Jagannath Niladri Bije 2026: ओडिशा के पुरी में भगवान श्रीजगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा का सोमवार, 27 जुलाई 2026 को पवित्र नीलाद्री बीजे अनुष्ठान के साथ समापन हो गया। नौ दिनों तक चले इस भव्य धार्मिक उत्सव के अंतिम दिन लगातार हो रही बारिश भी श्रद्धालुओं की आस्था को नहीं डिगा सकी।
पुरी धाम पहुंचे जगत के नाथ
हजारों नहीं, बल्कि लाखों भक्त बारिश में भीगते हुए भी महाप्रभु जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के अंतिम रथ दर्शन के लिए पुरी पहुंचे। इस दौरान पूरा श्रीक्षेत्र 'जय जगन्नाथ' के जयघोष से गूंजता रहा। ओडिशा में सक्रिय मानसून के कारण पूरे क्षेत्र में भारी वर्षा दर्ज की गई, लेकिन धार्मिक अनुष्ठानों का क्रम परंपरानुसार जारी रहा।
क्या होता है नीलाद्री बीजे
नीलाद्री बीजे रथ यात्रा का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान माना जाता है। इस दिन भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा अपने रथों से उतरकर पुनः श्रीमंदिर के गर्भगृह में विराजमान होते हैं। इसे भगवान के अपने दिव्य धाम में पुनः प्रवेश का उत्सव माना जाता है।
स्कंद पुराण के उत्कल खंड तथा श्रीजगन्नाथ मंदिर की प्राचीन सेवापरंपराओं में इस अनुष्ठान का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यता है कि नीलाद्री बीजे के साथ ही वार्षिक रथ यात्रा का विधिवत समापन होता है।
बारिश भी नहीं रोक सकी आस्था
सोमवार को पुरी और आसपास के क्षेत्रों में दिनभर तेज बारिश होती रही। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने पहले ही ओडिशा में भारी से अत्यधिक भारी वर्षा की चेतावनी जारी की थी। इसके बावजूद श्रद्धालुओं के उत्साह में कोई कमी नहीं आई।
रथों के चारों ओर श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहीं। कई भक्त घंटों तक बारिश में भीगते हुए महाप्रभु के अंतिम दर्शन की प्रतीक्षा करते रहे। भक्तों का मानना है कि रथ यात्रा के समापन पर भगवान के दर्शन करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है और इससे जीवन में सुख, शांति तथा आध्यात्मिक उन्नति का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
नीलाद्री बीजे में क्यों अर्पित किया जाता है रसगुल्ला
नीलाद्री बीजे की सबसे प्रसिद्ध परंपराओं में रसगुल्ला भोग भी शामिल है। लोकपरंपरा के अनुसार जब भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा से लौटते हैं तो माता लक्ष्मी उनसे नाराज रहती हैं, क्योंकि भगवान बिना उन्हें साथ लिए गुंडिचा मंदिर चले गए थे।
मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ माता लक्ष्मी को मनाने के लिए रसगुल्ला अर्पित करते हैं। इसके बाद माता लक्ष्मी प्रसन्न होकर श्रीमंदिर का द्वार खोलती हैं और भगवान का पुनः स्वागत करती हैं। यही कारण है कि नीलाद्री बीजे के अवसर पर रसगुल्ला भोग की विशेष परंपरा निभाई जाती है।
चाक-चौबंद रही सुरक्षा व्यवस्था
लगातार बारिश और भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की थी। श्रीमंदिर और ग्रैंड रोड के आसपास अतिरिक्त पुलिस बल, बैरिकेडिंग, मेडिकल टीम और आपातकालीन सेवाओं की तैनाती की गई। स्वयंसेवक भी श्रद्धालुओं को सुरक्षित दर्शन कराने में लगातार जुटे रहे।
नौ दिनों तक चला भक्ति का महापर्व
इस वर्ष की रथ यात्रा 16 जुलाई को प्रारंभ हुई थी। इसके बाद हेरा पंचमी, बहुदा यात्रा, सुना बेषा, अधर पाना जैसे सभी प्रमुख अनुष्ठान पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुए। अंततः 27 जुलाई को नीलाद्री बीजे के साथ यह नौ दिवसीय महोत्सव पूर्ण हुआ।
