Tantrik Forms of Lord Ganesha: भगवान गणेश को आमतौर पर विघ्नहर्ता, प्रथम पूज्य और बुद्धि के देवता के रूप में पूजा जाता है, लेकिन तांत्रिक परंपरा में गणेश के कई ऐसे स्वरूप भी मिलते हैं जिनकी साधना सामान्य गणेश पूजा से अलग होती है। इनमें हेरंब गणपति, उच्छिष्ट गणपति, महागणपति, हरिद्रा गणपति, लक्ष्मी गणपति, शक्ति गणपति और एकाक्षर गणपति जैसे स्वरूप शामिल हैं। तांत्रिक परंपराओं में 10 महाविद्याओं में प्रत्येक के साथ एक गणपति का स्वरूप भी जुड़ा हुआ है। भगवान गणपति के इन स्वरूपों का पूजन करने से अष्ट सिद्धियों के साथ ही अकूत धन-संपत्ति और वाक् सिद्धि के साथ ही सभी प्रकार के बाधाओं और तंत्र-मंत्र से मुक्ति मिलती है।
भगवान गणेश के तांत्रिक स्वरूप कौन से हैं
विद्यार्णवतंत्र में भी 14 गणपति-स्वरूपों के ध्यान, मंत्र, यंत्र और मंत्रों के अनुष्ठानिक प्रयोग का विवरण दिया गया है। यह ग्रंथ लगभग 17वीं शताब्दी की एक बड़ी मंत्रशास्त्रीय संहिता के रूप में वर्णित है।
तंत्र में भगवान गणेश के 14 स्वरूप कौन से हैं
विद्यर्णवंतंत्र आधारित अध्ययन में एकाक्षर गणपति, विरि गणपति, लक्ष्मी गणपति, शक्ति गणपति, क्षिप्रप्रसादन गणपति, हेरंब गणपति, सुब्रह्मण्य गणपति, महागणपति, त्रैलोक्यमोहन गणपति, शक्ति गणपति का दूसरा स्वरूप, भोगलोल गणपति, हरिद्रा गणपति, वक्रतुण्ड गणपति और उच्छिष्ट गणपति का वर्णन मिलता है। गणेश परंपरा में इसके अलावा 32 गणपति स्वरूपों की परंपरा है। उसमें हरिद्रा, हेरंब, लक्ष्मी, महागणपति, उच्छिष्ट, एकाक्षर और क्षिप्रप्रसादन गणपति जैसे रूप शामिल हैं। आइए जानते हैं कि भगवान गणपति के तांत्रिक स्वरूप कौन से हैं।
एकाक्षर गणपति
एकाक्षर गणपति का संबंध सीधे बीजमंत्र साधना से है। तांत्रिक परंपरा में यह मंत्रप्रधान गणपति स्वरूप है। विद्यर्णवंतंत्र में एकाक्षर गणपति का बीज गं बताया गया है और इसी के आधार पर मंत्र-साधना का विधान मिलता है।
एकाक्षर गणपति की साधना
एकाक्षर गणपति की साधना में गणपति के स्वरूप का ध्यान करके गं बीज का जप किया जाता है। आगे के तांत्रिक अनुष्ठान में जप-संख्या, यंत्र और पुरश्चरण का विधान आता है। इसकी साधना मंत्र सिद्धि और गणपति उपासना को केंद्र में रखती है।
विरि गणपति
विरि गणपति तांत्रिक गणपति परंपरा का विशिष्ट स्वरूप है। विद्यर्णवंतंत्र में इनके लिए एक से अधिक मंत्रों का वर्णन मिलता है। इस रूप की साधना विशेष तांत्रिक प्रयोगों से जुड़ी हुई है।
विरि गणपति की साधना
विरि गणपति की पूजा में निर्धारित मंत्र का जप मुख्य होता है। तांत्रिक प्रयोग में मंत्र के साथ यंत्र और पुरश्चरण का विधान आता है। ग्रंथों में इन मंत्रों से जुड़े काम्य प्रयोगों के भी परिणाम बताए गए हैं।
लक्ष्मी गणपति
लक्ष्मी गणपति के नाम से ही इनके स्वरूप का उद्देश्य स्पष्ट होता है। इनकी साधना धन, समृद्धि, ऐश्वर्य और आर्थिक उन्नति से जुड़ी है। विद्यर्णवंतंत्र में लक्ष्मी गणपति का अलग स्वरूप, मंत्र और यंत्र दिया गया है।
लक्ष्मी गणपति की साधना
