Chhath Puja Vrat katha Hindi (छठ पूजा व्रत कथा): छठ पूजा में छठ माता की कथा का विशेष महत्व होता है। 4 दिनों के महापर्व में हर दिन पूजा के बाद छठ माता की कहानी पढ़ी जाती है। आज भी उषा अर्घ्य के बाद छठ माता की कहानी पढ़ी जाएगी। यहां से आप छठ पूजा की व्रत कथा पढ़ सकते हैं। यहां छठ की 4-5 पौराणिक कहानियां बताई गई हैं।
छठ माता की कहानी (pic credit: canva)
प्रियंवद और मालिनी की कहानी
पुराणों के अनुसार, राजा प्रियंवद नामक राजा हुआ करते थे जिनकी कोई संतान नहीं थी। तब महर्षि कश्यप ने पुत्र प्राप्ति के लिए राजा के यहां यज्ञ का आयोजन किया। महर्षि ने यज्ञ आहुति के लिए बनाई गई गई खीर को प्रियंवद की पत्नी मालिनी को खाने के लिए कहा। खीर के प्रभाव से रजा और रानी को पुत्र तो हुआ किन्तु वह मृत था। प्रियंवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी समय भगवान की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं। उन्होंने राजा से कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं। माता ने राजा को अपने पूजन का आदेश दिया और दूसरों को भी यह पूजन करने के लिए प्रेरित करने को कहा। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें शीघ्र ही पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। जिस दिन राजा ने यह व्रत किया था उस दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि थी। तभी से छठी मैय्या के पूजे जाने की परंपरा आरंभ हुई।
कर्ण ने की थी शुरुआत
महाभारत काल में कुंती पुत्र कर्ण को दानवीर माना जाता था। कर्ण सिर्फ माता कुंती के ही नहीं अपितु सूर्य देव के भी पुत्र थे। सूर्य देव की कर्ण पर विशेष कृपा थी। कर्ण नियमित रूप से प्रातः काल उठकर सूर्य देव को अर्घ्य दिया करते थे। तभी से एक पर्व के रूप में सूर्य अर्घ्य की परंपरा का आरंभ हुआ।
इसके अलावा, कुंती और द्रौपदी के भी व्रत रखने का उल्लेख ग्रंथों में मिलता है। ऐसा कहा जाता है कि द्रौपदी के छठ पूजा करने के बाद ही पांडवों को उनका हारा हुआ सारा राजपाट वापस मिल गया था।
श्री राम और माता सीता ने भी रखा था व्रत
रामायण में भी छठ पूजा का वर्णन मिलता है। दरअसल, भगवान राम सूर्यवंशी कुल के राजा थे और उनके आराध्य एवं कुलदेवता सूर्य देव ही थे। इसी कारण से राम राज्य की स्थापना से पूर्व भगवान राम ने माता सीता के साथ कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन छठ पर्व मनाते हुए भगवान सूर्य की पूजा विधि विधान से की थी।
महीपाल की कहानी
हिंदू मान्यता के अनुसार बिन्दुसर तीर्थ में एक महीपाल नाम का वैश्य रहता था, जिसका धर्म और देवी-देवता आदि पर जरा भी विश्वास नहीं था। कहते हैं कि हर समय धर्म का विरोध करने वाले वैश्य ने एक बार सूर्य देवता की मूर्ति के ऐसा घृणित कार्य किया सूर्य देवता ने उस अंधा हो जाने का श्राप दे दिया। आंखों की ज्योति खो देने के बाद उस वैश्य ने इतने दुख झेले कि उसने अंतत: अपना जीवन समाप्त करने की ठान लिया। मान्यता जब वह गंगा नदी में अपने प्राणों का अंत करने जा रहा तभी नारद मुनि ने उन्हें रोकते हुए बताया कि यह कष्ट तुम्हे सूर्य देवता का अपमान करने के कारण मिला है, इसलिए तुम उनकी उपासना करो। मान्यता है कि इसके बाद वैश्य द्वारा विधि-विधान से उनकी पूजा और व्रत रखने के बाद उसके आंखों की दृष्टि लौ आई और उसके सारे कष्ट दूर हो गये।
पांडव की कहानी
लोक आस्था के छठ पर्व को महाभारतकाल से भी जोड़कर देखा जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार जब पांडव जुएं में अपना सारा राजपाट हार कर वन में भटक रहे थे तब उन्हें तमाम तरह के कष्टों से मुक्ति पाने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने द्रौपदी को सूर्य साधना से जुड़ा छठ व्रत करने को कहा था। मान्यता है कि इस व्रत को विधि-विधान करने के बाद पांडवों को अपना खोया वैभव बाद में प्राप्त हुआ।
