भगवान शिव को देवों का देव महादेव कहा जाता है। सावन का महीना चल रहा है और ये महीना भगवान शिव को प्रसन्न करने का समय होता है। सावन का महीना हमें याद दिलाता है कि ईश्वर को पाने के लिए भारी-भरकम चढ़ावे की जरूरत नहीं, बस एक लोटा जल और एक सच्चा मन चाहिए। भोलेबाबा भक्त के दिखावे को नहीं बल्कि सच्चे भाव और समर्पण को स्वीकार करते हैं। शिव महापुराण में भी यह बताया गया है कि भोलेनाथ को यदि नियम और श्रद्धा के साथ शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं, तो बाबा प्रसन्न होते हैं। यहां से आप जान सकते हैं कि आखिर महादेव सिर्फ एक लोटा जल में क्यों प्रसन्न हो जाते हैं।
सिर्फ जल से ही क्यों होते हैं प्रसन्न महादेव-
इसके पीछे पौराणिक कारण समुद्र मंथन की घटना है। इस दौरान सबसे पहले हलाहल विष निकला था। इसके असर से सारी सृष्टि के नष्ट होने के संकट पैदा हो गया था। तब सबका कल्याण करने के लिए भगवान शिव ने उसे पी लिया, लेकिन अपने गले में ही उसे रोक लिया था।
इस वजह से भोलेनाथ का कंठ नीला हो गया और वे नीलकंठ कहलाए। इस विष के प्रभाव से उन्हें अत्यंत गर्मी और जलन महसूस हो रही थी। वह इसे शांत करने के लिए हिमालय की तरफ बढ़ने लगे और एक जगह बैठकर ध्यान मग्न हो गए। तब देवताओं ने जल से उनका अभिषेक किया।
कहते हैं कि वह समय सावन का था। तभी से भगवान शिव के का सावन के महीने में अभिषेक करने का चलन शुरू हो गया। इसीलिए सावन में कांवड़ यात्रा भी निकाली जाती है। भक्त जब एक लोटा जल चढ़ाते हैं, तो भोलेनाथ के इसलिए प्रसन्न होते हैं क्योंकि इससे उन्हें शीतलता मिलती है।
