Gyarvi Sharif 2026 Date: ग्यारवी शरीफ सूफी परंपरा में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण धार्मिक अवसर है, जिसे हजरत शेख अब्दुल कादिर जीलानी की याद में मनाया जाता है। इसे ग्यारहवीं शरीफ, ग्यारवी शरीफ या ग्यारहवीं शरीफ भी कहा जाता है। यह दिन हिजरी कैलेंडर के रबी अल-आखिर यानी रबीउल आखिर की 11वीं तारीख को मनाया जाता है।
ग्यारवी शरीफ कब है
इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार, भारत में साल 2026 में ग्यारवी शरीफ की तारीख 22 सितंबर 2026, मंगलवार रहने वाली है। हालांकि, चंद्र-दर्शन और स्थानीय हिजरी कैलेंडर के आधार पर तारीख में एक दिन का अंतर संभव है। कुछ अन्य कैलेंडर 11 रबी अल-थानी को 23 सितंबर का भी जिक्र है, लेकिन इसकी तारीख 22 सितंबर होने की ज्यादा उम्मीद है। ग्यारवी शरीफ के दिन कुरआन की तिलावत, फातिहा, जिक्र, दुआ और जरूरतमंदों को खाना खिलाना नेकी माना गया है।। यह हजरत अब्दुल कादिर जीलानी की धार्मिक और सूफी विरासत की याद में मनाया जाता है।
क्यों मनाया जाती है ग्यारहवीं शरीफ
ग्यारवी शरीफ का संबंध सीधे तौर पर हजरत शेख अब्दुल कादिर जीलानी से माना जाता है, जिन्हें सूफी परंपरा में बड़े संत, इस्लामी विद्वान और गौस-ए-आजम के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि अब्दुल कादिर जीलानी का जीवन 11वीं और 12वीं शताब्दी के बीच रहा था। उनका जन्म गीलान क्षेत्र में हुआ और बाद में वे बगदाद पहुंचे, जहां उन्होंने इस्लामी अध्ययन, फिक्ह और धार्मिक शिक्षा हासिल की। वे हनबली विद्वान और प्रभावशाली उपदेशक के रूप में भी जाने गए। उनसे जुड़ी कादिरिया सूफी सिलसिला बाद की सदियों में इस्लामी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में फैला और भारतीय उपमहाद्वीप में भी इसका बड़ा प्रभाव रहा।
ग्यारवी शरीफ का नाम ग्यारवी क्यों पड़ा
‘ग्यारवी’ नाम का संबंध हिजरी महीने की 11वीं तारीख से है। रबी अल-आखिर की 11वीं तारीख को हजरत अब्दुल कादिर जीलानी की याद में होने वाले आयोजन को भारतीय उपमहाद्वीप में ग्यारवी शरीफ कहा जाता है।
सूफी परंपरा में इसे उनके उर्स यानी पुण्यस्मरण दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। वहीं, कई जगहों पर उनके निधन की तारीख 11 रबी अल-थानी, 561 हिजरी बताया जाता है और इसी वजह से इस तारीख का विशेष महत्व माना जाता है।
हालांकि अब्दुल कादिर जीलानी की मृत्यु की ग्रेगोरियन तारीख और अन्य जीवनी संबंधी विवरण अलग-अलग स्रोतों में थोड़े अलग मिलते हैं। इस कारण धार्मिक परंपरा में प्रचलित हिजरी तारीख को यहां मुख्य आधार माना जाता है।
कौन थे हजरत अब्दुल कादिर जीलानी
हजरत अब्दुल कादिर जीलानी इस्लामी इतिहास में एक प्रसिद्ध सुन्नी विद्वान, फकीह, उपदेशक और सूफी संत के रूप में जाने जाते हैं। उनका जीवन बगदाद से गहराई से जुड़ा रहा। वहीं उन्होंने धार्मिक शिक्षा और आध्यात्मिक मार्गदर्शन का काम किया।
