Bach Baras Vrat Katha, बछ बारस व्रत कथा, कहानी इन हिंदी : हिंदू पंचांग के अनुसार बछ बारस का व्रत भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को रखा जाता है। यह दिन माताओं के लिए विशेष महत्व रखता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत और पूजा करने से संतान की लंबी उम्र, सुख और समृद्धि कीकामना पूरी होती है। बछ बारस को गोवत्स द्वादशी भी कहा जाता है।
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आज 7 सितंबर को बछ बारस का व्रत रखा जा रहा है। संतान की इच्छा रखने वाली महिलाएं भी इस दिन श्रद्धा से व्रत करती हैं। बछ बारस पर गाय और उसके बछड़े की पूजा करने की परंपरा है। पूजा के साथ महिलाएं बछ बारस की व्रत कथा भी सुनती हैं। धार्मिक मान्यताओं में इस कथा का विशेष महत्व बताया गया है। यहां पढ़ें बछ बारस व्रत कथा, वसु बारस कहानी इन हिंदी।
Bach Baras Vrat Katha In Hindi, बछ बारस व्रत कथा इन हिंदी
बहुत समय पहले की बात है। एक धनवान साहूकार रहता था। उसके सात बेटे थे। एक दिन उसने अपने गांव में एक बड़ा तालाब बनवाने का फैसला किया। तालाब बनकर तैयार हो गया, लेकिन काफी समय बीत जाने के बाद भी उसमें पानी नहीं ठहरा। करीब बारह साल गुजर गए, फिर भी तालाब सूखा ही रहा। साहूकार इस बात से बहुत परेशान हो गया। समस्या का हल जानने के लिए वह कुछ विद्वान पंडितों के पास पहुंचा। उसने उनसे पूछा कि आखिर इतना बड़ा तालाब बनने के बाद भी उसमें पानी क्यों नहीं भर रहा है। पंडितों ने विचार करने के बाद कहा कि तालाब तभी भरेगा, जब साहूकार अपने बड़े बेटे या बड़े पोते की बलि देगा।
साहूकार ने पंडितों की बात मान ली। उसने अपनी बड़ी बहू को कुछ समय के लिए उसके मायके भेज दिया। बड़ी बहू बछ बारस का व्रत और पूजा पूरी श्रद्धा से किया करती थी। उसके पीहर चले जाने के बाद साहूकार ने अपने बड़े पोते की बलि दे दी। इसके बाद अचानक मौसम बदल गया। आसमान में घने बादल छा गए और जोरदार बारिश होने लगी। देखते ही देखते तालाब पानी से लबालब भर गया। तालाब भरने की खुशी में साहूकार ने उसकी पूजा करने की तैयारी शुरू कर दी। पूजा के लिए वह परिवार और गांव के लोगों के साथ तालाब की ओर जाने लगा। घर से निकलते समय उसने अपनी दासी से कहा कि वह गेऊंला-धानुला बनाकर तैयार रखे। संयोग से साहूकार की गाय के बछड़े का नाम भी गेऊंला-धानुला था। दासी ने साहूकार की बात का दूसरा अर्थ समझ लिया और उसने गाय के बछड़े को ही गेऊंला-धानुला समझकर पका दिया।
उधर साहूकार और उसकी पत्नी ढोल-नगाड़ों के साथ तालाब की पूजा करने पहुंचे। उनके साथ गांव के दूसरे लोग भी वहां मौजूद थे। जब साहूकार ने पूजा पूरी कर ली, तो बाकी लोग भी तालाब की पूजा करने लगे। तभी अचानक वही पोता, जिसकी बलि दी गई थी, वहां दिखाई दिया। उसका शरीर गोबर से सना हुआ था। वह साहूकार के पास आया और बोला कि वह भी तालाब में कूदकर पूजा करेगा।
Bach Baras ki kahani kya hai
पोते को जीवित देखकर साहूकार हैरान रह गया। उसने कहा कि उसकी तो बलि दी जा चुकी थी और उसी के बाद तालाब में पानी आया था। फिर उसने इसे गाय माता की कृपा माना और कहा कि गाय ने उसके परिवार की लाज रख ली। अपने बेटे को वापस जीवित देखकर बड़ी बहू भी बेहद खुश हुई। इसके बाद साहूकार खुशी-खुशी घर लौटा। घर पहुंचते ही उसने दासी से गाय के बछड़े के बारे में पूछा। दासी ने बताया कि आपने गेऊंला-धानुला बनाने के लिए कहा था, इसलिए उसने गाय के बच्चे को ही पकाकर तैयार कर दिया।
यह सुनकर साहूकार बहुत दुखी और क्रोधित हुआ। उसने दासी को डांटते हुए कहा कि एक बड़ी विपत्ति से अभी परिवार बाहर निकला ही था और उसने अनजाने में दूसरी गलती कर दी। साहूकार और उसकी पत्नी दोनों चिंता में पड़ गए कि अब गाय के सामने वे क्या जवाब देंगे। साहूकार ने बछड़े के शरीर को एक हांडी में रखकर जमीन में गड्ढा खोदकर दबा दिया। शाम को जब गाय जंगल से वापस आई तो उसे अपना बछड़ा कहीं दिखाई नहीं दिया। वह बेचैनी से उसे ढूंढने लगी और जोर-जोर से रंभाने लगी। इसी दौरान उसकी नजर उस जगह पर पड़ी, जहां हांडी दबाई गई थी।
गाय ने जमीन खोदना शुरू कर दिया। कुछ देर बाद हांडी बाहर निकल आई और उसमें से बछड़ा भी जीवित बाहर आ गया। साहूकार को जब यह बात पता चली तो वह दौड़कर वहां पहुंचा। उसने देखा कि बछड़ा अपनी मां के पास था और बड़े प्यार से गाय का दूध पी रहा था। इस घटना को देखकर साहूकार को गाय की महिमा और बछ बारस के व्रत की श्रद्धा का महत्व समझ आया। उसने पूरे गांव में यह बात कहलवाई कि महिलाओं को श्रद्धा के साथ बछ बारस का व्रत करना चाहिए।
कथा के अंत में महिलाएं बछ बारस माता से प्रार्थना करती हैं, हे बछ बारस माता, जिस तरह आपने साहूकार की बहू के परिवार की रक्षा की और उसकी संतान को जीवन का आशीर्वाद दिया, उसी तरह सभी माताओं के बच्चों पर अपनी कृपा बनाए रखें और उनके जीवन में सुख-समृद्धि लाएं।
