Rabindranath Tagore: रवींद्रनाथ टैगोर भारतीय साहित्य का सबसे बड़ा नाम माने जाते हैं। साल 1913 में उन्हें साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। नोबेल पुरस्कार पाने वाले वह पहले गैर-यूरोपीय और पहले भारतीय बने थे। रवींद्रनाथ टैगोर की रचनाएं हर समय काल और परिस्थिति पर सटीक बैठती थीं। आज भी उनकी रचनाओं को खूब पढ़ा और सुना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार उनकी किस रचना के लिए मिला था?
रबींद्र नाथ टैगोर को नोबेल पुरस्कार क्यों मिला था (Photo: AI Image)
रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित गीतांजलि क्या है?
10 दिसंबर 1913 को रवींद्रनाथ टैगोर को साहित्य का नोबेल पुरस्कार उनकी अमर कृति गीतांजलि के लिए मिला था। गीतांजलि बांग्ला में लिखी कविताओं का एक संग्रह है। गीतांजलि दो शब्दों से मिलकर बनी है। गीत और अंजलि। इसका मतलब होता है 'गीतों का उपहार' है। गीतांजलि प्रेम, भक्ति और परमात्मा के साथ एकाकार होने की भावना से भरी एक आध्यात्मिक और रहस्यवादी रचना है, जिसे टैगोर ने बाद में अंग्रेजी में 'Song Offerings' के रूप में अनुवादित किया और इसने विश्व साहित्य में भारत की पहचान बनाई।
गीतांजलि का सारांश क्या है?
गीतांजलि का ईश्वर की भक्ति पर रचित है। रवींद्रनाथ टैगोर की गीतांजलि के भारतीय दार्शनिक पहलुओं और भक्ति की अवधारणा पर केंद्रित है। गीतांजलि ईश्वर की सर्वव्यापी उपस्थिति पर बल देती है। यह अपने पाठकों को अनंत से रूबरू कराती है। गीतांजलि में लिखी कविताओं का अनुवाद डॉ. डोमन साहु 'समीर' ने किया है। विशेष यह है कि इस किताब में लिखी प्रत्येक कविता एक स्वर लिए हुए है जिसे आप अपनी धुन में गा भी सकते हैं।
गीतांजलि में कुल कितनी कविताएं हैं?
गीतांजलि में कविताओं की संख्या उसके संस्करण पर निर्भर करती है; मूल बंगाली संस्करण में 157 कविताएं हैं, जबकि टैगोर के अंग्रेजी अनुवाद Song Offerings में 103 कविताएं हैं, जो मूल बंगाली संग्रह से चुनी गई हैं।
गीतांजलि की कुछ खास कविताएं:
1. मेरा मस्तक अपनी चरण्ढूल तले नत कर दो
मेरा सारा अहंकार मेरे अश्रुजल में डुबो दो।
अपने मिथ्या गौरव की रक्षा करता
मैं अपना ही अपमान करता रहा,
अपने ही घेरे का चक्कर काट-काट
मैं प्रतिपल बेदम बेकल होता रहा,
मेरा सारा अहंकार मेरे अश्रुजल में डुबो दो।
अपने कामों में मैं अपने प्रचार से रहूँ दूर
मेरे जीवन द्वारा तुम अपनी इच्छा पूरी करो, हे पूर्ण!
मैं याचक हूँ तुम्हारी चरम शांति का
अपने प्राणों में तुम्हारी परम कांति का,
अपने हृदय-कमल दल में ओट मुझे दे दो,
मेरा सारा अहंकार मेरे अश्रुजल में डुबो दो।
2. मैं अनेक वासनाओं को चाहता हूँ प्राणपण से
उनसे वंचित कर मुझे बचा लिया तुमने।
संचित कर रखूंगा तुम्हारी यह निष्ठुर कृपा
जीवन भर अपने।
बिना चाहे तुमने दिया है जो दान
दीप्त उससे गगन, तन-मन-प्राण,
दिन-प्रतिदिन तुमने ग्रहण किया मुझ को
उस महादान के योग्य बनाकर
इच्छा के अतिरेक जाल से बचाकर मुझे।
मैं भूल-भटक कर, कभी पथ पर बढ़ कर
आगे चला गया तुम्हारे संघान में
दृष्टि-पथ से दूर निकल कर।
हाँ, मैं समझ गया, यह भी है तुम्हारी दया
उस मिलन की चाह में, इसलिए लौटा देते हो मुझे
यह जीवन पूर्ण कर ही गहोगे
अपने मिलने के योग्य बना कर
अधूरी चाह के संकट से
मुझे बचा कर।
3. कितने अनजानों से तुमने करा दिय मेरा परिचय
कितने पराए घरों में दिया मुझे आश्रय।
बंधु, तुम दूर को पास
और परायों को कर लेते हो अपना।
अपना पुराना घर छोड़ निकलता हूँ जब
चिंता में बेहाल कि पता नहीं क्या हो अब,
हर नवीन में तुम्हीं पुरातन
यह बात भूल जाता हूँ।
बंधु, तुम दूर को पास
और परायों को कर लेते हो अपना।
जीवन-मरण में, अखिल भुवन में
मुझे जब भी जहाँ गहोगे,
ओ, चिरजनम के परिचित प्रिय!
तुम्हीं सबसे मिलाओगे।
कोई नहीं पराया तुम्हें जान लेने पर
नहीं कोई मनाही, नहीं कोई डर
सबको साथ मिला कर जाग रहे तुम-
मैं तुम्हें देख पाऊँ निरन्तर।
बंधु, तुम दूर को पास
और परायों को कर लेते हो अपना।
