा का इस्तेमाल नहीं करते हैं।
हालांकि टेलीकॉम कंपनियों की मनमानी पर जब TRAI की तरफ से यह प्रस्ताव दिया गया कि केवल वॉयस कॉल और एसएमएस वाले प्लान भी उसी अवधि की वैलिडिटी के साथ उपलब्ध होने चाहिए, जितनी डेटा प्लान्स में दी जाती है तो टेलीकॉम कंपनियों को बड़ा विरोध किया था। उस समय कुछ वक्त के लिए लोगों की तरफ इस पर ध्यान गया था। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब किसी व्यक्ति को डेटा की जरूरत नहीं, उसके फोन में इंटरनेट ठीक से काम करता नहीं तो फिर उसे डेटा वाले प्लान के लिए भुगतान क्यों करना पड़ रहा है। यही एक बड़ी वजह है कि पिछले कुछ समय में केवल कॉल और एसएमएस की जरूरत रखने वाले ग्राहकों के लिए अलग और किफायती प्लान की मांग लगातार उठ रही है।
20 करोड़ फीचर फोन यूजर्स
भारत में आज भी लगभग 20 करोड़ लोग 2G फीचर फोन का उपयोग करते हैं। इन लोगों के लिए मोबाइल फोन मुख्य रूप से कॉल करने, कॉल रिसीव करने, बैंक से आने वाले OTP पाने या फिर पेंशन या अन्य जरूरी संदेश देखने का साधन है। इन लोगों के लिए इंटरनेट बिल्कुल भी जरूरी नहीं है लेकिन इसके बावजूद भी उन्हें उसी प्लान को लेना पड़ता है जो स्मार्टफोन को ध्यान में रखकर डिजाइन किए गए हैं। इंटरनेट का इस्तेमाल उनकी प्राथमिक जरूरतों में शामिल नहीं होता।
टेलीकॉम एक्सपर्ट Parag Kar के मुताबिक भारत में दो बिल्कुल अलग तरह के टेलीकॉम यूजर्स हैं जिसमें दूर दराज के इलाके और दिहाड़ी मजदूर के लोग शामिल हैं। ये ऐसे लोग हैं जिनके पास 2G नेटवर्क पर चलने वाला फोन है। डिजिटल वर्ल्ड के तौर पर उनका मोबाइल नंबर ही उनकी डिजिटल पहचान है। मोबाइल फोन रखने का मकसद यह है कि उनका मोबाइल नंबर बैंक से जुड़ा है, आधार कार्ड से नंबर जुड़ा है। इसके अलावा सरकारी योजनाओं के लिए मैसेज और ओटीटी पाने के लिए नंबर रखना है। ये यूजर्स- स्मार्टफोन यूजर्स से पूरी तरह से अलग हैं लेकिन इसके बाद भी दोनों को एक ही डेटा प्लान खरीदना पड़ता है। ऐसा क्यो है ? पराग की मानें तो यह एक बड़ा सवाल है लेकिन इस पर न तो टेलीकॉम कंपनियां ध्यान दे रही हैं और न ही पॉलिसी बनाने वाले लोग।
TRAI के डेटा से साफ हुई तस्वीर
Parag Kar की तरफ से TRAI के कुछ आंकड़ों को भी शेयर किया गया, जो मोबाइल डेटा इस्तेमाल की मौजूदा तस्वीर को काफी हद तक स्पष्ट करते हैं। TRAI के दिसंबर 2025 तिमाही के डेटा के अनुसार, भारत में कुल वायरलेस डेटा खपत करीब 73,324 पेटाबाइट रही। इसमें 4G नेटवर्क पर लगभग 44,087 पेटाबाइट और 5G नेटवर्क पर करीब 29,094 पेटाबाइट डेटा इस्तेमाल हुआ। यानी देश की लगभग पूरी मोबाइल डेटा जरूरत 4G और 5G नेटवर्क ही पूरी कर रहे हैं।
वहीं, 2G नेटवर्क पर डेटा खपत केवल 48 पेटाबाइट दर्ज की गई। प्रतिशत के हिसाब से यह कुल डेटा उपयोग का लगभग 0.07% ही है। सरल शब्दों में कहें तो जहां 4G और 5G का डेटा उपयोग बेहद विशाल स्तर पर है, वहीं 2G की हिस्सेदारी बेहद छोटी रह गई है। तुलना करें तो 2G पर इस्तेमाल होने वाली हर 1 यूनिट डेटा के मुकाबले 4G और 5G उपयोगकर्ता मिलकर लगभग 1,528 यूनिट डेटा खर्च कर रहे हैं। ये आंकड़े साफ दिखाते हैं कि भारत का मोबाइल डेटा इकोसिस्टम अब लगभग पूरी तरह 4G और 5G नेटवर्क पर आधारित हो चुका है, जबकि 2G की भूमिका बहुत सीमित रह गई है।
FY-26 की डेटा रिपोर्ट
FY-26 में प्रति मोबाइल सब्स्क्राइबर औसतन डेटा इस्तेमाल करीब 25.70 GB प्रति माह रहा। हालांकि यह औसत मुख्य रूप से उन करोड़ों स्मार्टफोन उपयोगकर्ताओं की वजह से है, जो 4G और 5G नेटवर्क पर बड़ी मात्रा में डेटा खर्च करते हैं।
अगर केवल 2G उपयोगकर्ताओं की बात करें, तो उनका डेटा इस्तेमाल बेहद कम माना जा सकता है। TRAI के आंकड़ों के अनुसार, कुल मोबाइल डेटा खपत में 2G की हिस्सेदारी सिर्फ 0.07% है, जो बेहद छोटी है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब कुछ उपयोगकर्ता डेटा का इस्तेमाल लगभग न के बराबर करते हैं, तो क्या उन्हें डेटा सेवाओं के लिए भुगतान करना चाहिए? यही मुद्दा आज टेलीकॉम टैरिफ और उपभोक्ता हितों की चर्चा का एक महत्वपूर्ण विषय बनता जा रहा है।
ग्राहकों को पर अतिरिक्त बोझ
पराग समझाते हुए कहते हैं कि अगर किसी 2G फीचर फोन में इंटरनेट आधारित सेवाओं का इस्तेमाल करना लगभग संभव ही नहीं है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि ऐसे में यूजर्स को डेटा के लिए अतिरिक्त पैसे क्यों देने पड़ें।
4G फीचर फोन के मामले में अलग बात है, क्योंकि उनमें डेटा आधारित कई सेवाएं चल सकती हैं। इसलिए उनके साथ डेटा प्लान जोड़े जाने के पीछे कुछ तर्क समझ में आते हैं। लेकिन पारंपरिक 2G फीचर फोन टेक्नोलॉजी के मामले में बहुत सीमित होते हैं और इनमें इंटरनेट उपयोग की क्षमता बेहद कम या लगभग न के बराबर होती है। ऐसे में कई लोगों का मानना है कि 2G फीचर फोन उपयोगकर्ताओं के लिए डेटा शामिल वाले प्लान कोई वास्तविक आवश्यकता नहीं हैं। उनकी नजर में यह ऐसे ग्राहकों पर अतिरिक्त खर्च का बोझ डालने जैसा है, जो मुख्य रूप से केवल कॉलिंग और SMS जैसी सेवाओं का उपयोग करते हैं।
