Laxmi Ji Ki Aarti, Chalisa: लाभ पंचमी पर मां लक्ष्मी जी की आरती और चालीसा जरूर पढ़ें

  • Agency by: Agency
  • Updated Oct 29, 2022, 09:53 AM IST

Lakshmi Ji Ki Aarti, Chalisa On Labh Panchami 2022: लाभ पंचमी का दिन मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए खास माना जाता है। ऐसे में इस दिन लक्ष्मी जी की आरती और चालीसा का पाठ जरूर करें।

Laxmi Aarti, Chalisa: दिवाली के बाद लाभ पंचमी का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा होती है। ये दिन बेहद ही शुभ माना जाता है। कहते हैं इस दिन शुभ मुहूर्त में जो व्यक्ति सच्चे मन से मां लक्ष्मी की अराधना करता है उसके जीवन में सुख-समृद्धि की कभी कमी नहीं होती है। ये त्योहार अच्छे भाग्य की कामना के लिए लाभकारी माना गया है। यहां आप देखेंगे लक्ष्मी चालीसा और आरती।

laxmi chalisa

लाभ पंचमी 2022 पर जरूर पढ़ें लक्ष्मी चालीसा और आरती

लक्ष्मी जी की आरती (Laxmi Ji Ki Aarti)

महालक्ष्मी नमस्तुभ्यं,

नमस्तुभ्यं सुरेश्वरि ।

हरि प्रिये नमस्तुभ्यं,

नमस्तुभ्यं दयानिधे ॥

पद्मालये नमस्तुभ्यं,

नमस्तुभ्यं च सर्वदे ।

सर्वभूत हितार्थाय,

वसु सृष्टिं सदा कुरुं ॥

ॐ जय लक्ष्मी माता,

मैया जय लक्ष्मी माता ।

तुमको निसदिन सेवत,

हर विष्णु विधाता ॥

उमा, रमा, ब्रम्हाणी,

तुम ही जग माता ।

सूर्य चद्रंमा ध्यावत,

नारद ऋषि गाता ॥

॥ॐ जय लक्ष्मी माता...॥

दुर्गा रुप निरंजनि,

सुख-संपत्ति दाता ।

जो कोई तुमको ध्याता,

ऋद्धि-सिद्धि धन पाता ॥

॥ॐ जय लक्ष्मी माता...॥

तुम ही पाताल निवासनी,

तुम ही शुभदाता ।

कर्म-प्रभाव-प्रकाशनी,

भव निधि की त्राता ॥

॥ॐ जय लक्ष्मी माता...॥

जिस घर तुम रहती हो,

ताँहि में हैं सद्‍गुण आता ।

सब सभंव हो जाता,

मन नहीं घबराता ॥

॥ॐ जय लक्ष्मी माता...॥

तुम बिन यज्ञ ना होता,

वस्त्र न कोई पाता ।

खान पान का वैभव,

सब तुमसे आता ॥

॥ॐ जय लक्ष्मी माता...॥

शुभ गुण मंदिर सुंदर,

क्षीरोदधि जाता ।

रत्न चतुर्दश तुम बिन,

कोई नहीं पाता ॥

॥ॐ जय लक्ष्मी माता...॥

महालक्ष्मी जी की आरती,

जो कोई नर गाता ।

उँर आंनद समाता,

पाप उतर जाता ॥

॥ॐ जय लक्ष्मी माता...॥

ॐ जय लक्ष्मी माता,

मैया जय लक्ष्मी माता ।

तुमको निसदिन सेवत,

हर विष्णु विधाता ॥

लक्ष्मी चालीसा (Lakshmi Chalisa)

॥ दोहा॥

मातु लक्ष्मी करि कृपा,

करो हृदय में वास ।

मनोकामना सिद्घ करि,

परुवहु मेरी आस ॥

॥ सोरठा॥

यही मोर अरदास,

हाथ जोड़ विनती करुं ।

सब विधि करौ सुवास,

जय जननि जगदंबिका ॥

॥ चौपाई ॥

सिन्धु सुता मैं सुमिरौ तोही ।

ज्ञान बुद्घि विघा दो मोही ॥

तुम समान नहिं कोई उपकारी ।

सब विधि पुरवहु आस हमारी ॥

जय जय जगत जननि जगदम्बा ।

सबकी तुम ही हो अवलम्बा ॥ 1 ॥

तुम ही हो सब घट घट वासी ।

विनती यही हमारी खासी ॥

जगजननी जय सिन्धु कुमारी ।

दीनन की तुम हो हितकारी ॥ 2 ॥

विनवौं नित्य तुमहिं महारानी ।

कृपा करौ जग जननि भवानी ॥

केहि विधि स्तुति करौं तिहारी ।

सुधि लीजै अपराध बिसारी ॥ 3 ॥

कृपा दृष्टि चितववो मम ओरी ।

जगजननी विनती सुन मोरी ॥

ज्ञान बुद्घि जय सुख की दाता ।

संकट हरो हमारी माता ॥ 4 ॥

क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो ।

चौदह रत्न सिन्धु में पायो ॥

चौदह रत्न में तुम सुखरासी ।

सेवा कियो प्रभु बनि दासी ॥ 5 ॥

जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा ।

रुप बदल तहं सेवा कीन्हा ॥

स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा ।

लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा ॥ 6 ॥

तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं ।

सेवा कियो हृदय पुलकाहीं ॥

अपनाया तोहि अन्तर्यामी ।

विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी ॥ 7 ॥

End of Feed