Vat Savitri Purnima Katha: वट पूर्णिमा व्रत कथा, पढ़ें सावित्री सत्यवान की पौराणिक कहानी

Vat Savitri Purnima Katha: वट पूर्णिमा का व्रत महिलाओं द्वारा बड़ी श्रद्धा और प्रेम के साथ रखा जाता है। इसे सावित्री व्रत भी कहा जाता है। ये व्रत स्त्रियां अपने पति की लंबी आयु की कामना से करती हैं। चलिए जानते हैं वट सावित्री व्रत की पावन व्रत कथा।

Vat Savitri Purnima Katha And Sahitya In Hindi (वट सावित्री पूर्णिमा कथा): वट सावित्री व्रत की कथा सावित्री और उनके पति सत्यवान से जुड़ी है। कहते हैं सावित्री के पति की आयु अल्पायु थी जिस वजह से बेहद कम उम्र में उनकी मृत्यु हो गई थी। लेकिन इस घटना को सावित्री ने स्वीकार नहीं किया और उन्होंने यमराज से अपने पति के जीवन की रक्षा के लिए प्रार्थना की। यमराज ने सावित्री की सच्ची निष्ठा से प्रसन्न होकर उनके मृत पति को फिर से जीवन दान दे दिया। कहते हैं सावित्री को अपने पति के प्राण बरगद के पेड़ के नीचे ज्य़ेष्ठ पूर्णिमा के दिन प्राप्त हुए थे। इसलिए हर साल इस दिन वट पूर्णिमा का व्रत रखा जाता है। चलिए जानते हैं वट सावित्री व्रत की संपूर्ण व्रत कथा।

वट सावित्री पूर्णिमा कथा (Vat Savitri Purnima Katha In Hindi)

पौराणिक कथाओं के अनुसार पौराणिक काल में सावित्री नाम की एक अत्यंत पतिव्रता स्त्री थी। जिनका जन्म विशिष्ट परिस्थितियों में हुआ था। कहते हैं राजा अश्वपति को कोई संतान नहीं थी। एक समय उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए मंत्रोच्चारण करते हुए हर दिन करीब एक लाख आहुतियां दी थीं। लगातार 18 सालों तक इस उपाय को करने के बाद उन्हें मां सावित्री ने दर्शन देकर एक तेजस्वी कन्या प्राप्त होने का वरदान दिया। जिसके बाद राजा के घर एक पुत्री का जन्म हुआ जिसका नाम सावित्री रखा गया।

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