उनके नाम से जुड़ा कादिरिया सिलसिला दुनिया के कई हिस्सों में फैला। भारतीय उपमहाद्वीप में भी कादिरी परंपरा से जुड़े खानकाहों और सूफी केंद्रों की लंबी परंपरा रही है। उनकी दरगाह बगदाद में स्थित है और यह स्थान आज भी उनके अनुयायियों के लिए महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल माना जाता है।
कब मनाई जाती है ग्यारवी शरीफ
ग्यारवी शरीफ हर साल रबी अल-आखिर की 11वीं तारीख को मनाई जाती है। इस्लामिक कैलेंडर चंद्रमा पर आधारित होने के कारण इसकी अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख हर साल बदलती रहती है। ऐसी स्थिति में स्थानीय चांद दिखने और संबंधित धार्मिक कैलेंडर के अनुसार अंतिम तारीख देखना जरूरी होता है। यही कारण है कि इस्लामिक त्योहारों की तारीखों में अलग-अलग देशों या क्षेत्रों में कभी-कभी एक दिन का अंतर दिखाई देता है।
ग्यारवी शरीफ पर क्या किया जाता है
इस अवसर पर अलग-अलग इलाकों और परिवारों में अलग परंपराएं देखने को मिलती हैं। आम तौर पर धार्मिक आयोजन में कुरआन की तिलावत, फातिहा, दुआ और जिक्र शामिल होते हैं। कई जगहों पर मस्जिदों, खानकाहों या घरों में धार्मिक महफिल आयोजित की जाती है। हजरत अब्दुल कादिर जीलानी के जीवन और शिक्षाओं का उल्लेख किया जाता है और उनके लिए दुआ की जाती है।
भारतीय उपमहाद्वीप में इसे खास तौर पर ईसाल-ए-सवाब, फातिहा और नयाज जैसी परंपराओं को निभाया जाता है। इसके साथ ही जरूरतमंद लोगों को भोजन कराने और नयाज बांटने की परंपरा भी कई समुदायों में प्रचलित है। यहां ‘सवाब’ से आशय धार्मिक पुण्य से है और ‘ईसाल-ए-सवाब’ का सामान्य अर्थ किसी नेक काम का सवाब मरहूम या किसी धार्मिक शख्सियत की रूह को पहुंचाने की नीयत से करना है।
कुरआनख्वानी और फातिहा का क्या है महत्व
ग्यारवी शरीफ के आयोजनों में कुरआनख्वानी यानी कुरआन की तिलावत की जाती है। इसके बाद दुआ और फातिहा पढ़ी जाती है। यह धार्मिक आयोजन मुख्य रूप से इबादत, दुआ और ईसाल-ए-सवाब से जुड़ा होता है। हालांकि, अलग-अलग सूफी और इस्लामी परंपराओं में इसके तौर-तरीकों में अंतर हो सकता है।
क्या होती है नयाज
ग्यारवी शरीफ से जुड़ी सबसे पहचानी जाने वाली परंपराओं में नयाज या तबर्रुक का वितरण है। इसमें घरों और धार्मिक स्थलों पर भोजन तैयार किया जाता है और दुआ के बाद उसे लोगों में बांटा जाता है। कई स्थानों पर गरीबों और जरूरतमंदों को भोजन कराना इस आयोजन का विशेष हिस्सा होता है।
क्यों खास है बगदाद की दरगाह
हजरत अब्दुल कादिर जीलानी की दरगाह बगदाद में स्थित है। यह उनके नाम से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में से एक है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार उनकी मृत्यु के बाद उनका मकबरा बगदाद में उनकी मदरसा परिसर से जुड़ी जगह पर बनाया गया। समय के साथ यह स्थान एक महत्वपूर्ण जियारत स्थल के रूप में विकसित हुआ।
डिसक्लेमर: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। Times Now Navbharat इसकी पुष्टि नहीं करता है।
