आप दुनिया के किसी भी कोने में चले जाएं, चाहे वह लंदन हो, न्यूयॉर्क हो या टोक्यो, अगर वहां कोई भारतीय रेस्तरां है तो उसके मेन्यू में 'करी' शब्द जरूर मिल जाएगा? यहां तक कि मशहूर कॉमेडियन ट्रेवर नोआ ने भी अपने एक पॉडकास्ट में यह माना कि जब वे भारत आए थे, तो वे भी यहां की हर ग्रेवी वाली डिश को करी ही समझ बैठते थे। हालांकि जब उन्होंने एक फेमस इंडियन शेफ अस्मा खान से बात की, तो उन्हें समझ आया कि भारत में हर डिश का अपना एक अलग नाम और इतिहास है। इसके साथ ही 'करी' नाम की कोई अकेली चीज इस देश में एक्सिस्ट ही नहीं करती।
जानिए करी शब्द पर क्यों छिड़ा है विवाद?
अब सवाल यह उठता है कि क्या हर रसीली या मसालेदार भारतीय डिश को 'करी' कह देना सही है या यह हमारी समृद्ध खान-पान की विविधता के साथ एक अन्याय है? इसी बात पर इन दिनों सोशल मीडिया पर बहस छिड़ी है।
आखिर कहां से आया यह 'करी' शब्द?
इस दिलचस्प बहस की जड़ें औपनिवेशिक काल, जिसे कोलोनियल एरा कहा जाता है, से जुड़ी है। फूड एक्सपर्ट्स और शेफ्स के मुताबिक, 'करी' (Curry) शब्द की उत्पत्ति असल में तमिल भाषा के शब्द 'करी' (Kari) से हुई थी। इसका मतलब चावल के साथ खाई जाने वाली कोई चटनी या रसीली चीज होता है। पुर्तगाली इसे 'कारिल' (Caril) कहकर पुकारने लगे। इसके बाद जब ब्रिटिश लोग भारत आए, तो उन्होंने यहां के अलग-अलग मसालों और ग्रेवी वाले व्यंजनों को आपस में मिला-तोलकर एक आसान सा नाम दे दिया'करी' (Curry)।
फूड ऑथर और शेफ सदाफ हुसैन, इन दिनों भारत की 100 प्रसिद्ध और कम लोकप्रिय करी पर एक किताब लिख रहे हैं। उनका दावा है कि अंग्रेजों ने भारत के इस विशाल और जटिल खान-पान को आसान बनाने के लिए हर उस डिश पर 'करी' का ठप्पा लगा दिया जिसमें थोड़ा भी शोरबा या रसा होता था। ब्रिटिश काल की कुकबुक्स और कमर्शियल 'करी पाउडर' ने इस सोच को पूरी दुनिया में फैला दिया कि भारत का मतलब सिर्फ तीखे मसाले और एक ही तरह का करी पाउडर है।
हर डिश को एक ही नाम देना क्यों है गलत?
समस्या तब शुरू होती है जब 'करी' का यह अंब्रेला टर्म हर स्थानीय पहचान को लील जाता है। जरा सोचिए, बंगाल की प्रसिद्ध शॉर्शे माछ जिसका स्वाद सरसों के तीखेपन और अनूठे फ्लेवर से आता है, क्या उसकी तुलना कश्मीर की धीमी आंच पर पकाई जाने वाली निहारी से की जा सकती है? इसी तरह गुजरात की खट्टी-मीठी कढ़ी का बेस पूरी तरह से दही और बेसन पर टिका होता है।
इन तीनों डिशेज का न तो मसाला एक है, न पकाने का तरीका और न ही इनका कोई दूर-दूर तक का इतिहास एक जैसा है। इन सबके बावजूद अगर आप इन सबको सिर्फ एक शब्द 'करी' के नीचे समेट देते हैं, तो आप उनके साथ आने वाली सदियों पुरानी संस्कृति और मेहनत की तौहीन कर रहे होते हैं। भारत जैसे विविधता से भरे देश में हर व्यंजन की अपनी एक अस्मिता है, जिसे सिर्फ एक नाम से फ्लैट कर देना सही नहीं है।
क्या 'करी' शब्द का इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए?
