Kali Chaudas Puja Muhurat : दीपावली से ठीक पहले आने वाली काली चौदस को छोटी दिवाली, नरक चतुर्दशी, रूप चौदस और भूत चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन मां महाकाली, भगवान श्रीकृष्ण, हनुमान जी और यमराज की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, काली चौदस पर पूजा-पाठ और दीपदान करने से नकारात्मकता दूर होती है। वहीं, इस दिन सुबह अभ्यंग स्नान किया जाता है। हालांकि इस साल अभ्यंग स्नान 8 नवंबर को किया जाएगा।
काली चौदस पर पूजा मुहूर्त
इस दिन को नरक चतुर्दशी इस कारण कहा जाता है क्योंकि इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध किया था। गुजरात और पश्चिम भारत के कई हिस्सों में इस दिन मां महाकाली की विशेष पूजा की जाती है, जबकि बंगाल में इसे भूत चतुर्दशी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन घर में दीपक जलाने, यमराज के नाम से दीपदान करने और भगवान की आराधना की जाती है। आइए जानते हैं कि काली चौदस यानी नरक चतुर्दशी के दिन क्या-क्या किया जाता है, पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है और इस पर्व का धार्मिक महत्व क्या है।
काली चौदस पर पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 7 नवंबर 2026 को सुबह 10 बजकर 49 मिनट से शुरू हो रही है। इसका समापन 8 नवंबर 2026 को सुबह 11 बजकर 29 मिनट पर होगा। काली चौदस की रात्रि पूजा 7 नवंबर को की जाएगी।
- काली चौदस: शनिवार, 7 नवंबर 2026
- चतुर्दशी तिथि शुरू: 7 नवंबर, सुबह 10:49 बजे
- चतुर्दशी तिथि समाप्त: 8 नवंबर, सुबह 11:29 बजे
- काली पूजा का शुभ मुहूर्त: 7 नवंबर की रात 11:41 बजे से 8 नवंबर की रात 12:33 बजे तक
- नरक चतुर्दशी का अभ्यंग स्नान: रविवार, 8 नवंबर 2026
काली चौदस यानी नरक चतुर्दशी के दिन क्या-क्या किया जाता है
काली चौदस और नरक चतुर्दशी पर मां महाकाली, भगवान श्रीकृष्ण और यमराज की पूजा की जाती है। इसके अलावा हनुमान जी की आराधना, दीपदान और अभ्यंग स्नान का भी विशेष महत्व है। अलग-अलग राज्यों में इस दिन कुछ खास अनुष्ठान किए जाते हैं।
मां महाकाली की होती है विशेष पूजा
काली चौदस के दिन मां महाकाली की पूजा का विशेष महत्व है। खासतौर पर गुजरात और पश्चिम भारत के कई हिस्सों में इस रात मां काली की आराधना की जाती है। इस दिन मां को लाल फूल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। इसके बाद मां की आरती की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि मां महाकाली की पूजा करने से भय, नकारात्मकता और बुरी शक्तियों से रक्षा होती है। मां काली को शक्ति और दुष्ट शक्तियों का संहार करने वाली देवी माना जाता है। इस दिन पूजा करने से मां भक्तों को साहस, सुरक्षा और परिवार की खुशहाली प्रदान करती हैं।
यमराज के नाम से किया जाता है दीपदान
नरक चतुर्दशी पर यमराज के निमित्त दीपदान किया जाता है। इसे यम दीपदान कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन यमराज के नाम से दीपक जलाने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और परिवार के सदस्यों को लंबी आयु का आशीर्वाद मिलता है। इसके लिए शाम के समय घर के मुख्य द्वार के बाहर दीपक जलाया जाता है। कई जगह चार बातियों वाला दीपक जलाकर दक्षिण दिशा की ओर रखा जाता है। माना जाता है कि यह दीपक भैंस के गोबर से बना हो तो ज्यादा शुभ होता है। दीपक जलाते समय यमराज से परिवार की रक्षा, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-शांति की प्रार्थना की जाती है।
भगवान श्रीकृष्ण की होती है पूजा
नरक चतुर्दशी का संबंध भगवान श्रीकृष्ण से भी है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षस का वध किया था। इस कारण इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है। भक्त उन्हें फूल, तुलसी दल, फल और मिठाई अर्पित करते हैं। इसके बाद प्रभु की आरती की जाती है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने से जीवन से नकारात्मकता दूर होती है और व्यक्ति को बुराइयों के खिलाफ खड़े होने की शक्ति मिलती है। इस दिन नरकासुर वध की कथा भी सुनी जाती है।
हनुमान जी का भी किया जाता है पूजन
