Dhanteras Kyon Manaya Jaata hai (Dhanteras ki Katha): धनतेरस का नाम आते ही घरों में रौनक बढ़ जाती है। कहीं सोने-चांदी की खरीदारी होती है, तो कहीं नए बर्तन घर लाने की तैयारी। शाम होते ही दीपक जलाए जाते हैं और मां लक्ष्मी के साथ भगवान धन्वंतरि की पूजा होती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि धनतेरस मनाने की शुरुआत कैसे हुई? इस दिन भगवान धन्वंतरि की पूजा क्यों की जाती है और घर के बाहर यमराज के नाम का दीपक क्यों जलाया जाता है?
Dhanteras Vrat Katha: धनतेरस क्यों मनाया जाता है, क्या है इसकी कहानी (AI Image)
धनतेरस से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। इनमें समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि के प्रकट होने और राजा हेम के पुत्र की कथा विशेष रूप से सुनाई जाती है। इन कथाओं में धन, आरोग्य और जीवन की रक्षा का संदेश छिपा है।
समुद्र मंथन से कैसे प्रकट हुए भगवान धन्वंतरि
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक समय देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था। इसका उद्देश्य अमृत प्राप्त करना था। समुद्र मंथन के दौरान कई अनमोल रत्न और दिव्य वस्तुएं निकलीं। इन्हीं में एक थे भगवान धन्वंतरि।
कहा जाता है कि भगवान धन्वंतरि अपने हाथों में अमृत से भरा कलश लेकर समुद्र से प्रकट हुए थे। उन्हें भगवान विष्णु का अवतार और आयुर्वेद का जनक माना जाता है। उनके प्रकट होने की तिथि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी थी। इसी वजह से इस दिन को धनतेरस या धनत्रयोदशी कहा जाने लगा।
मान्यता है कि भगवान धन्वंतरि की पूजा करने से परिवार में अच्छी सेहत और लंबी आयु का आशीर्वाद मिलता है। यही वजह है कि धनतेरस केवल धन और खरीदारी का पर्व नहीं, बल्कि आरोग्य का उत्सव भी है।
राजा हेम के पुत्र की कथा, जिससे जुड़ी है यम दीपदान की परंपरा
धनतेरस की एक और प्रचलित कथा राजा हेम के पुत्र से जुड़ी है। कहा जाता है कि राजा हेम के घर एक पुत्र का जन्म हुआ। जब ज्योतिषियों ने उसकी कुंडली देखी, तो भविष्यवाणी की कि विवाह के चौथे दिन उसकी मृत्यु हो जाएगी।
यह सुनकर राजा बहुत दुखी हुए। उन्होंने अपने बेटे को ऐसी जगह रखने का फैसला किया, जहां किसी स्त्री की परछाईं तक न पड़े। राजकुमार को यमुना नदी के किनारे एक सुरक्षित स्थान पर रखा गया। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।
एक दिन वहां से राजा हंस की बेटी गुजरी। राजकुमार और राजकुमारी एक-दूसरे को पसंद करने लगे। दोनों ने गंधर्व विवाह कर लिया। विवाह के चौथे दिन जब राजकुमार की मृत्यु का समय आया, तो यमदूत उसके प्राण लेने पहुंच गए।
नवविवाहिता का दुख और विलाप देखकर यमदूतों का मन भी पसीज गया। उन्होंने यमराज से पूछा कि क्या मनुष्य को अकाल मृत्यु से बचाने का कोई उपाय है? तब यमराज ने बताया कि जो व्यक्ति कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी की शाम घर के बाहर उनके नाम का दीपक जलाता है, उसके परिवार पर उनकी कृपा बनी रहती है और अकाल मृत्यु का भय दूर होता है।
तभी से धनतेरस की शाम यमराज के नाम का दीपक जलाने की परंपरा प्रचलित हुई। इसे यम दीपदान कहा जाता है।
राजकुमार की पत्नी ने कैसे बचाई अपने पति की जान
इसी कथा का एक दूसरा लोकप्रिय रूप भी सुनाया जाता है। इसमें राजा हेम के पुत्र की शादी के बाद चौथी रात को सांप के काटने से मृत्यु होने की भविष्यवाणी की गई थी। जब राजकुमार की पत्नी को यह बात पता चली, तो उसने अपने पति को बचाने का निश्चय किया। विवाह की चौथी रात उसने पति को सोने नहीं दिया। कमरे के बाहर और अंदर खूब सारे दीपक जलाए। सोने-चांदी के आभूषण और सिक्कों का ढेर दरवाजे पर लगा दिया।
वह पूरी रात अपने पति को कहानियां सुनाती रही और भजन गाती रही। आधी रात को यमराज सांप का रूप लेकर वहां पहुंचे। लेकिन दीपकों की रोशनी और सोने-चांदी की चमक से उनकी आंखें चौंधिया गईं। वह कमरे के अंदर नहीं जा सके।
पूरी रात वहीं बैठे रहे। सुबह होते ही राजकुमार की मृत्यु का समय निकल गया। इस तरह उसकी पत्नी की सूझबूझ और भक्ति से उसके पति के प्राण बच गए। मान्यता है कि इसी घटना की याद में धनतेरस पर यमराज के नाम का दीपक जलाया जाता है।
धनतेरस की कथा से क्या मिलता है संदेश
धनतेरस की ये कथाएं हमें याद दिलाती हैं कि जीवन में धन के साथ सेहत और लंबी आयु का भी उतना ही महत्व है। भगवान धन्वंतरि की पूजा हमें अच्छे स्वास्थ्य का महत्व समझाती है, तो राजा हेम के पुत्र की कथा यह संदेश देती है कि संकट के समय धैर्य, समझदारी और विश्वास बहुत बड़ी ताकत बन सकते हैं।
