Kark Sankranti: कर्क संक्रांति यानी सूर्य देव का कर्क राशि में प्रवेश - सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं है। यह प्रकृति, खगोल विज्ञान और भारतीय आस्था- तीनों को एक साथ जोड़ने वाला अवसर है। वैसे सूर्य के कर्क राशि में गोचर के साथ ही इनका दक्षिणायण होना मान लिया जाता है। कर्क संक्रांति के साथ ही 'देवताओं की रात' की चर्चा भी होने लगती है।
क्या होता है कर्क संक्रांति पर सूर्य का दक्षिणायन होना
साल 2026 में कर्क संक्रांति 16 जुलाई, गुरुवार को पड़ रही है। इस दिन स्नान, दान और सूर्य उपासना का विशेष महत्व बताया गया है। लेकिन उससे पहले समझते हैं कि आखिर दक्षिणायण होता क्या है।
कर्क संक्रांति 2026 की जानकारी
| विवरण | समय / तिथि |
|---|---|
| कर्क संक्रांति | 16 जुलाई 2026 (गुरुवार) |
| संक्रांति का क्षण | रात 11:45 बजे |
| पुण्य काल | दोपहर 12:27 बजे से शाम 7:20 बजे तक |
| पुण्य काल की अवधि | 6 घंटे 53 मिनट |
| महा पुण्य काल | शाम 5:02 बजे से शाम 7:20 बजे तक |
| महा पुण्य काल की अवधि | 2 घंटे 18 मिनट |
सूर्य का दक्षिणायण होना क्या होता है
अगर आसान भाषा में समझें तो पूरे साल सूर्य की स्थिति में हमें दो बड़े बदलाव दिखाई देते हैं। इन्हें उत्तरायण और दक्षिणायण कहा जाता है।
ज्योतिषाचार्य सुजीत महाराज बताते हैं कि जब सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करते हैं, तब दक्षिणायण की शुरुआत मानी जाती है। इसका मतलब यह नहीं कि सूर्य सचमुच दक्षिण दिशा की ओर चलने लगते हैं। दरअसल, पृथ्वी की परिक्रमा और उसके झुकाव (Axis Tilt) की वजह से हमें सूर्य की स्थिति बदलती हुई दिखाई देती है। भारतीय ज्योतिष ने इसी परिवर्तन को उत्तरायण और दक्षिणायण के रूप में समझाया है।
यही वजह है कि कर्क संक्रांति को केवल राशि परिवर्तन नहीं, बल्कि समय चक्र के एक नए चरण की शुरुआत भी माना जाता है।
कर्क संक्राति को 'देवताओं की रात' क्यों कहा जाता है
एस्ट्रोलॉजर मयंक शर्मा बताते हैं कि हिंदू धर्मग्रंथों में देवताओं और मनुष्यों के समय की गणना अलग-अलग बताई गई है। मान्यता है कि उत्तरायण देवताओं का दिन होता है, जबकि दक्षिणायण उनकी रात्रि मानी जाती है।
यहां एक दिलचस्प बात समझना जरूरी है। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि देवता सो जाते हैं या उनका कार्य रुक जाता है। 'दिन' और 'रात' यहां प्रतीकात्मक शब्द हैं।
दरअसल, दिन को सक्रियता, ऊर्जा और विस्तार का प्रतीक माना गया है, जबकि रात आत्मचिंतन, साधना और आध्यात्मिक उन्नति का समय मानी जाती है। इसलिए जब सूर्य दक्षिणायण होते हैं तो इस समय को भक्ति, तप, जप और ध्यान के लिए बेहद शुभ माना गया है। यहां यह भी स्पष्ट कर दें कि कर्क संक्रांति पर सूर्य दक्षिणायण होते हैं तो मकर संक्रांति पर वह उत्तरायण होते हैं।
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कर्क संक्रांति सिर्फ ज्योतिष नहीं, प्रकृति का भी संदेश देती है
अगर आपने ध्यान दिया हो तो कर्क संक्रांति के आसपास पूरे देश का मौसम भी बदलने लगता है। मानसून अधिकांश हिस्सों में सक्रिय हो चुका होता है। खेतों में हरियाली दिखाई देने लगती है और किसान नई फसल की तैयारी में जुट जाते हैं।
शायद यही वजह है कि भारत के अलग-अलग राज्यों में इस समय कई बड़े पर्व भी मनाए जाते हैं।
उत्तराखंड में हरेला, पंजाब में सावन संग्रांद और कई स्थानों पर भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का उत्साह भी इसी दौर में देखने को मिलता है। यानी कर्क संक्रांति केवल पंचांग की तारीख नहीं, बल्कि प्रकृति और संस्कृति के सुंदर संगम का प्रतीक भी है।
इस दिन क्या करना शुभ माना जाता है
ज्योतिषाचार्य सुजीत महाराज के अनुसार कर्क संक्रांति के दिन सुबह स्नान के बाद सूर्यदेव को जल अर्पित करना शुभ माना जाता है। यदि संभव हो तो तिल, गुड़, अन्न, वस्त्र, छाता या जरूरतमंदों को भोजन का दान भी किया जा सकता है।
वहीं एस्ट्रोलॉजर मयंक शर्मा का कहना है कि दक्षिणायण की शुरुआत भगवान शिव, भगवान विष्णु और सूर्यदेव की उपासना के लिए विशेष मानी जाती है। गायत्री मंत्र, आदित्य हृदय स्तोत्र और सूर्य मंत्रों का जाप भी इस दिन लाभकारी माना गया है।
क्या दक्षिणायण को अशुभ मानना सही है
बहुत से लोगों के मन में यह धारणा होती है कि दक्षिणायण शुरू होते ही शुभ कार्य नहीं करने चाहिए। लेकिन विशेषज्ञ इसे अधूरी जानकारी मानते हैं।
ज्योतिषाचार्य सुजीत महाराज के अनुसार, दक्षिणायण किसी भी तरह से अशुभ नहीं है। यह आध्यात्मिक साधना, आत्ममंथन और ईश्वर के प्रति समर्पण का काल माना गया है। कुछ मांगलिक कार्यों के लिए अलग धार्मिक परंपराएं जरूर हैं, लेकिन पूजा, व्रत, दान, तीर्थ और ध्यान के लिए यह समय बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
