Paryushan Parv 2026: श्वेतांबर जैन समाज का सबसे पवित्र पर्व पर्युषण आज, 8 सितंबर 2026 से शुरू हो गया है। अगले आठ दिनों तक मंदिरों, उपाश्रयों और घरों में धर्म आराधना की विशेष रौनक रहेगी। इस दौरान उपवास, सामायिक, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय और तप के माध्यम से मन को शांत करने का प्रयास किया जाता है। आठ दिनों की यह साधना 15 सितंबर को संवत्सरी महापर्व के साथ पूरी होगी। वर्ष 2026 के जैन कैलेंडर में भी पर्युषण का आरंभ 8 सितंबर और संवत्सरी 15 सितंबर को बताया गया है।
पर्युषण कब है 2026 में
पर्युषण केवल उपवास का पर्व नहीं है। दरअसल, इन आठ दिनों में व्यक्ति अपने व्यवहार, विचार और बीते समय में हुई गलतियों पर ध्यान देता है। यही वजह है कि इसे जैन धर्म में ‘पर्वाधिराज’ यानी पर्वों का राजा कहा जाता है।
पर्युषण पर्व 2026 कब से कब तक रहेगा
इस साल श्वेतांबर जैन पर्युषण महापर्व मंगलवार, 8 सितंबर से मंगलवार, 15 सितंबर 2026 तक मनाया जाएगा। पर्व का आठवां और अंतिम दिन संवत्सरी के रूप में मनाया जाता है। यह क्षमा मांगने और दूसरों को दिल से क्षमा करने का दिन है।
श्वेतांबर जैन समाज में पर्युषण आठ दिनों तक चलता है। इसके बाद दिगंबर जैन समाज का दस दिवसीय दशलक्षण पर्व मनाया जाता है। दोनों परंपराओं की पूजा पद्धति और अवधि अलग हो सकती है, लेकिन मूल संदेश आत्मशुद्धि, संयम, अहिंसा और क्षमा ही है।
पर्युषण का सही अर्थ क्या है
‘पर्युषण’ का अर्थ है- अपने भीतर ठहरना और आत्मा के करीब लौटना। पूरे साल मनुष्य काम, परिवार, इच्छाओं और उलझनों में व्यस्त रहता है। पर्युषण याद दिलाता है कि कुछ समय अपने कर्मों और स्वभाव को समझने के लिए भी निकालना चाहिए।
यह पर्व हमें यह सोचने का समय देता है कि कहीं हमारी बात, व्यवहार या किसी फैसले से किसी जीव अथवा व्यक्ति को दुख तो नहीं पहुंचा। यहां अहिंसा केवल किसी जीव को शारीरिक कष्ट न देने तक सीमित नहीं है। कटु शब्दों, क्रोध, छल और मन में रखी दुर्भावना को भी हिंसा का ही एक रूप माना जाता है।
आठ दिनों में क्यों किया जाता है आत्ममंथन
पर्युषण के दिनों में पूजा से अधिक जोर आत्मनिरीक्षण पर रहता है। कई श्रद्धालु रोज सामायिक करते हैं। सामायिक का अर्थ है कुछ समय के लिए सांसारिक भागदौड़ से दूर होकर समता के भाव में बैठना।
प्रतिक्रमण भी इस पर्व की प्रमुख साधना है। इसमें दिनभर या बीते समय में हुई भूलों को याद कर उनका प्रायश्चित किया जाता है। जैन मुनियों और साध्वियों के प्रवचन सुने जाते हैं। अनेक स्थानों पर कल्पसूत्र का वाचन होता है, जिसमें तीर्थंकरों और भगवान महावीर के जीवन से जुड़े प्रसंग बताए जाते हैं।
इन दिनों भगवान महावीर के जन्म से जुड़ा वाचन और उत्सव भी विशेष भाव के साथ आयोजित किया जाता है। अलग-अलग संघों में कार्यक्रमों का क्रम स्थानीय परंपरा के अनुसार बदल सकता है।
पर्युषण में क्या नियम रखे जाते हैं
हर व्यक्ति अपनी सेहत, उम्र और सामर्थ्य के अनुसार नियम ले सकता है। किसी के लिए आठ दिन का उपवास संभव होता है, तो कोई एकासना, ब्यासना अथवा केवल कुछ चीजों का त्याग करता है। साधना का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि इच्छाओं पर नियंत्रण सीखना है।
पर्युषण के दौरान सामान्य रूप से इन बातों का ध्यान रखा जाता है:
- भोजन और वाणी में संयम रखा जाता है।
- सूर्यास्त के बाद भोजन करने से बचा जाता है।
- कंद-मूल और अधिक जीव हिंसा वाली वस्तुओं का त्याग किया जाता है।
- पानी छानकर या उबालकर पीने की परंपरा का पालन किया जाता है।
- क्रोध, लोभ, अहंकार और दिखावे से दूर रहने का प्रयास किया जाता है।
- सामायिक, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय और दान के लिए समय निकाला जाता है।
- किसी भी जीव को जानबूझकर कष्ट न पहुंचे, इसका विशेष ध्यान रखा जाता है।
उपवास या कठिन तप करने वाले बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और किसी बीमारी से जूझ रहे लोग अपने चिकित्सक तथा स्थानीय जैन गुरु की सलाह जरूर लें।
संवत्सरी पर क्यों कहा जाता है ‘मिच्छामि दुक्कड़म्’
पर्युषण का अंतिम दिन संवत्सरी सबसे खास माना जाता है। इस दिन वर्षभर में जाने-अनजाने हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगी जाती है। लोग एक-दूसरे से ‘मिच्छामि दुक्कड़म्’ कहते हैं। इसका भाव है- मेरे मन, वचन या कर्म से आपको दुख पहुंचा हो तो मुझे क्षमा करें।
यह केवल बोलने का वाक्य नहीं, बल्कि अपने अहंकार को पीछे छोड़ने की कोशिश है। क्षमा मांगना तभी सार्थक होता है, जब मन में किसी के लिए शिकायत बचाकर न रखी जाए।
