Gaj Grah Katha: श्रीमद्भागवत के आठवें स्कंध में गजेंद्र मोक्ष की कथा है। द्वितीय अध्याय में ग्राह के साथ गजेंद्र के युद्ध का वर्णन है। यदि गजेंद्र मोक्ष का नित्य पाठ ब्रह्म मुहूर्त में किया जाए तो मोक्ष की प्राप्ति होती है। अंत समय में भगवान अपनी स्मृति प्रदान करते हैं। यहां बता दें कि ग्राह अर्थात मगरमच्छ और और गजेंद्र यानि हाथी। श्रीमद्भागवत के चौथे अध्याय में इनके पूर्वजन्म का इतिहास भी दिया गया है। मान्यता के अनुसार गजेंद्र ग्राह कथा को पापों और बुरे स्वप्न का नाशक बताया गया है। यहां पढ़ें इस लीला की कथा।
गज ग्राह लीला कथा
गज ग्राह लीला
द्रविड़ देश में पहले पाण्ड्यराज्य के एक राजा थे इंद्रद्युम्न। वे सदा भगवान के स्मरण और पूजन में ही लगे रहते थे। एक बार वे कुलाचल पर्वत पर मौन होकर वानप्रस्थ आश्रम स्वीकार करके श्रीहरि स्मरण कर रहे थे। उसी समय वहां शिष्यों के साथ ऋषि अगस्त्य जी पधारे। राजा उस समय भगवान के पूजन में लगे थे। तो वो न तो कुछ बोले और न ही उन्होंने उठकर ऋषि का सत्कार किया। ऋषि अगस्त्य को इससे क्रोध आ गया। उन्होंने शाप देते हुए कहा कि यह मूर्ख मतवाले हाथी की भांति बन गया है, ब्राह्मण का यह अपमान करता है, इसे हाथी की योनि ही प्राप्त होगी।
शाप देकर ऋषि अगस्त्य चले गए। उनके शाप के प्राभाव से शरीर छूटने पर राजा क्षीर सागर के मध्य त्रिकूट पर्वत पर हाथी हुए। वे बहुत बलवान थे। उनके भय से वहां व्याघ्र, सिंह भी गुफाओं में छिप जाते थे। एक बार वे गजरात अपने झुंड की हथनियों और बच्चों के साथ वन में घूम रहे थे। धूप लगने पर जब प्यास लगी, तब कमल की गंध सूंघते हुए वह झुंड सहित सरोवर पहुंचे। वह सरोवर बहुत ही विशाल था। उसमें स्वच्छ जल भरा था। कमल खिले थे।
उस सरोवर में महर्षि देवल के शाप से ग्राह (मगरमच्छ) बना हूहू नामक गन्धर्व रहता था। वह ग्राह जलक्रीड़ा करते हुए गजराज के पास चुपके से आया और पैर पकड़कर उन्हें जल में खींचने लगा। गजराज ने चिंग्घाड़ मारी, दूसरे हाथियों ने सहारा देना चाहा। लेकिन ग्राह भी बहुत बलवान था। कभी गजराज उसे किनारे खींचने का प्रयास करते तो कभी ग्राह उन्हें जल में खींचकर ले जाता। धीरे धीरे जल का प्राणी होने के कारण ग्राह गजराज को कमजोर करने लगा। जब गजेंद्र इस युद्ध से बिल्कुल थक गए तब उन्हें लगा अब डूब जाएंगे तब उन्होंने भगवान की शरण लेने का निश्चय किया। पूर्वजन्म की आराधना के प्रभाव से उनकी बुद्धि भगवान में लगी। पास से एक कमल पुष्प तोड़कर सूंड़ में उठाकर वे भगवान की स्तुति करने लगे।
उसकी स्तुति सुनकर भगवान गरुड़ पर बैठे वहां प्रकट हुए। आते ही भगवान ने एक हाथ से गजराज काे ग्राह के सहित जल में से निकालकर पृथ्वी पर रख दिया। अपने चक्र से ग्राह का मुख फाड़कर भगवान ने गजराज को छुड़ाया। भगवान के चक्र से मरकर ग्राह ऋषि के शाप से मुक्त होकर फिर गन्धर्व बन गया। गजराज को भगवान का स्पर्श मिला था। उनके अज्ञान के बंधन तत्काल नष्ट हो गए।
(डिस्क्लेमर: यह पाठ्य सामग्री आम धारणाओं और इंटरनेट पर मौजूद सामग्री के आधार पर लिखी गई है। टाइम्स नाउ नवभारत इसकी पुष्टि नहीं करता है।)
