Puri Shankaracharya Nischalanand Saraswati : पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज को कई लोग भगवान शिव का अवतार मानते हैं, लेकिन क्या ये सच है, या सिर्फ एक आस्था का विषय है। इसी प्रश्न का उत्तर आज हम अध्यात्मिक विषयों के जानकार भव्य श्रीवास्तव से जानेंगे। इसके साथ ही यह भी जानेंगे कि असली गुरु की पहचान कैसे करें।
कौन हैं स्वामी निश्चलानंद सरस्वती
कौन हैं पुरी शंकराचार्य?
ओडिशा के पुरी स्थित गोवर्धन मठ के वर्तमान और 145वें शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज हैं। पूरी (ओडिशा) स्थित गोवर्धन मठ के वर्तमान और 145वें शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज हैं। वे अद्वैत वेदांत परंपरा के एक प्रख्यात आध्यात्मिक गुरु, विद्वान और वैदिक गणित के विशेषज्ञ भी हैं। 30 जून 1943 को बिहार के मधुबनी में जन्मे स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने सनातन धर्म, राष्ट्र सुरक्षा और भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए अपना जीवन समर्पित किया है।
पुरी के शंकराचार्य का जीवन बेहद सादा और नियमों से बंधा हुआ है। भव्य श्रीवास्तव ने बताया कि कई साल पहले जब उनके शंकराचार्य जी से भेंट हुई तो उन्होंने उनके पैर छूने चाहे, लेकिन शंकराचार्य जी ने अपने पैर पीछे खींच लिए। इसके बाद एक अन्य मुलाकात में जब उनके पैर छूने की कोशिश की तो भी उन्होंने पैर पीछे खींच लिए। इस पर जब उनसे पूछा कि वो अपने पैर क्यों नहीं छून दे रहे हैं तो उन्होंने बड़ा ही सरल और गहरा जवाब दिया।
खुद को बताया ‘शव’
शंकराचार्य जी ने कहा कि क्या शव को छूते हो। यहां उन्होंने खुद को शव बताया। इसका मतलब यह है कि उनके अंदर किसी भी तरह का राग, द्वेष, मोह या अहंकार नहीं है। वह अपने शरीर और इच्छाओं से ऊपर उठ चुके हैं।
आदिगुरु शंकराचार्य ने कहा था ‘अहम् ब्रह्मास्मि’
शंकराचार्य परंपरा के जनक आदिगुरु शंकराचार्य ने ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ का उपदेश दिया था। उनका कहना था कि आत्मा और परमात्मा एक ही है। बस हमें उसे पहचानने की आवश्यकता है। हमें आत्मा से परमात्मा तक पहुंचना है। यही हमारे जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। इसके अनुसार सिर्फ पुरी के वर्तमान शंकराचार्य ही नहीं हम सभी शिव के ही अंश हैं। बस हमें अपने शरीर रूपी शव से शिव का बोध करना होगा।
बेहद कठिन है शंकराचार्य जी की दिनचर्या
पुरी शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती की दिनचर्या में रोज भगवान चंद्रमौलेश्वर की पूजा करना अनिवार्य होता है। यह पूजा दिन में दो बार की जाती है और इसे बेहद श्रद्धा और नियमों के साथ निभाया जाता है। वे इतनी ज्यादा उम्र होने के बावजूद भी चलने फिरने में किसी का सहारा नहीं लेते हैं। यात्रा भी वे ट्रेन से करते हैं, क्योंकि वे अपने दंड और ईश्वर चंद्रमौलीश्वर को स्कैन नहीं कराना चाहते हैं। फ्लाइट से यात्रा में स्कैनिंग आवश्यक होती है।
क्या शंकराचार्य शिव के अवतार होते हैं?
कई लोगों का मानना है कि शंकराचार्य शिव के अवतार होते हैं। इसका सीधा अर्थ यह नहीं कि वे भगवान का अवतार हैं, बल्कि यह उनकी अवस्था को दर्शाता है। जब कोई व्यक्ति पूरी तरह से राग-द्वेष, मोह-माया से मुक्त होकर समाधि जैसी स्थिति में पहुंच जाता है, तो उसे शिव स्वरूप माना जाता है। शिव का अर्थ ही है—पूर्ण शांति और चेतना। इसलिए जो संत उस अवस्था में पहुंचता है, उसे शिव के समान माना जाता है।
संत क्या होता है?
