सनातन धर्म परंपरा में जो कुछ त्यौहार बड़े स्तर पर मनाए जाते हैं जन्माष्टमी उनमें से एक है। ये त्यौहार देशभर में धूमधाम से मनाया जाता है। भगवान श्री हरि के अवतार श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद माह की अष्टमी तिथि को मथुरा के राजा कंस की कारागार में हुआ था। यही कारण है कि इस दिन को कृष्ण अवतार दिवस के नाम से जाना जाता है। आमतौर पर लोग इसे जन्माष्टमी भी कहते हैं। इस दिन लोग दिन भर व्रत रखते हुए मध्य रात्रि के समय अर्घ्य देकर अपना व्रत पूरा करते हैं। लेकिन क्या आप इस दिन होने वाली माखन-चोरी की परंपरा के बारे में जानते हैं। आइए आज हम आपको भगवान कृष्ण से जुड़ी इस अनोखी लीला के बारे में बताने जा रहे हैं।
माखन-चोरी का कृष्ण लीला से संबंध
पौराणिक कथाओं की मानें तो भगवान श्रीकृष्ण का बचपन माखन-चोरी की बाल लीलाओं से भरा हुआ है। अपने बचपन में वह गोकुल और वृंदावन में अपने मित्रों के साथ मिलकर गोपियों का माखन चुराते और सबके साथ बांटकर खाते थे। इसे बृजवासी लोग शरारत के रूप में नहीं, बल्कि भगवान की बाल-लीला और प्रेम का प्रतीक मानते हैं।
माखन-चोरी और जन्माष्टमी
मक्खन को शुद्धता और सादगी का प्रतीक माना गया है, यही कारण है कि भगवान कृष्ण के भोग की वस्तुओं में माखन को हमेशा शामिल किया जाता है। माखन का भोग यह साफ दिखाता है कि भगवान को केवल प्रेम आधारित साधारण भोग चाहिए न कि महंगे व्यंजन।
कैसे मनाई जाती है माखन-चोरी की परंपरा
जन्माष्टमी के दिन आज भी माखन-चोरी की परंपरा को बखूबी निभाने का चलन चला आ रहा है। इस दिन सभी कृष्ण मंदिरों में माखन और मिश्री का भोग लगाया जाता है। वहीं कई स्थानों पर दही-हांडी प्रतियोगिता भी आयोजित की जाती हैं। जो श्री कृष्ण की माखन-चोरी की लीला का प्रतीक है।