लक्ष्मी गणपति की पूजा में गणपति के साथ श्री-तत्व का ध्यान किया जाता है। लाल या पीले पुष्प, दीपक, नैवेद्य और मंत्र-जप के साथ पूजा की जाती है। तांत्रिक अनुष्ठान में लक्ष्मी गणपति यंत्र और निर्धारित जप-विधान का प्रयोग किया जाता है।
शक्ति गणपति
शक्ति गणपति गणेश और शक्ति के संयुक्त स्वरूप हैं। इस रूप की साधना शक्ति, सिद्धि और तांत्रिक ऊर्जा के लिए की जाती है। विद्यर्णवंतंत्र में शक्ति गणपति के दो अलग अध्याय मिलते हैं, जिससे इस स्वरूप की दो अलग तांत्रिक प्रस्तुतियां सामने आती हैं।
शक्ति गणपति की साधना
शक्ति गणपति की पूजा में पहले गणपति और शक्ति दोनों का ध्यान किया जाता है। इसके बाद संबंधित मंत्र का जप, यंत्र पूजा और निर्धारित आवरण पूजा की जाती है। सामान्य पूजन में लाल पुष्प, सिंदूर, दूर्वा और नैवेद्य अर्पित किया जाता है।
क्षिप्रप्रसादन गणपति
क्षिप्रप्रसादन गणपति को शीघ्र प्रसन्न होकर अनुग्रह देने वाले गणपति के रूप में पूजा जाता है। इनकी साधना कामना पूर्ति, बाधा निवारण और शीघ्र फल के लिए की जाती है। विद्यर्णवंतंत्र में इस स्वरूप का अलग मंत्र और यंत्र दिया गया है।
क्षिप्रप्रसादन गणपति की साधना
क्षिप्रप्रसादन गणपति की साधना में गणपति के ध्यान के बाद विशेष मंत्र का जप किया जाता है। तांत्रिक विधान में जप की निश्चित संख्या और उसके बाद अनुष्ठान का क्रम रखा जाता है। सामान्य पूजा में दूर्वा, मोदक और लाल पुष्प अर्पित किए जाते हैं।
हेरंब गणपति
हेरंब गणपति गणेश के सबसे विशिष्ट तांत्रिक रूपों में गिने जाते हैं। इनका स्वरूप सामान्य चतुर्भुज गणेश से अलग है। हेरंब गणपति को पंचमुखी और दशभुजी रूप में दिखाया जाता है और उनका वाहन मूषक की जगह सिंह होता है। उनके हाथों में पाश, अंकुश, परशु, जपमाला, मोदक और अन्य आयुधों का वर्णन मिलता है। हेरंब गणपति की साधना रक्षा, शक्ति, साहस और विघ्नों से मुकाबला करने के लिए की जाती है। गणेश के इस रूप को शक्तिशाली रक्षक स्वरूप के रूप में पूजा जाता है।
हेरंब गणपति की साधना
हेरंब गणपति की साधना में पंचमुखी स्वरूप का ध्यान किया जाता है। इसके बाद संबंधित मंत्र का जप और हेरंब यंत्र की पूजा की जाती है। तांत्रिक साधना में निश्चित जप, होम और अन्य अनुष्ठान का विधान संबंधित परंपरा से लिया जाता है।
सुब्रह्मण्य गणपति
सुब्रह्मण्य गणपति का नाम सामान्य गणेश पूजा में कम सुनाई देता है, लेकिन विद्यर्णवंतंत्र में यह स्वतंत्र तांत्रिक स्वरूप है। इस रूप की अपनी अलग ध्यान-पद्धति, मंत्र और अनुष्ठानिक व्यवस्था है।
सुब्रह्मण्य गणपति की साधना
सुब्रह्मण्य गणपति की साधना में गणपति के विशिष्ट स्वरूप का ध्यान करके मंत्र-जप किया जाता है। आगे यंत्र-पूजन और निर्धारित तांत्रिक प्रयोग किए जाते हैं।
महागणपति
महागणपति गणेश का विराट और शक्तिशाली तांत्रिक स्वरूप है। इनकी साधना सिद्धि, शक्ति, समृद्धि और विभिन्न तांत्रिक उद्देश्यों के लिए की जाती है। विद्यर्णवंतंत्र में महागणपति के ध्यान, मंत्र और यंत्र का अलग विधान दिया गया है।