हिंदू धर्म में संत वह होता है जो व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए। ‘गु’ का मतलब अंधकार और ‘रु’ का मतलब प्रकाश होता है, इसलिए गुरु वह है जो जीवन में सही दिशा दिखाए। संत कोई पद नहीं, बल्कि एक अवस्था है, एक प्रवृत्ति है। यह एक लंबी साधना, तप और अनुभव के बाद प्राप्त होती है। कोई भी व्यक्ति यूं ही संत नहीं बन जाता, इसके पीछे वर्षों की मेहनत और आत्मिक यात्रा होती है। संत का काम सिर्फ प्रवचन देना नहीं होता, बल्कि व्यक्ति के अंदर बदलाव लाना होता है। वह आपके जीवन में ऐसी अनुभूति ला सकता है, जिसकी आपने कल्पना भी न की हो। यही संत की असली पहचान है।
गुरु हमें नहीं मिलता, गुरु हमें ढूंढता है
अक्सर कहा जाता है कि हम गुरु की तलाश करते हैं, लेकिन असल में जब शिष्य तैयार होता है तो गुरु खुद उसे ढूंढ लेता है। इस यात्रा में व्यक्ति कई गुरुओं के पास जाता है, लेकिन जब सही गुरु मिलता है, तब एक अलग ही जुड़ाव बनता है। यह एक आत्मिक पहचान होती है।
आज के समय में क्यों बढ़ गए हैं ‘फैंसी बाबा’?
आज हर व्यक्ति जल्दी सफलता, पैसा और नाम चाहता है। ऐसे में लोग शॉर्टकट खोजने लगते हैं और यहीं से ‘फैंसी बाबा’ या दिखावटी संतों की एंट्री होती है। समाज जैसा चाहता है, वैसा ही उसे मिलता है। अगर लोग चमत्कार और त्वरित समाधान चाहते हैं, तो उसी तरह के गुरु भी सामने आ जाते हैं। आज सोशल मीडिया पर लोकप्रियता को ही लोग संत होने का पैमाना मान लेते हैं, जो पूरी तरह गलत है।
असली संत और नकली में फर्क कैसे करें?
सबसे पहला मानक है—ज्ञान। जो व्यक्ति जिस संप्रदाय से जुड़ा है, क्या वह उसके मूल सिद्धांतों को सही तरीके से समझता है?
दूसरा—जीवनशैली। सच्चा संत सरल होता है, दिखावे से दूर रहता है और मोह-माया में नहीं फंसता।
तीसरा—अहंकार। जहां अहंकार है, वहां संतत्व नहीं हो सकता।
चौथा—अनुभूति। जैसे मंदिर में जाने पर एक अलग भाव आता है, वैसे ही सच्चे संत के पास बैठने से एक सकारात्मक ऊर्जा महसूस होती है।
चमत्कार और सिद्धियां नहीं हैं संत की पहचान
धर्म में चमत्कार का बहुत जिक्र मिलता है, लेकिन यह संत की पहचान नहीं है। पतंजलि योगसूत्र में भी सिद्धियों का उल्लेख है, लेकिन उन्हें बहुत निचले स्तर की उपलब्धि माना गया है। अगर कोई व्यक्ति सिर्फ चमत्कार दिखाकर लोगों को आकर्षित कर रहा है, तो सावधान रहने की जरूरत है।
हर कोई नहीं दे सकता गुरु दीक्षा
गुरु दीक्षा एक गंभीर प्रक्रिया है। हर व्यक्ति गुरु नहीं बन सकता और हर कोई दीक्षा नहीं दे सकता। इसके लिए परंपरा, ज्ञान और अधिकार जरूरी होता है। कई आश्रमों में दीक्षा साल में एक बार दी जाती है और शिष्य की परीक्षा भी ली जाती है, क्योंकि दीक्षा के बाद गुरु और शिष्य के बीच एक कर्मिक संबंध बन जाता है, इसलिए इसे बहुत सोच-समझकर लेना चाहिए।
