Dussehra 2025:दशहरा के दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था । वहीं, माता दुर्गा ने भी इसी दिन महिषासुर का संहार किया था। नवरात्रि के नौ दिनों के उपवास और पूजा के बाद दशमी तिथि को लोग उत्साह के साथ दशहरा मनाते हैं। इस पर्व की जलेबी और पान खाना एक खास परंपरा है। खासकर उत्तर भारत और गुजरात में इसको लोग मान्यताओं से जोड़ते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह परंपरा क्यों शुरू हुई और इसके पीछे क्या धार्मिक और वैज्ञानिक कारण हैं? अगर नहीं तो आइए जानते हैं।
दशहरा पर क्यों खाई जाती है जलेबी और पान? (pic credit- canva)
क्यों खाई जाती है दशहरा पर जलेबी?
एक कथा के अनुसार, भगवान श्रीराम को 'शश्कुली' नामक मिठाई बहुत पसंद थी, जिसे आज की जलेबी का प्राचीन रूप माना जाता है। कथा है कि लंका पर विजय के बाद हनुमान जी ने राम के लिए जलेबी और फाफड़ा बनवाया था। यह मिठाई राम की विजय और खुशी का प्रतीक बनी। दशहरा पर जलेबी खाना और बांटना भगवान श्रीराम की विजय को सेलिब्रेट करने का तरीका है। गुजरात में फाफड़ा-जलेबी की जोड़ी को राम-सीता के मिलन और विजय के उत्सव से जोड़ा जाता है।
वहीं वैज्ञानिक कारण की बात करें तो नवरात्रि के नौ दिनों के उपवास से शरीर में ऊर्जा कम हो जाती है। जलेबी, जो चीनी और
उड़द दाल से बनती है, तुरंत ग्लूकोज प्रदान करती है, जो थकान और कमजोरी दूर करती है। गर्म तेल में तलने से यह पाचन को उत्तेजित करती है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह उपवास के बाद शरीर को ऊर्जा देने का प्राकृतिक तरीका है। आयुर्वेद के अनुसार, सीमित मात्रा में जलेबी खाना पाचन और मेटाबॉलिज्म के लिए फायदेमंद है।
क्यों खाया जाता है पान?
माना जाता है कि रावण से युद्ध जीतने की खुशी को वानरों ने पान के पत्ते खाकर सेलिब्रेट किया था। उसी दिन विजयदशमी पर पान का सेवन करना शुभ माना जाने लगा। वहीं, वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो उपवास के बाद पाचन तंत्र कमजोर हो जाता है। पान का पत्ता एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों से भरपूर होता है, जो पाचन को बेहतर करता है और कब्ज से राहत देता है। इसमें मौजूद सुपारी और चूना पेट के एसिड को संतुलित करते हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, पान मुंह की दुर्गंध, सिरदर्द और दांत दर्द में राहत देता है। हालांकि, तंबाकू या अधिक चूने से बचें, क्योंकि यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। दशहरा पर शुद्ध पान सीमित मात्रा में खाना स्वास्थ्यवर्धक है।
डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी प्रचलित कथाओं और आयुर्वेदिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। Times Now Navbharat इसकी पुष्टि नहीं करता है।
