Shiv Raksha Stotra (शिव रक्षा स्तोत्र): शिव रक्षा स्तोत्र एक ऐसा स्तोत्र है जिसका पाठ करने वाले भक्तों को भगवान शिव हमेशा सुरक्षित रखते हैं। ये स्तोत्र भक्तों को सभी प्रकार के संकटों, दुखों और नकारात्मक शक्तियों से बचाता है। इस पाठ से मानसिक तनाव, नाकात्मक ऊर्जा का नाश होता है। शिव रक्षा स्तोत्र के नियमित पाठ से चुनौतियों का सामना करने की शक्ति मिलती है। शिव भक्तों को सावन में इसका रोज पाठ करना चाहिए। आप इसे संस्कृत और हिंदी दोनों में पढ़ सकते हैं। यहां शिव रक्षा स्त्रोत संस्कृत में और अर्थ के साथ मौजूद है।
Shiv Raksha Stotram Arth Sahit-
॥ विनियोग ॥
श्री गणेशाय नमः॥
अस्य श्रीशिवरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य याज्ञवल्क्य ऋषिः॥
श्री सदाशिवो देवता॥ अनुष्टुप् छन्दः॥
श्रीसदाशिवप्रीत्यर्थं शिवरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः॥
॥ स्तोत्र पाठ ॥
चरितं देवदेवस्य महादेवस्य पावनम्।
अपारं परमोदारं चतुर्वर्गस्य साधनम्॥1॥
गौरीविनायकोपेतं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रकम्।
शिवं ध्यात्वा दशभुजं शिवरक्षां पठेन्नरः॥2॥
गंगाधरः शिरः पातु भालं अर्धेन्दुशेखरः।
नयने मदनध्वंसी कर्णो सर्पविभूषण॥3॥
घ्राणं पातु पुरारातिः मुखं पातु जगत्पतिः।
जिह्वां वागीश्वरः पातु कंधरां शितिकंधरः॥4॥
श्रीकण्ठः पातु मे कण्ठं स्कन्धौ विश्वधुरन्धरः।
भुजौ भूभारसंहर्ता करौ पातु पिनाकधृक्॥5॥
हृदयं शंकरः पातु जठरं गिरिजापतिः।
नाभिं मृत्युञ्जयः पातु कटी व्याघ्राजिनाम्बरः॥6॥
सक्थिनी पातु दीनार्तशरणागतवत्सलः।
उरू महेश्वरः पातु जानुनी जगदीश्वरः॥7॥
जङ्घे पातु जगत्कर्ता गुल्फौ पातु गणाधिपः।
चरणौ करुणासिंधुः सर्वाङ्गानि सदाशिवः॥8॥
एतां शिवबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्।
स भुक्त्वा सकलान्कामान् शिवसायुज्यमाप्नुयात्॥9॥
ग्रहभूतपिशाचाद्यास्त्रैलोक्ये विचरन्ति ये।
दूरादाशु पलायन्ते शिवनामाभिरक्षणात्॥10॥
अभयङ्करनामेदं कवचं पार्वतीपतेः।
भक्त्या बिभर्ति यः कण्ठे तस्य वश्यं जगत्त्रयम्॥11॥
इमां नारायणः स्वप्ने शिवरक्षां यथाऽऽदिशत्।
प्रातरुत्थाय योगीन्द्रो याज्ञवल्क्यः तथाऽलिखत॥12॥
॥ इति श्रीयाज्ञवल्क्यप्रोक्तं शिवरक्षास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
शिव रक्षा स्त्रोत का अर्थ-
विनियोग – इस शिव रक्षा स्तोत्र मन्त्र के ऋषि याज्ञवल्क्य हैं, देवता श्रीसदाशिव हैं और छन्द अनुष्टुप है, श्री सदाशिव की प्रसन्नता के लिए शिव रक्षा स्तोत्र के जप में इसका विनियोग किया जाता है।
देवाधिदेव महादेव का यह परम पवित्र चरित्र चतुर्वर्ग अर्थात धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि प्रदान करने वाला है, यह अत्यंत उदार है तथा इसकी उदारता का कोई पार नहीं है। ।।1।।
साधक को गौरी और विनायक से युक्त अर्थात साथ हैं, जो त्रिनेत्रधारी तथा पाँच मुख वाले हैं, उन दस-भुजाधारी भगवान शिव का ध्यान करके शिव रक्षा स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। ।।2।।
गंगा को अपने जटाओं में धारण करने वाले गंगाधर शिव मेरे मस्त्क की, अर्धचन्द्र को धारण करने वाले अर्धेन्दुशेखर मेरे ललाट की, मदन अर्थात कामदेव का ध्वंस करने वाले मदनदहन मेरे दोनों नेत्रों की तथा सर्प को आभूषण के रूप में धारण करने वाले सर्पविभूषण शिव मेरे दोनों कानों की रक्षा करें। ।।3।।
त्रिपुरासुर का संहार करने वाले पुराराति मेरे नाक की, संपूर्ण जगत की रक्षा करने वाले जगत्पति मेरे मुख की, वाणी के स्वामी वागीश्वर मेरी जिह्वा की तथा नीलकण्ठ मेरी गर्दन की रक्षा करें। ।।4।।
जिनके कण्ठ में श्री अर्थात सरस्वती निवास करती है, ऐसे श्रीकण्ठ मेरे कण्ठ की, विश्व की धुरी को धारण करने वाले विश्वधुरन्धर शिव मेरे दोनों कन्धों की, पृथ्वी के भारस्वरुप दैत्यादि का संहार करने वाले भूभारसंहर्ता शिव मेरी दोनों भुजाओं की, धनुष धारण करने वाले पिनाकधृक मेरे दोनों हाथों की रक्षा करें। ।।5।।
भगवान शंकर मेरे हृदय की और गिरिजापति मेरे जठरदेश अर्थात पेट की रक्षा करें. भगवान मृत्युंजय मेरी नाभि की रक्षा करें तथा व्याघ्रचर्म को वस्त्ररूप में धारण करने वाले भगवान शिव मेरे कमर की रक्षा करें। ।।6।।
दीन, दुखियों और शरणागतों के प्रेमी – दीनार्तशरणागतवत्सल मेरे समस्त हड्डियों की, महेश्वर मेरे ऊरूओं की तथा जगदीश्वर मेरे घुटनों की रक्षा करें। ।।7।।
जगत्कर्ता मेरे जंघाओं की, गणाधिप दोनों टखनों की, करुणासिन्धु दोनों चरणों की तथा भगवान सदाशिव मेरे सभी अंगों की रक्षा करें। ।।8।।
जो धन्य साधक कल्याणकारिणी शक्ति से युक्त इस शिव रक्षा स्तोत्र का पाठ करता है, वह समस्त कामनाओं का उपभोग कर अन्त में शिव को प्राप्त होता है। ।।9।।
त्रिलोक में जितने ग्रह, भूत, पिशाच आदि विचरण करते हैं, वे सभी इस शिव रक्षा स्तोत्र के पाठ मात्र से ही तत्क्षण दूर भाग जाते हैं। ।।10।।
जो साधक भक्तिपूर्वक पार्वतीपति शंकर के इस “अभयंकर” नामक कवच को कण्ठ में भक्ति के साथ धारण करता है, उसके अधीन ये तीनों लोक हो जाते हैं। ।11।।
भगवान नारायण ने स्वप्न में याज्ञवल्क्य ऋषि को इस “शिव रक्षा स्तोत्र” का जिस प्रकार उपदेश किया, योगीन्द्र मुनि ने प्रात:काल उठकर उसी प्रकार इसे लिख लिया। ।।12।।
