सोशल मीडिया में अभिनेता और गोरखपुर से बीजेपी सांसद रवि किशन का एक बयान काफी वायरल हो रहा है। हुआ ये कि संसद परिसर में किसी पत्रकार ने रवि किशन से कोई सवाल पूछा। रवि किशन ने जवाब देते हुए कहा कि- आज मेरा मौन व्रत है। मुझे आज शांत रहने दीजिए। मौन व्रत है इसीलिए कुछ बोल नहीं पाऊंगा।
हिंदू धर्म में क्या है मौन व्रत का महत्व (Photo: AI Generated)
रवि किशन का यह बयान वायरल होने लगा। लोग लिखने लगे कि रवि किशन बोल कर बता रहे हैं कि आज मेरा मौन व्रत है। रवि किशन ने पता नहीं किस संदर्भ में पत्रकार से कहा कि आज उनका मौन व्रत है। हालांकि यहां हमें जान लेना चाहिए कि मौन व्रत आखिर होता क्या है। क्या मौन व्रत में दिन भर कुछ नहीं बोलते या कुछ बोल सकते हैं? आखिर मौन व्रत के नियम क्या होते हैं?
क्या होता है मौन व्रत?
सामान्य हिंदी में देखें तो मौन व्रत का मतलब होता है शांत रहना, कुछ ना बोलना। इसका आध्यात्मिक अर्थ समझा जाए तो इसे वाणी पर संयम और नियंत्रण भी कह सकते हैं। हिंदू दर्शन में मौन व्रत मन, वाणी और इंद्रियों को संयमित कर रखा जाता है। यह एक तरह की आध्यात्मिक साधना है।
संस्कृत में मौन का संबंध 'मुनि' शब्द से माना जाता है। मुनि वह है जो मनन करता है। इसलिए मौन का अर्थ केवल वाणी पर विराम नहीं है। इसका संपूर्ण अर्थ भीतर चल रहे विचारों के शोर को भी शांत करना है। यही कारण है कि कई संत और योगी मौन को आत्मचिंतन का सबसे प्रभावी माध्यम बताते हैं।
हिंदी धर्म में मौन का महत्व
भगवद्गीता में भगवान कृष्ण वाणी के संयम को तप बताया है। अध्याय 17 के श्लोक 15 में कहा गया है कि ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जो सत्य हो, प्रिय हो और किसी को कष्ट न पहुंचाए। वहीं अध्याय 10 के श्लोक 38 में श्रीकृष्ण कहते हैं - मौनं चैवास्मि गुह्यानाम्। यानी रहस्यों में मैं स्वयं मौन हूं। इससे साफ है कि हिंदू दर्शन में मौन आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक माना गया है।
मनुस्मृति में इंद्रिय-निग्रह और वाणी-संयम को तपस्वी जीवन का आवश्यक अंग बताया गया है। हालांकि यहां मौन व्रत का अलग विधान नहीं मिलता, लेकिन कम बोलना और सत्य बोलना धर्म का हिस्सा माना गया है।
बात करें उपनिषदों की तो यहां ब्रह्म के अनुभव को शब्दों से परे बताया गया है। इसलिए कई आचार्यों ने मौन को उस ज्ञान की भाषा कहा है, जिसे शब्द व्यक्त नहीं कर सकते।
कितनी तरह से रखा जाता है मौन व्रत ?
हिंदू शास्त्रों और संत परंपराओं में मौन के कई रूप मिलते हैं। मौन व्रत को आध्यात्मिक ऊर्जा का मजबूत स्रोत भी माना जाता है। आइए जानें कितनी तरह से मौन व्रत रखा जाता है-
वाचिक मौन: यह मौन व्रत का सबसे सामान्य रूप है। इसमें व्यक्ति बोलना बंद करता है।
मानसिक मौन: यहां मन में चलने वाले अनावश्यक विचारों को शांत करने का प्रयास करना है। योग और ध्यान में इसे अधिक महत्वपूर्ण माना गया है।
पूर्ण मौन: न बोलना, न इशारों से संवाद करना और न ही लिखकर बात करना। कई संन्यासी इसका पालन करते हैं।
आंशिक मौन: दिन के कुछ घंटे या सप्ताह में एक दिन मौन रहना।
आध्यात्मिक मौन: जप, ध्यान और आत्मचिंतन के लिए रखा जाने वाला मौन।
मौन व्रत के नियम क्या माने जाते हैं?
जैसा कि हमने बताया मौन व्रत रखने का सीधा विधान किसी वेद या पुराण में नहीं है, इसीलिए इसके तय नियम भी नहीं हैं। अलग-अलग परंपराओं में नियम बदल सकते हैं। हालांकि सामान्य तौर पर मौन व्रत के ये नियम माने जाते हैं:
- पहले से संकल्प लेना।
- बिना आवश्यकता के किसी से बातचीत न करना।
- क्रोध, विवाद और कटु भाषा से दूर रहना।
- ध्यान, जप या स्वाध्याय करना।
- आवश्यकता पड़ने पर ही संकेत या लिखकर संवाद करना।
- व्रत पूरा होने पर शांत मन से मौन समाप्त करना।
क्या दूसरे धर्मों के लोग भी रखते हैं मौन व्रत?
मौन व्रत केवल हिंदू धर्म तक सीमित नहीं है। जैन धर्म में इसे तप और आत्मशुद्धि का महत्वपूर्ण साधन माना गया है। बौद्ध धर्म में 'आर्य मौन' और विपश्यना साधना के दौरान कई दिनों तक मौन रखा जाता है। ईसाई मठों में भी मौन प्रार्थना और आत्मचिंतन की पुरानी परंपरा है। वहीं इस्लाम में औपचारिक मौन व्रत का विधान नहीं है, लेकिन अनावश्यक बातें छोड़ने और कम बोलने की शिक्षा अवश्य दी गई है।
मौन व्रत से जुड़ी इन तमाम बातों को जानने के बाद अपने आप समझ में आ जाता है कि अलग-अलग धर्मों में मौन का स्वरूप भले बदल जाए, लेकिन उसका उद्देश्य लगभग एक ही है। मन को स्थिर करना, आत्मचिंतन करना और भीतर की आवाज को सुनना।