इसका जवाब इतना आसान नहीं है। मान लीजिए कोई विदेशी पर्यटक पहली बार भारतीय रेस्तरां में आया है। उसे शॉशे माछ या कढ़ी के बारे में कुछ पता नहीं। ऐसे में मेन्यू पर ‘बंगाली मस्टर्ड फिश करी’ लिखा हो, तो उसे अंदाजा लग सकता है कि यह सरसों के स्वाद वाली मछली की डिश है। साथ में ‘शॉर्शे माछ’ नाम भी दिया जाए, तो वह पकवान की असली पहचान जान सकता है।
‘करी’ जैसे परिचित शब्द को हटाने के बजाय उसके साथ पकवान का असली नाम, उसका क्षेत्र और खासियत बताई जा सकती है। इससे नए लोगों के लिए खाना समझना आसान होगा और स्थानीय पहचान भी बनी रहेगी। यह ठीक वैसा ही है जैसे हम 'ब्रेड' शब्द का इस्तेमाल रोटी, पाव और शीरमाल सबके लिए करते हैं, लेकिन अंदर के उनके नाम और वैरायटी अलग-अलग होते हैं।
यानी समस्या शब्द में उतनी नहीं है, जितनी उसे इस्तेमाल करने के तरीके में है। किसी चीज को समझाने के लिए सरल नाम देना ठीक है, लेकिन उस नाम के चक्कर में उसकी असली पहचान मिटा देना ठीक नहीं।
विदेशों में कैसे बदल गए 'करी' के मायने?
यह भी एक दिलचस्प सच है कि उपनिवेशवाद के दौर से निकलकर 'करी' शब्द ने विदेशों में अपनी एक अलग पहचान बना ली है। जब भारतीय प्रवासी दुनिया के अलग-अलग कोनों में गए, तो उन्होंने वहां की स्थानीय सामग्री के हिसाब से अपने व्यंजनों को ढाल लिया। आज ब्रिटिश करी, जापानी करी या कैरिबियन करी का अपना एक अलग इतिहास और फैन बेस है।
इसलिए इस बहस को सिर्फ सही या गलत के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। विदेशों में या एक ब्रॉड कैटेगरी के रूप में यह शब्द उपयोगी हो सकता है, बशर्ते यह भारत के स्थानीय व्यंजनों के असली नामों की जगह न ले ले।
असली पहचान बचाए रखने की ओर एक कदम
अंत में बात वहीं आकर टिकती है कि नाम में क्या रखा है वाली बात यहां लागू नहीं होती। नाम में ही तो सब कुछ रखा है। जब हम किसी डिश को उसके मूल नाम से पहचानते हैं, तो हम उस राज्य की संस्कृति, वहां के मसालों की खुशबू और वहां की माटी की महक को आगे बढ़ा रहे होते हैं।
दरअसल भारत में खाने का मतलब सिर्फ पेट भरना नहीं है। हर इलाके की अपनी सामग्री, मसाले, पकाने का तरीका और स्वाद है। कहीं सरसों की तीखी खुशबू है, कहीं दही की खटास, कहीं नारियल का स्वाद तो कहीं घंटों धीमी आंच पर पकने वाले मांस का गहरा जायका। ऐसे में इन सबको एक ही शब्द में समेट देना क्या इनके साथ नाइंसाफी नहीं है?
फूड एक्सपर्ट्स का भी यही कहना है कि शब्द को रखिए, लेकिन उसके साथ उसकी पूरी डिटेल, उसका इतिहास और उसका असली नाम भी जोड़िए। तभी हमारी पाक कलाका असली सम्मान होगा और आने वाली पीढ़ियां जान सकेंगी कि हमारी थाली में जो जादू परोसा गया है।
