Shab E Barat Par Dua Kaise Mange: शब-ए-बारात इस्लाम धर्म की एक बेहद अहम और बरकतों से भरी रात मानी जाती है। यह रात शाबान महीने की 14वीं और 15वीं तारीख के बीच की रात होती है। साल 2026 में यह 3 फरवरी को है। इस रात को माफी, रहमत और मगफिरत की रात कहा गया है। इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, इस रात अल्लाह तआला अपने बंदों की दुआएं सुनते हैं, गुनाहों को माफ करते हैं और आने वाले साल के फैसले तय होते हैं। इसी वजह से इस रात को इबादत, तौबा और दुआ के लिए बहुत खास माना जाता है।
कैसे करें शब-ए-बारात पर नमाज और दुआ
शब-ए-बारात का मतलब क्या है?
‘शब’ का अर्थ है रात और ‘बारात’ का अर्थ नजात या मुक्ति है। इस तरह शब-ए-बारात का मतलब गुनाहों से मुक्ति की रात हुआ। इस रात लोगों द्वारा अल्लाह से अपने गुनाहों की माफी मांगी जाती है और खुद के लिए,अपने परिवार के लिए और अपने गुजर चुके पूर्वजों के लिए दुआ की जाती है।
शब-ए-बारात की रात क्या है इबादत का तरीका?
शब-ए-बारात की रात कोई अलग या खास फर्ज़ नमाज़ तय नहीं है। इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, इस रात वही इबादत की जाती है जो आम दिनों में की जाती है, लेकिन ज्यादा ध्यान और दिल से की जाती है। इस रात नफ्ल नमाज़ पढ़ी जाती है, कुरान की तिलावत की जाती है, अल्लाह से गुनाहों की माफी मांगी जाती है और दुआ की जाती है। यह जरूरी नहीं है कि पूरी रात जागकर ही इबादत की जाए। इंसान अपनी सहूलियत के हिसाब से इबादत कर सकता है। वहीं, इस रात सहरी करने के बाद फजर की नमाज अदा की जाती है और रोजा भी रखा जाता है। हालांकि रोजा रखना जरूरी नहीं है।
कब्रिस्तान और घर पर रहकर मांगी जाती हैं दुआएं
शब-ए-बारात को लोग कब्रिस्तान में जाते हैं और अपने मरहूम पूर्वजों के लिए अल्लाह से दुआ करते हैं। इस्लामिक परंपराओं में यह माना जाता है कि मरहूमों के लिए दुआ करना बहुत बड़ा सवाब है। कुछ इस्लामिक जानकारों की मानें तो हदीसों में यह बात मिलती है कि पैगंबर हजरत मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) कब्रिस्तान जाया करते थे और वहां दुआ किया करते थे। खासतौर पर यह जिक्र मिलता है कि आप जन्नत-उल-बकी (मदीना का कब्रिस्तान) गए और वहां दुआ की।
हालांकि, इस बात का साफ़ और मजबूत प्रमाण नहीं मिलता कि पैगंबर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने शब-ए-बारात की रात को ही खास तौर पर कब्रिस्तान जाने का हुक्म दिया हो, इसलिए यह कहना सही होगा कि कब्रिस्तान जाना जायज़ है, लेकिन यह फर्ज़ या जरूरी अमल नहीं है। इस कारण इस्लाम के जानकारों का मानना है कि अगर कोई व्यक्ति कब्रिस्तान नहीं जा पाता है, तो वह घर पर रहकर भी अपने पूर्वजों के लिए दुआ कर सकता है। इस्लाम में दुआ के लिए जगह से ज्यादा नियत और दिल की सफाई को अहम माना गया है। इसके लिए नफ्ल नमाज पढ़ें, कुरान की आयतें पढ़ें और हाथ उठाकर अल्लाह से मगफिरत मांगें।
कब्रिस्तान जाकर क्या करना चाहिए?
अगर कोई व्यक्ति शब-ए-बारात को कब्रिस्तान जाता है, तो उसे शांति और अदब के साथ जाना चाहिए। वहां जाकर किसी तरह का शोर-शराबा से बचना चाहिए। कब्रिस्तान में मरहूमों के लिए दुआ की जाती है, उनके लिए मगफिरत मांगी जाती है और अल्लाह से यह दुआ की जाती है कि उन्हें जन्नत में ऊंचा मकाम मिले।
फातिहा और दुआ का सही तरीका
शब-ए-बारात की रात फातिहा पढ़ना भी एक आम परंपरा है। फातिहा का मतलब दुआ का सवाब मरहूमों को पहुंचाना होता है। फातिहा में सूरह फातिहा, आयत-उल-कुर्सी और दूसरी छोटी सूरहें पढ़कर अल्लाह से दुआ की जाती है कि इसका सवाब मरहूमों को अता किया जाए। यह दुआ घर पर बैठकर भी की जा सकती है और कब्रिस्तान में भी कर सकते हैं। यह रात बेहद ही पाक मानी जाती है।
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