Kota Jagdish Temple: आपने अक्सर लोगों को Sick Leave लेते हुए देखा होगा, लेकिन क्या आपने कभी भगवान को बीमार होते हुए सुना है। जी हां आज हम आपको कोटा राजस्थान के एक मंदिर में निभाई जा रही अनोखी परंपरा के बारे में बताते हैं। जहां भगवान के पट 14 दिन के लिए बंद रखे जाते हैं। राजस्थान के कोटा शहर में स्थित प्राचीन जगदीश मंदिर केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि सदियों पुरानी जीवंत परंपराओं (Unique Temple Rituals) का अद्भुत उदाहरण भी है। यहां हर साल ज्येष्ठ पूर्णिमा के अवसर पर एक ऐसी अनोखी धार्मिक परंपरा निभाई जाती है। जो सुनने वालों को चकित कर देती है। भीषण गर्मी के मौसम में भगवान को 'बीमारी अवकाश' दिया जाता है और मंदिर के पट पूरे 14 दिनों के लिए बंद कर दिए जाते हैं। आइए विस्तार से जानते हैं ये क्या है ये अनोखी धार्मिक परंपरा।
कोटा के मंदिर में निभाई जा रही अनोखी परंपरा
सदियों से चली आ रही परंपरा
करीब 300 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और नियमों के साथ निभाई जा रही है। मान्यता है कि ज्येष्ठ पूर्णिमा पर भगवान को ठंडे जल से स्नान कराया जाता है और उसके बाद आम रस का विशेष भोग अर्पित किया जाता है। माना जाता है कि इस आमरस को पीकर भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं और उन्हें आराम की आवश्यकता पड़ती है। यही कारण है कि मंदिर प्रशासन भगवान के स्वास्थ्य लाभ के लिए उन्हें विश्राम देता है।
विशेष अभिषेक का आयोजन
इस मंदिर में ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा के दिन सुबह से ही विशेष धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन शुरू हो जाता है। इसमें भगवान का 51 जल कलशों और पंचामृत से विधिवत अभिषेक भी किया जाता है। इस दौरान मंदिर परिसर मंत्रोच्चार, भजन-कीर्तन और भक्तों की श्रद्धा से गूंज उठता है।
इस खास अभिषेक के बाद भगवान को लगभग 200 किलो आम रस का भोग लगाया जाता है। लेकिन मान्यता यह भी है कि ठंडे जल से स्नान और आम रस ग्रहण करने के बाद भगवान का स्वास्थ्य बिगड़ जाता है। जिसके बाद रात्रि करीब 9 बजे विशेष पूजा के बाद मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं और इस तरह शुरू भगवान का 14 दिनों का 'विश्राम काल' शुरु होता है। इसके बाद अगले 14 दिन के बाद भगवान के दर्शन भक्तों को होते हैं।
मंदिर परिसर में छा जाती है शांति
इन 14 दिनों के दौरान भगवान के आराम में कोई बाधा न आए, इसके लिए मंदिर में विशेष सावधानियां बरती जाती हैं। जिसमें मंदिर की घंटियों और झालरों को कपड़ों से ढकना शामिल है। ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि किसी तरह की आवाज भगवान के विश्राम में व्यवधान न डाल सके। इस दौरान मंदिर का वातावरण पूरी तरह शांत रहता है।
इन 14 दिनों के दौरान श्रद्धालु भगवान के दर्शन प्रत्यक्ष रूप से नहीं कर पाते हैं, लेकिन मंदिर परिसर में आकर प्रार्थना जरूर करते हैं। पुजारी प्रतिदिन भगवान के स्वास्थ्य की प्रतीकात्मक देखभाल करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान को दूध और काली मिर्च से बना विशेष काढ़ा भी अर्पित किया जाता है, इस तरह उनके स्वास्थ्य लाभ की कामना की जाती है।
दक्षिण भारत से जुड़ा है मंदिर का इतिहास
मंदिर के पुजारी जगन्नाथ बताते हैं कि इस मंदिर की स्थापना दक्षिण भारत से आए महाराज अपलाचारी स्वामी ने की थी। तभी से उनके परिवार की पीढ़ियां मंदिर सेवा से जुड़ी हुई हैं। वर्तमान में एस.के. श्रीनिवास छठी पीढ़ी के रूप में मंदिर की देखरेख कर रहे हैं। उनके जिम्मे मंदिर में पूजा-पाठ, भोग, साफ-सफाई और भजन-कीर्तन जैसी व्यवस्थाओं को संभालना है, जिसके लिए चार लोग नियमित सेवा में लगे हुए हैं। वर्षों पुरानी परंपराओं को पूरी निष्ठा और अनुशासन के साथ निभाया जा रहा है, जो इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता मानी जाती है।