महागणपति की साधना
महागणपति की साधना में पहले उनके विस्तृत स्वरूप का ध्यान किया जाता है। इसके बाद निर्धारित मंत्र का जप और यंत्र पूजा की जाती है। तांत्रिक पाठ में इनके मंत्र को अलग-अलग काम्य प्रयोगों में इस्तेमाल करने का भी उल्लेख है। उपलब्ध पाठ में आकर्षण, वशीकरण, स्तंभन जैसे प्रयोगों के साथ सिद्धियां और यक्षिणी-नियंत्रण जैसे तांत्रिक परिणामों का भी वर्णन है।
त्रैलोक्यमोहन गणपति
त्रैलोक्यमोहन गणपति का नाम ही इनके तांत्रिक स्वरूप की विशेषता बताता है। इस गणपति की साधना आकर्षण और प्रभाव से जुड़े तांत्रिक उद्देश्यों के लिए की जाती है। विद्यर्णवंतंत्र में इनके लिए अलग ध्यान और मंत्र-विधान है।
त्रैलोक्यमोहन गणपति की साधना
साधक पहले गणपति के निर्धारित ध्यान का पाठ करता है। इसके बाद संबंधित मंत्र का जप और यंत्र की पूजा की जाती है। विशेष तांत्रिक अनुष्ठान में जप और हवन की संख्या परंपरा के अनुसार तय होती है।
शक्ति गणपति का दूसरा स्वरूप
विद्यर्णवंतंत्र में शक्ति गणपति का दूसरा स्वरूप भी अलग अध्याय में रखा गया है। यह रूप भी गणेश और शक्ति के संयुक्त भाव को सामने रखता है। इस स्वरूप की साधना में गणपति के साथ शक्ति का ध्यान किया जाता है। मंत्र-जप, यंत्र पूजा और आवरण पूजन इसके प्रमुख अंग हैं। तांत्रिक उद्देश्य के अनुसार पूजा-विधान में अंतर आता है।
भोगलोल गणपति
भोगलोल गणपति की साधना भोग, ऐश्वर्य और विशेष कामनाओं के लिए की जाती है। यह विद्यर्णवंतंत्र में मिलने वाला विशिष्ट गणपति रूप है।
भोगलोल गणपति की साधना
भोगलोल गणपति की पूजा में विशेष नैवेद्य का महत्व रहता है। साधक गणपति के ध्यान के बाद संबंधित मंत्र का जप करता है और निर्धारित भोग अर्पित करता है। तांत्रिक अनुष्ठान में यंत्र और हवन भी शामिल किए जाते हैं।
हरिद्रा गणपति
हरिद्रा गणपति भगवान गणेश का पीतवर्ण स्वरूप है। हरिद्रा यानी हल्दी के कारण इस रूप का नाम पड़ा। इनकी साधना समृद्धि, आकर्षण और विशेष तांत्रिक प्रयोगों के लिए की जाती है। हरिद्रा गणपति का संबंध बगलामुखी उपासना की कुछ तांत्रिक परंपराओं से भी जोड़ा जाता है, हालांकि यह संबंध सभी गणपति परंपराओं में एक जैसा नहीं मिलता है।
हरिद्रा गणपति की साधना
हरिद्रा गणपति की पूजा में हल्दी, पीले वस्त्र और पीले पुष्प का प्रयोग किया जाता है। साधक पीले आसन पर बैठकर गणपति के पीतवर्ण स्वरूप का ध्यान करता है और संबंधित मंत्र का जप करता है। तांत्रिक अनुष्ठान में हल्दी से जुड़े यंत्र और जप-विधान का प्रयोग मिलता है।
वक्रतुण्ड गणपति
वक्रतुण्ड गणपति को गणेश के विघ्ननाशक और शक्तिशाली स्वरूप के रूप में पूजा जाता है। तांत्रिक साधना में इनके कई मंत्रों का वर्णन मिलता है और विद्यर्णवंतंत्र में वक्रतुण्ड के लिए अलग अध्याय है।
वक्रतुण्ड गणपति की साधना
वक्रतुण्ड गणपति की साधना में गणपति के स्वरूप का ध्यान करके मंत्र-जप किया जाता है। पूजा में दूर्वा, लाल पुष्प, सिंदूर और मोदक अर्पित किए जाते हैं। तांत्रिक विधान में संबंधित मंत्र के अलग-अलग प्रयोग बताए गए हैं।
