जब जहाज के डर से मुफ्त में हज कर आए बिस्मिल्ला खां, सरकार को माननी पड़ी थी उस्ताद की शर्त

विदेश जाने के लिए जब उस्ताद पर दबाव बढ़ा, तो उन्होंने सरकारी अधिकारियों से साफ शब्दों में कहा - पहले मुझे हज कराइए। उसके बाद मैं जहाज में बैठूंगा।

आज शहनाई के सबसे बड़े उस्ताद की पुण्य तिथि है। भारत रत्न से सम्मानित उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को दुनिया छोडे़ आज पूरे 20 साल हो गए। उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के लिए ताउम्र संगीत, सुर और इबादत में कभी कोई फर्क ना रहा। वो एक तरफ देवी सरस्वती के सच्चे उपासक थे, मंदिरों में पूरी आस्था से शहनाई बजाते थे और गंगा मैया से बेपनाह मोहब्बत करते थे, तो दूसरी तरफ पाबंदी से पांचों वक्त की नमाज पढ़ते, जकात देते और हज की रवायत निभाते थे।

Bismillah Khan

जब जहाज में बैठने की बात पर उसताद को याद आया हज (AI Generated Image)

उनके लिए सुर और शहनाई ही खुदा की सच्ची इबादत का सामान थे। जब वो शहनाई की तान छेड़ते, तो संगीत के उस रूहानी आलम में अकसर नमाज का वक्त भी भूल जाते थे। उनका अटूट विश्वास था कि अगर संगीत में असर है, तो वह दुनिया की किसी भी नमाज या दुआ से बड़ा जरिया है। मजहब की सीमाओं से परे बिस्मिल्लाह खां अपने आप में भारतीय संस्कृति के गंगा-जमुनी तहजीब की सबसे खूबसूरत मिसाल थे, हैं और हमेशा रहेंगे।

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