साइकिल और स्त्री: बदलाव की सबसे सरल लेकिन सबसे सशक्त कहानी

World Bicycle Day: हर साल की तरह इस साल भी 3 जून यानी आज दुनियाभर में विश्व साइकिल दिवस मनाया जा रहा है। साइकिल दुनिया के सबसे उपयोगी अविष्कारों में से एक मानी जाती है। इस साइकिल ने ना सिर्फ दुनिया को रफ्तार दी बल्कि महिलाओं की सपनों को उड़ान भी दी है। वर्ल्ड साइकल डे पर आइए समझते हैं कि कैसे लड़कियों के संघर्ष में गुमनाम नायिका बनी यह साइकिल।

भारत जैसे देश में महिलाओं की तरक्की हमेशा से सामाजिक और आर्थिक बाधाओं से टकराती रही हैं। लेकिन हर बार धरती की आधी आबादी ने अपने लिए रास्ते खोज निकाले हैं। महिलाओं ने साबित किया है कि कोई भी बाधा या रुकावट उनके हौसलों की उड़ान को कम नहीं कर सकते। उनके इस हौसले को कई बार दूसरी चीजों का सहारा भी मिला है। ऐसी ही एक चीज है साइकिल। साइकिल कहने को तो एक साधाराण सा यातायात साधन है लेकिन जब आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि यह साइकिल भारत समेत दुनियाभर में महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता, स्वतंत्रता और सशक्तिकरण का प्रतीक बन चुकी है।

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साइकिल और स्त्री: बदलाव की सबसे सरल लेकिन सबसे सशक्त कहानी

भारतीय महिलाएं और साइकिल

साइकिल से सपनों की उड़ान

साइकिल का आविष्कार 19वीं सदी के अंत में हुआ। 20वीं सदी के अंत तक इस साइकिल में भारत के ग्रामीण महिलाओं और लड़कियों की जिंदगी में एंट्री मारी। यह एंट्री ऐसी रही कि सामाजिक रुढियों को टूटने में वक्त ना लगा। यही साइकिल थी जिसने लड़कियों को घर की चारदीवारी से निकाल स्कूल तक पहुंचाने में बड़ा किरदार निभाया। गांव देहात की लड़कियां भी पढ़ने लगीं। दरअसल कई गांवों में स्कूल या कॉलेज दूर होते थे। पब्लिक ट्रांसपोर्ट सीमित होते थे। बहुत सी लड़कियां बसों में असुरक्षित महसूस करती थीं। साइकिल ने लड़कियों को सुरक्षित और किफायती तरीके से स्कूल पहुंचाने का मौका दिया।

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