Sheetala Saptami ki Kahani: शीतला सप्तमी की पूजा से पहले पढ़ें ये शीतला माता सप्तमी की कहानी, देखें शीतला सप्तमी की कथा क्या है, यह क्यों मनाते हैं

Sheetala Saptami ki Kahani (शीतला सप्तमी की कथा): चैत्र कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि के दिन पर शीतला सप्तमी का व्रत रखा जाता है। आज शीतला सप्तमी की तिथि पर विधि विधान के साथ माता शीतला के पूजन का महत्व होता है। पूजन, आरती से पहले शीतला सप्तमी की कहानी पढ़ने का महत्व होता है। यहां पढ़ें शीतला सप्तमी की पौराणिक कहानी क्या है, शीतला माता सप्तमी की कथा लिखित में। पढ़ें होली शीतला सप्तमी की व्रत कथा इन हिंदी।

Sheetala Saptami ki Kahani, Sheetla Mata Saptmi ki Vrat Katha in Hindi: हिंदू पंचांग के अनुसार हर साल चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि के दिन पर शीतला सप्तमी का व्रत रखा जाता है। इसके अगले दिन शीतला अष्टमी यानी की बसौड़ा पर्व मनाया जाता है। आज 10 मार्च को शीतला माता सप्तमी है, इस दिन पर मां शीतला का विधि विधान के साथ पूजन होता है और उनको बासी भोजन का भोग लगाया जाता है। धार्मिक दृष्टि से इस दिन का खास महत्व होता है। मान्यताओं के अनुसार माता शीतला की पूजा महामारियों से रक्षा करती है। कहा जाता है कि, जो कोई भी व्यक्ति शीतला सप्तमी पर व्रत रखकर माता शीतला की विधि विधान पूजा करता है उसे चेचक, बुखार, फोड़े-फुंसी और आंखों से जुड़ी समस्याओं से छुटकारा मिल जाता है। शीतला सप्तमी पर व्रत रखने वाले लोग जरूर पढ़ें माता शीतला की ये पौराणिक कथा। माता शीतला की पूजा और आरती करने से पहले शीतला माता सप्तमी की पौराणिक कथा/कहानी का पाठ जरूर ही करना चाहिए। यहां पढ़ें शीतला सप्तमी की कहानी क्या है, शीतला सप्तमी की कथा लिखित में -

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शीतला सप्तमी की कहानी इन हिंदी

पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक समय किसी राज्य के राजा के इकलौते पुत्र को शीतला (चेचक) का रोग हो गया। उसी राज्य में एक गरीब काछी परिवार का लड़का भी इसी बीमारी से पीड़ित था। काछी परिवार आर्थिक रूप से कमजोर जरूर था, लेकिन देवी भगवती का बहुत बड़ा भक्त था। जब उनके बेटे को शीतला हुई, तब भी परिवार ने पूजा-पाठ और नियमों का पालन पूरी श्रद्धा से किया। घर में साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता था। बीमार बच्चे को सादा भोजन दिया जाता था। नमक खाने से परहेज किया जाता था और सब्जी में छौंक भी नहीं लगाया जाता था। घर में तली-भुनी और गर्म चीजें बिल्कुल नहीं बनती थीं।

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