काली चौदस के दिन हनुमान जी की पूजा भी की जाती है। उन्हें संकटमोचन और भय दूर करने वाला देवता माना जाता है। भक्त हनुमान मंदिर जाकर दर्शन करते हैं और उन्हें सिंदूर तथा चमेली का तेल अर्पित करते हैं। इस दिन हनुमान चालीसा और सुंदरकांड का पाठ भी किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, हनुमान जी की आराधना से भय और संकटों से लड़ने की शक्ति मिलती है। कई लोग इस दिन अपने परिवार की सुरक्षा और सुख-शांति के लिए विशेष प्रार्थना करते हैं।
8 नवंबर को किया जाएगा अभ्यंग स्नान
नरक चतुर्दशी के दिन अभ्यंग स्नान किया जाता है। इस साल यह स्नान 8 नवंबर 2026 को होगा। इसे रूप चौदस का स्नान भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन तेल लगाकर उबटन से स्नान करने से शरीर की शुद्धि होती है और व्यक्ति को सुंदरता तथा आरोग्य का आशीर्वाद मिलता है। अभ्यंग स्नान के लिए सबसे पहले शरीर पर तिल का तेल लगाया जाता है। इसके बाद उबटन लगाकर स्नान किया जाता है। कुछ क्षेत्रों में अपामार्ग यानी चिरचिटा के पौधे को सिर के ऊपर से घुमाकर स्नान करने का विधान भी है। स्नान के बाद साफ कपड़े पहनकर भगवान श्रीकृष्ण और अपने इष्ट देव की पूजा की जाती है।
घर के बाहर और पूजा स्थल पर जलाए जाते हैं दीपक
छोटी दिवाली के दिन घर की साफ-सफाई करके दीपक जलाए जाते हैं। शाम के समय घर के मुख्य दरवाजे, आंगन, बालकनी, पूजा स्थल और तुलसी के पास दीपक रखे जाते हैं। कई घरों में दीपावली की सजावट भी इसी दिन पूरी की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, दीपक जलाने से घर में शुभता आती है और अंधकार दूर होता है। दीपों की रोशनी को बुराई पर अच्छाई और अंधकार पर प्रकाश की जीत का प्रतीक माना जाता है।
बंगाल में जलाए जाते हैं 14 दीपक
बंगाल में काली चौदस को भूत चतुर्दशी कहा जाता है। इस दिन 14 दीपक जलाए जाते हैं। इसे बंगाली भाषा में 'चौद्दो प्रदीप' कहा जाता है। इन दीपकों को घर के अलग-अलग हिस्सों में रखा जाता है। मान्यता है कि इससे घर की नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है और पूर्वजों का स्मरण किया जाता है। इसके साथ ही बंगाल में 14 तरह की हरी पत्तेदार सब्जियों से बना भोजन भी खाया जाता है। इसे 'चौद्दो शाक' कहा जाता है। इस दिन घर के सदस्यों के लिए इन सब्जियों से विशेष पकवान तैयार किए जाते हैं।
काली चौदस की पूजा कैसे करें? जानें पूरी विधि
काली चौदस पर मां महाकाली की पूजा घर पर भी की जा सकती है। इसके लिए पूजा स्थल की सफाई करके मां की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद इस विधि से पूजा करें।
- सबसे पहले पूजा स्थल को साफ करें और मां महाकाली की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
- मां के सामने घी या तेल का दीपक जलाएं।
- मां को लाल फूल, अक्षत, धूप और फल अर्पित करें।
- अपनी श्रद्धा और पारिवारिक पूजा पद्धति के अनुसार मिठाई या सात्विक भोग लगाएं।
- मां महाकाली का ध्यान करें और परिवार की रक्षा, सुख-शांति तथा साहस की प्रार्थना करें।
- इसके बाद मां की आरती करें और प्रसाद वितरित करें।
विशेष रात्रि पूजा या तांत्रिक अनुष्ठान करने वाले साधक योग्य गुरु या जानकार पुरोहित के मार्गदर्शन में पूजा करते हैं।
नरक चतुर्दशी की पौराणिक कथा क्या है
नरक चतुर्दशी का संबंध भगवान श्रीकृष्ण और नरकासुर की कथा से जुड़ा हुआ है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्राग्ज्योतिषपुर का राजा नरकासुर बहुत अत्याचारी हो गया था। उसने देवताओं को परेशान करने के साथ कई राजाओं को पराजित किया था। उसने 16 हजार से अधिक कन्याओं को बंदी बना लिया था। इसके अलावा उसने देवमाता अदिति के कुंडल भी छीन लिए थे।
नरकासुर के अत्याचारों से परेशान होकर देवताओं ने भगवान श्रीकृष्ण से सहायता मांगी। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ नरकासुर के विरुद्ध युद्ध करने पहुंचे। युद्ध में नरकासुर का वध हुआ और उसके कब्जे में बंदी बनाई गई कन्याओं को मुक्त कराया गया। देवताओं की छीनी हुई वस्तुएं भी वापस दिलाई गईं।
एक प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार, नरकासुर के वध में सत्यभामा ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। युद्ध के दौरान सत्यभामा ने शस्त्र उठाया और नरकासुर का अंत किया। इस घटना को अधर्म और अत्याचार पर धर्म की जीत के रूप में देखा जाता है। मान्यता है कि नरकासुर के अत्याचारों से मुक्ति मिलने की खुशी में लोगों ने दीपक जलाए थे। इसी घटना को नरक चतुर्दशी के पर्व से जोड़कर देखा जाता है। इस दिन दीपक जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाया जाता है।
