आज शहनाई के सबसे बड़े उस्ताद की पुण्य तिथि है। भारत रत्न से सम्मानित उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को दुनिया छोडे़ आज पूरे 20 साल हो गए। उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के लिए ताउम्र संगीत, सुर और इबादत में कभी कोई फर्क ना रहा। वो एक तरफ देवी सरस्वती के सच्चे उपासक थे, मंदिरों में पूरी आस्था से शहनाई बजाते थे और गंगा मैया से बेपनाह मोहब्बत करते थे, तो दूसरी तरफ पाबंदी से पांचों वक्त की नमाज पढ़ते, जकात देते और हज की रवायत निभाते थे।
जब जहाज में बैठने की बात पर उसताद को याद आया हज (AI Generated Image)
उनके लिए सुर और शहनाई ही खुदा की सच्ची इबादत का सामान थे। जब वो शहनाई की तान छेड़ते, तो संगीत के उस रूहानी आलम में अकसर नमाज का वक्त भी भूल जाते थे। उनका अटूट विश्वास था कि अगर संगीत में असर है, तो वह दुनिया की किसी भी नमाज या दुआ से बड़ा जरिया है। मजहब की सीमाओं से परे बिस्मिल्लाह खां अपने आप में भारतीय संस्कृति के गंगा-जमुनी तहजीब की सबसे खूबसूरत मिसाल थे, हैं और हमेशा रहेंगे।
जब जहाज के डर से हज कर आए उस्ताद
उस्ताद पर मां सरस्वती की ऐसी कृपा थी कि आज भी शहनाई का नाम लेते ही बरबस बिस्मिल्ला खां याद आ जाते हैं। उन्होंने शहनाई को दुनिया के सबसे बड़े मंचों तक पहुंचाया। वैसे एक समय ऐसा भी था जब वह हवाई जहाज में बैठने से डरते थे। फिर एडिनबरा फेस्टिवल का न्योता आया। उन्होंने सरकार के सामने एक शर्त रखी- पहले मुझे हज कराइए, फिर मैं जहाज से उस कार्यक्रम में जाऊंगा।
साल था 1966। स्कॉटलैंड के मशहूर एडिनबरा इंटरनेशनल फेस्टिवल से भारत के लिए निमंत्रण आया। दुनिया चाहती थी कि उस्ताद बिस्मिल्ला खां अपनी शहनाई लेकर वहां पहुंचें। भारत सरकार भी चाहती थी कि वह जाएं, लेकिन एक समस्या थी। उस्ताद तैयार नहीं थे। कारण ना तो राजनीतिक था और ना ही पैसों का। मुद्दा था- हवाई जहाज।
जिस आदमी ने अपनी शहनाई से लाखों लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया था, वह आसमान में उड़ने से डरता था। जी हां, बनारस की तंग गलियों में जीने और गंगा की गोद में पलने वाले उस्ताद बिस्मिल्ला खां हवाई सफर से डरते थे।
इस बात को संगीत इतिहासकार जी. एन. जोशी ने अपनी किताब डाउन मेलोडी लेन (Down Melody Lane) में भी दर्ज किया है। उन्होंने लिखा कि विदेश जाने के लिए जब उस्ताद पर दबाव बढ़ा, तो उन्होंने एक ऐसी शर्त रखी, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। उन्होंने सरकारी अधिकारियों से साफ शब्दों में कहा - पहले मुझे हज कराइए। उसके बाद मैं जहाज में बैठूंगा।
सरकार ने उनकी बात मान ली। बिस्मिल्ला खां का हज हुआ और उसके बाद उस्ताद ने अपनी पहली हवाई उड़ान भरी। यहां से उनका विदेशी धरती पर शहनाई का जादू बिखेरना का सफर शुरू हुआ।
उस्ताद ने क्यों रखी थी हज की शर्त?
