विश्व डाक दिवस: खतों में आज भी महकता है प्यार, आखिर क्यों फोन के मैसेज नहीं दे पाते चिट्ठियों जैसा सुकून

मैसेजिंग वाले दौर में अपनों से बात करना आसान तो हुआ है, लेकिन हाथ से लिखे खतों का एहसास आज भी अलग है। विश्व डाक दिवस पर जानिए क्यों चिट्ठियां केवल संदेश नहीं, बल्कि यादों और भावनाओं की अनमोल निशानी हैं।

एक समय था, जब डाकिया गली में आता था, तो कई लोग अपने दरवाजे पर नजरें टिकाए रहते थे। किसी को बेटे की चिट्ठी का इंतजार होता था, तो कोई अपने दूर बैठे पति का प्यार और फिक्र कागज के टुकड़े में खोजती थी। लिफाफा हाथ में आते ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती थी। लिफाफे पर लिखे नाम को देखकर ही दिल में हलचल होने लगती थी। खत खोलते समय मन में उत्सुकता रहती थी कि आखिर सामने वाले ने क्या लिखा होगा। कई लोग चिट्ठियों को बार-बार पढ़ते थे, फिर उन्हें मोड़कर किसी किताब, डायरी या अलमारी में संभालकर रख देते थे। वक्त गुजर जाता था, लेकिन उन कागजों पर लिखे शब्दों का जादू बना रहता था।

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