मंगल देव की कृपा से खुल सकते हैं भाग्य के द्वार, इन प्राचीन मंदिरों में मिलती है शांति और समाधान

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली के नव ग्रहों में से मंगल को ग्रहों का सेनापति कहा जाता है। इसे भूमिपुत्र भी कहा गया है। इसके साथ ही बता दें कि इसकी प्रकृति काफी गर्म है, इसका सीधा संबंध व्यक्ति के रक्त से होता है। मंगल ग्रह को साहस, ऊर्जा और आत्मविश्वास के साथ जमीन का भी कारक माना गया है। मंगल मेष और वृश्चिक राशि का स्वामी भी है। इसके साथ मंगल मकर राशि में उच्च और कर्क राशि में नीच का माना गया है।

वैदिक ज्योतिष के अनुसार मंगल ग्रह को बहुत ही क्रूर और उग्र ग्रह माना गया है। ऐसे में जातक की कुंडली के पहले, चौथे, सातवें, आठवें और बाहरवें भाव में मंगल अगर बैठे हों तो वह व्यक्ति मांगलिक कहलाता है। ऐसे में जातक की कुंडली में अगर मंगल दोष हो तो उसके विवाह में परेशानियां आती है और संतान प्राप्ति में भी देरी हो सकती है।

India Powerful temples

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कुंडली के पहले भाव से जातक के स्वभाव, सेहत और व्यक्तित्व का संबंध, चतुर्थ भाव से माता, घर, संपत्ति और सुख का संबंध, सप्तम भाव से विवाह, जीवनसाथी का संबंध, अष्टम भाव से मृत्यु, विरासत का संबंध जबकि बारहवें भाव से खर्च और विदेश यात्रा का संबंध होता है।

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