Anant Chaturdashi Vrat Katha In Hindi, अनंत चतुर्थी व्रत कथा, कहानी इन हिंदी: अनंत चतुर्दशी हिंदू धर्म में विशेष धार्मिक महत्व रखने वाला पर्व है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाए जाने वाले इस दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा करने की परंपरा है। इस अवसर पर श्रद्धालु अनंत भगवान को याद करते हैं और हाथ में 14 गांठ वाला अनंत सूत्र बांधते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह सूत्र भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप का प्रतीक माना जाता है।
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आज 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी है, इसी दिन देश के कई हिस्सों में गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन भी किया जाता है, इसलिए यह दिन भक्ति के साथ भावनाओं से भी जुड़ा होता है। अनंत चतुर्दशी की व्रत कथा महाभारत से भी जुड़ी मानी जाती है। कथा के अनुसार वनवास के दौरान युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से अपने संकट दूर करने का उपाय पूछा था। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें अनंत भगवान का व्रत करने की सलाह दी और इससे जुड़ी कथा सुनाई। पढ़ें अनंत चतुर्दशी व्रत कथा, अनंत चतुर्दशी की कहानी क्या है।
अनंत चतुर्दशी व्रत कथा (Anant Chaturdashi Vrat Katha In Hindi)
पौराणिक कथा के अनुसार महाराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ कराया था। यज्ञ मंडप बेहद अद्भुत बनाया गया था। वहां जल और भूमि का अंतर समझ पाना आसान नहीं था। इसी दौरान दुर्योधन वहां पहुंचा और भ्रम के कारण एक स्थान को जमीन समझकर पानी में गिर पड़ा। वहां मौजूद लोगों ने उसका उपहास किया, जिससे उसे बहुत अपमान महसूस हुआ। दुर्योधन के मन में यह बात बैठ गई और उसने पांडवों से बदला लेने का निश्चय कर लिया। इसके बाद जुए का खेल हुआ, जिसमें पांडव अपना राज्य हार गए और उन्हें बारह वर्ष का वनवास तथा एक वर्ष का अज्ञातवास भोगना पड़ा।
वनवास के दौरान पांडवों को कई परेशानियों का सामना करना पड़ा। एक दिन भगवान श्रीकृष्ण उनसे मिलने पहुंचे। युधिष्ठिर ने उनसे अपने दुख और खोए हुए राज्य के बारे में बताया और संकट से निकलने का उपाय पूछा। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें भगवान अनंत का व्रत करने की सलाह दी। इसके बाद उन्होंने अनंत व्रत से जुड़ी कथा सुनाई।
श्रीकृष्ण ने बतलाई अनंत चतुर्दशी की कहानी क्या है
श्रीकृष्ण ने बताया कि पुराने समय में सुमंत नाम के एक ब्राह्मण रहते थे। उनकी पत्नी का नाम दीक्षा था और उनकी एक बेटी थी, जिसका नाम सुशीला था। सुशीला धार्मिक स्वभाव की थी। समय के साथ उसकी मां का निधन हो गया। इसके बाद सुमंत ने कर्कशा नाम की महिला से विवाह किया।
बड़ी होने पर सुशीला का विवाह कौंडिन्य ऋषि से कर दिया गया। विवाह के बाद जब सुशीला अपने पति के साथ विदा हुई, तो उसकी सौतेली मां ने उन्हें कोई खास सामान देने के बजाय ईंट-पत्थर के टुकड़े बांधकर दे दिए। रास्ते में रात होने पर कौंडिन्य ऋषि और सुशीला एक नदी के किनारे रुके। वहां सुशीला ने कुछ महिलाओं को एक विशेष पूजा करते देखा। पूछने पर उसे भगवान अनंत के व्रत के बारे में पता चला।
सुशीला ने भी श्रद्धा से अनंत भगवान की पूजा की और 14 गांठ वाला सूत्र अपने हाथ में बांध लिया। इसके बाद वह अपने पति के पास लौट आई और उन्हें व्रत के बारे में बताया। कौंडिन्य ऋषि को अनंत सूत्र की महत्ता समझ नहीं आई। उन्होंने सुशीला के हाथ से वह डोरा उतार दिया और उसे अग्नि में डाल दिया। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान अनंत का अपमान होने के बाद उनके जीवन में परेशानियां बढ़ने लगीं और उनकी सारी संपत्ति नष्ट हो गई।
जब कौंडिन्य ने इसका कारण पूछा तो सुशीला ने उन्हें अनंत सूत्र जलाने की बात बताई। ऋषि को अपनी गलती का एहसास हुआ। वह भगवान अनंत से क्षमा मांगने के लिए वन की ओर निकल पड़े। कई दिनों तक भटकने के बाद वह बेहद निराश हो गए। तभी भगवान अनंत ने उन्हें दर्शन दिए। उन्होंने कहा कि कौंडिन्य ने पहले उनका तिरस्कार किया था, इसी कारण उन्हें कष्ट झेलना पड़ा। लेकिन पश्चाताप करने से भगवान प्रसन्न हुए। भगवान अनंत ने उन्हें घर लौटकर विधि-विधान से व्रत करने की सलाह दी। मान्यता है कि कौंडिन्य ने 14 वर्षों तक यह व्रत किया और उनके जीवन के दुख दूर हो गए।
श्रीकृष्ण की सलाह के अनुसार युधिष्ठिर ने भी भगवान अनंत का व्रत किया। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसके बाद पांडवों को अपना खोया हुआ राज्य वापस मिला और उन्होंने महाभारत के युद्ध में विजय प्राप्त की। अनंत चतुर्दशी की यह कथा श्रद्धा, पश्चाताप और विश्वास का संदेश देती है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा करने और अनंत सूत्र धारण करने से भक्त को भगवान का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