उच्छिष्ट गणपति
उच्छिष्ट गणपति गणेश का बेहद गूढ़ तांत्रिक स्वरूप है। इनकी साधना सिद्धि, विशेष कामनाओं, मंत्र शक्ति और गूढ़ तांत्रिक प्रयोगों से जुड़ी है। विद्यर्णवंतंत्र में उच्छिष्ट गणपति के लिए कई मंत्रों का अलग-अलग विवरण मिलता है।
उच्छिष्ट गणपति की साधना
उच्छिष्ट गणपति की साधना में ध्यान, मंत्र-जप, यंत्र और विशेष पूजा-विधान शामिल हैं। विद्यर्णवंतंत्र में इनके कई मंत्रों के साथ उनके अनुष्ठानिक प्रयोग बताए गए हैं। कुछ विधानों में बली जैसे विशेष तांत्रिक कर्म का भी उल्लेख मिलता है। इनकी साधना जूठे मुख की जाती है। उच्छिष्ट गणपति की साधना सामान्य घर की गणेश पूजा से अलग मानी जाती है। इसके मंत्र और विशेष अनुष्ठान परंपरागत रूप से गुरु से प्राप्त करके किए जाते हैं।
दस महाविद्याओं से भी जुड़े हैं भगवान गणपति के तांत्रिक स्वरूप
तांत्रिक परंपराओं में दस महाविद्याओं के साथ गणपति के अलग-अलग स्वरूपों का संबंध बताया गया है। इनका क्रम हर तांत्रिक परंपरा में समान नहीं है। कुछ परंपराओं में महाकाली के साथ महागणपति, मां तारा के साथ उच्छिष्ट गणपति, त्रिपुरसुंदरी के साथ महागणपति, बगलामुखी के साथ हरिद्रा गणपति और कमला के साथ लक्ष्मी गणपति जैसे संबंध मिलते हैं। अलग तांत्रिक परंपराओं में गणपति के नाम और क्रम बदल सकते हैं। इस संबंध को तांत्रिक साधना में इसलिए महत्व मिलता है क्योंकि गणपति को साधना की शुरुआत में आने वाले विघ्नों को दूर करने वाले देवता के रूप में रखा जाता है। विशेष गणपति रूप संबंधित शक्ति-साधना के अनुकूल माना जाता है।
गणपति की तंत्र साधना में क्या-क्या होता है
तंत्र में गणपति साधना केवल प्रतिमा के सामने दीपक जलाने तक सीमित नहीं रहती। इसमें ध्यान, मंत्र, यंत्र, न्यास, जप, होम और विशेष अनुष्ठान शामिल होते हैं। कुछ स्वरूपों में विशेष रंग, विशेष पुष्प, नैवेद्य और साधना सामग्री का भी विधान मिलता है। जैसे हरिद्रा गणपति में हल्दी और पीला रंग प्रमुख होता है, जबकि उच्छिष्ट गणपति की साधना में अलग तांत्रिक सामग्री और विधि आती है।
क्या भगवान गणपति की तांत्रिक साधना घर पर की जा सकती है
सामान्य गणेश पूजा और तांत्रिक साधना अलग हैं। घर में गणेश जी की सामान्य पूजा, स्तोत्र-पाठ और नाम-जप आसानी से किया जा सकता है। लेकिन किसी विशिष्ट तांत्रिक गणपति का दीक्षा मंत्र, न्यास, पुरश्चरण या विशेष अनुष्ठान उसी तांत्रिक परंपरा के गुरु से मिले विधान के अनुसार किया जाता है। खासकर उच्छिष्ट गणपति, महागणपति और शक्ति गणपति जैसे स्वरूपों में मंत्र और अनुष्ठान का क्रम साधना परंपरा के अनुसार बदल सकता है।
डिसक्लेमर: यहां दी गई जानकारी तंत्र शास्त्र पर आधारित है और तंत्र विद्या के अच्छे जानकार लेखक द्वारा विश्लेषण करके दी गई है। यह केवल सूचना के लिए दी जा रही है। किसी भी साधना के लिए गुरु आज्ञा आवश्यक है। Times Now Navbharat इसकी पुष्टि नहीं करता है।
