Firaq Gorakhpuri: फ़िराक़ गोरखपुरी सिर्फ एक नाम नहीं थे। उन्हें लोग हिंदुस्तानी तहजीब का प्रतीक मानते थे। अधूरे इश्क वाले फिराक ऐसे मुकम्मल शायर थे जिन्होंने उर्दू शायरी की फिज़ा में नई रोशनी भरी, नई सोच दी और एक पूरा दौर अपने अंदाज़ से संवार दिया। फिराक का जन्म रघुपति सहाय नाम से उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुआ था। उन्होंने अंग्रेजी में एम.ए. किया और आई.सी.एस. भी चुने गए, लेकिन महात्मा गांधी के आह्वान पर आज़ादी की लड़ाई में शामिल होकर नौकरी छोड़ दी।
फिराक गोरखपुरी
शायरी की मांग के सिंदूर थे फिराक
फिराक की शायरी में प्रेम, सौंदर्य, विरह और इंसानी जज्बातों की गहराई देखने को मिलती है। फिराक ने उर्दू ग़ज़ल को एक नई शैली और सौंदर्यबोध दिया। उनकी भाषा में एक खास किस्म की नर्मी और हिंदुस्तानी मिट्टी की खुशबू है। वह फिराक ही थे जिन्होंने उर्दू को हिंदू-मुस्लिम एकता का पुल बनाया। फ़िराक़ के बारे में जोश मलीहाबादी ने अपनी किताब ‘यादों की बारात’ में तो यहां तक लिखा है कि वे शायरी की मांग का संदल और उर्दू ज़ुबान की आबरू हैं।
फिराक: उर्दू ज़ुबान की आबरू
फ़िराक़ शायर के साथ चिंतक भी थे। फ़िराक़ गोरखपुरी महसूस करते थे कि उर्दू अदब ने अभी तक औरत की कल्पना को जन्म नहीं दिया। उर्दू ज़बान में शकुन्तला, सावित्री और सीता नहीं। जब तक उर्दू अदब देवीयत को नहीं अपनाएगा उसमें हिन्दोस्तान का तत्व शामिल नहीं होगा वह हिंदुस्तान की रूह को नहीं छू पाएगा। लेकिन महिलाओं को शायरी तक में तवज्जो देने वाले फिराक अपनी पत्नी के साथ इतने बेरहम हो गए थे कि अपना मनपसंद अचार ना पाकर पत्नी को उलटे पैर वापस मायके भेज दिया था। आइए डालते हैं उस किस्से पर एक नजर:
धोखे की शादी से टूट गए थे फिराक
फिराक गोरखपुरी की पत्नी का नाम किशोरी देवी थी। फिराक चाहते थे कि वह किसी पढ़ी लिखी लड़की से शादी करें। लेकिन उनके ही एक रिश्तेदार ने उनकी शादी अनपढ़ किशोरी से करा दी। फिराक बुरी तरह से टूट गए। फिराक ने शादी तो नहीं तोड़ी लेकिन किशोरी संग कभी दिल नहीं जोड़ पाए।
जब फ़िराक़ गोरखपुरी ने अपनी पत्नी को वापस भेज दिया मायके
शादीशुदा जीवन में बीतते समय के साथ एक दौर ऐसा भी आया जब फ़िराक़ अपनी पत्नी किशोरी देवी के लिए थोड़े बेरहम भी हो चले। एक बार तो उन्होंने मनपसंद अचार ना मिलने के कारण किशोरी देवी को वापस मायके भेज दिया था। रमेश चंद्र द्विवेदी की किताब ‘फ़िराक़ साहब’ इस बात की तस्दीक करती है।
किताब से पता चलता है कि एक बार किशोरी देवी अपने मायके से बिना फ़िराक़ की पसंद का अचार लिए वापस चली आई थीं। वह जैसे ही सिर पर टोकरी लिए घर में पहुंचीं, फ़िराक़ ने अपने अचार को लेकर सवाल किया। जवाब में पता चला वो अचार नहीं लायी हैं। फ़िराक़ ने सिर टोकरी नीचे भी नहीं रखने दिया और अचार लाने वापस भेज दिया।
फ़िराक़ गोरखपुरी ने लोकप्रियता और प्रसिद्धि की उन बुलंदियों को छुआ जहां पहुंचने का ख्वाह लगभग हर शायर देखता है। हालांकि सफलता के शीर्ष पर पहुंचने के बावजूद फ़िराक़ की निजी जिंदगी में प्रेम का हिसाब अधूरा रहा। बावजूद इसके फ़िराक़ ने प्रेम और सौंदर्य पर जो नज्में लिखीं वो हमेशा के लिए अमर हैं।
कम से कम मौत से ऐसी मुझे उम्मीद नहीं
ज़िंदगी तू ने तो धोके पे दिया है धोका
फ़िराक़ गोरखपुरी के जीवन में प्रेम को लेकर जो एक खालीपन था उसे उनकी इस शायरी में साफ महसूस किया जा सकता है।