आपके मन में भी ये सवाल उठ रहा होगा कि आखिर उस्ताद बिस्मिल्ला खां ने सरकार से हज जाने की शर्त क्यों रखी। जी. एन. जोशी के अनुसार, उस्ताद की ये शर्त महज धार्मिक नहीं थी। वो उनके मनोवैज्ञानिक संबल का आधार भी था। उन्हें लगा कि अगर वह इस बड़ी यात्रा से पहले अपनी आध्यात्मिक जिम्मेदारी पूरी कर लेंगे, तो शायद डर भी कम हो जाएगा। सरकार ने व्यवस्था की तो उनका हज भी पूरा हुआ और फिर वह जहाज में भी बैठे।
जब विदेश में पहली बार बजी बनारसी शहनाई
एडिनबरा इंटरनेशनल फेस्टिवल भारतीय शास्त्रीय संगीत के लिए बड़ी उपलब्धि था। वहां बिस्मिल्ला खां ने अपनी शहनाई से समां बांध दिया। वो बजाते रहे और लोग उसमें डूबकर सुनते रहे। पश्चिमी दुनिया पहली बार शहनाई की असली ताकत से रूबरू हुई। उसके बाद तो यूरोप, अमेरिका और अफ्रीका जैसे देशों से भी उस्ताद का बुलावा आने लगा।
आज आपको ये बातें भले सामान्य लगें, लेकिन उस दौर में में शहनाई को पूरी दुनिया में पहचान दिलाना आसान नहीं था। दरअसल बिस्मिल्ला खां से पहले खुद भारत में ही इसे वो सम्मान हासिल नहीं था। यहां शहनाई को सिर्फ शादी-ब्याह में बजाया जाने वाला बाजा ही समझा जाता था। ये उस्ताद बिस्मिल्ला खां ही थे जिन्होंने इसे शास्त्रीय संगीत के सबसे सम्मानित मंच तक पहुंचाया।
हमेशा लौटकर काशी ही आए
देश-दुनिया में उन्हें खूब प्यार मिला। प्यार के साथ लोगों की तालियां मिलीं। सम्मान और ईनाम भी मिले। वो चाहते तो दुनिया के किसी भी कोने में सुकून की जिंदगी जी सकते थे। वहीं बस सकते थे। लेकिन हर बार उन्होंने बनारस को चुना। दुनिया के किसी भी कोने में वो गए, हर बार सीधे बनारस लौटे।
उस्ताद के लिए क्यों आसान नहीं था बनारस छोड़ना
बिस्मिल्ला खां की आधिकारिक जीवनी लिखने वालीं नीरजा पोद्दार Bismillah Khan: The Shehnai Maestro में लिखती हैं कि उस्ताद के लिए दुनिया का सबसे बड़ा शहर भी बनारस से बड़ा नहीं हो सकता था। यह शहर उनकी संगीत साधना का आधार भी था और विस्तार भी। बिस्मिल्ला खां ने संगीत को मजहब की सीमाओं में कभी नहीं बांधा। वह पांच वक्त के नमाजी मुसलमान थे, लेकिन रोज गंगा में स्नान के साथ ही काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में रियाज भी किया करते।
वैसे तो उनका जन्म 1916 में बिहार के डुमरांव में हुआ था, लेकिन तीन साल की उम्र में वह बनारस आ गए। उनके मामा और गुरु अली बख्श ‘विलायतु’ काशी विश्वनाथ मंदिर के नौबतखाने में शहनाई बजाते थे। यहीं से संगीत की दुनिया में उन्होंने कदम रखा। वह सुबह गंगा किनारे रियाज करते, दोपहर मंदिर जाते और शाम को बनारस की गलियों में बतकही करते। यही उनकी दुनिया थी।
बिस्मिल्ला खां हमेशा कहते कि गंगा की पानी मेरे सुरों की जान है। यही वजह थी कि विदेश जाने का विचार उन्हें सहज नहीं लगता था। दुनिया बुलाती रही, लेकिन उस्ताद टालते रहे। बता दें कि 1966 में एडिनबरा से पहले भी उनके पास विदेशों से निमंत्रण आते रहे, लेकिन वह हर बार कोई न कोई बहाना बना देते।
उन्हें हवा में उड़ने से डर लगता था। वो जहाज का नाम सुनते ही असहज हो जाया करते। हालांकि इन सबसे अलग एक दूसरी वजह ये थी कि वह बनारस से ज्यादा समय के लिए दूर नहीं रह सकते थे। BBC की रिपोर्ट की मानें तो अमेरिका ने उन्हें अपने यहां बसने का प्रस्ताव दिया था। उस्ताद ने ये कहते हुए अमेरिकी प्रस्ताव ठुकरा दिया था कि वहां सारे सुख सुविधा तो दे दोगे, लेकिन क्या मेरी गंगा वहां दे पाओगे।
बड़ा उस्ताद, छोटा भाई
जी. एन. जोशी अपनी किताब में लिखते हैं बिस्मिल्ला खां अपने अंतिम दिनों तक परिवार के 60-70 लोगों की जिम्मेदारी उठाते रहे। इन जिम्मेदारियों ने भी बिस्मिल्ला खां से उनकी शहनाई को कभी जुदा ना होने दिया। वो परिवार का कितना सम्मान करते थे इसका एक छोटा सा किस्सा किताब डाउन मेलोडी लेन में भी मिलता है।
किताब में जोशी लिखते हैं कि जब बिस्मिल्ला खां अपने बड़े भाई शम्सुद्दीन के साथ शहनाई बजाते, तो जानबूझकर खुद को थोड़ा पीछे रखते थे। हमेशा उनके भाई की शहनाई लोगों को सुनाई देती। एक बार किसी ने उनसे पूछ लिया कि वो ऐसा क्यों करते हैं। बिस्मिल्ला खां ने जवाब दिया- वो मेरे बड़े भाई हैं, मैं उनसे आगे कैसे निकल सकता हूं। ये वो बिस्मिल्ला खां थे जिसे दुनिया उस्ताद कहती, लेकिन वह परिवार के बड़ों के सामने हमेशा छोटे ही बने रहे।
..और आखिर उस्ताद से छूट गया बनारस
90 साल की मुकम्मल जिंदगी जी कर शहनाई के सबसे बड़े उस्ताद बिस्मिल्ला खां ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। 21 अगस्त 2006 को उन्होंने अंतिम सांस ली। उस दिन बिस्मिल्ला खां से बनारस हमेशा के लिए छूट गया। वो हमेशा कहते कि अगर अगर मुझसे बनारस छूटा, तो मेरी शहनाई के सुर भी गायब हो जाएंगे। आखिरकार बनारस भी छूटा और उनकी शहनाई भी शांत हो गई।
