Swara Bhaskar on Jauhar, History: इतिहास की कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, जिनका जिक्र होते ही भावनाएं तेज हो जाती हैं। जौहर भी ऐसी ही एक ऐतिहासिक प्रथा है। राजपूत इतिहास और युद्धों की कहानियों में इसका जिक्र मिलता है। हाल ही में अभिनेत्री Swara Bhaskar के जौहर से जुड़े कथित बयान को लेकर सोशल मीडिया पर बहस और ट्रोलिंग देखने को मिली। स्वरा ने दिल्ली के एक कार्यक्रम में फिल्म ‘पद्मावत’ रिलीज होने के कई साल बाद उसके जौहर वाला दृश्य पर उस समय लिखे अपने एक ओपन पत्र के बारे में बात की, जिसके बाद सोशल मीडिया पर उन्हें ट्रोल किया जा रहा है।
स्वरा भास्कर ने जौहर पर क्या कहा
स्वरा ने कहा कि फिल्म में महिलाओं को जौहर करते दिखाने से उन्हें यह सवाल परेशान करता था कि इससे यौन हिंसा झेल चुकी महिलाओं को क्या संदेश जाता है। उनका तर्क था कि किसी महिला के साथ यौन हिंसा होना उसकी जिंदगी का अंत नहीं होना चाहिए।
उनकी इसी बात पर सोशल मीडिया पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ लोगों ने कहा कि जौहर को आज के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि उस समय युद्ध और बंदी बनाए जाने का खतरा अलग तरह का था। हालांकि, कुछ लोगों ने स्वरा की इस चिंता का समर्थन भी किया कि ऐतिहासिक आत्मदाह को केवल वीरता या सम्मान के रूप में दिखाना आज के समाज के लिए सवाल खड़े कर सकता है।
हालांकि इस बयान के बाद स्वरा ने सफाई देते हुए कहा कि, उन्होंने रानी पद्मावती या जौहर करने वाली महिलाओं को कायर नहीं कहा था। उनके अनुसार, उनकी आपत्ति उस दृश्य के संदेश से थी और उनकी बात को गलत तरीके से पेश किया गया।
जौहर का मतलब क्या है?
इतिहास में जौहर को ऐसी सामूहिक आत्मदाह की प्रथा के रूप में बताया गया है, जिसका संबंध मुख्य रूप से युद्ध के समय राजपूत महिलाओं से जोड़ा जाता है। जब किसी किले की हार लगभग तय मानी जाती थी और महिलाओं के बंदी बनाए जाने, हिंसा या गुलामी का डर होता था, तब कुछ समुदायों में महिलाओं द्वारा सामूहिक रूप से आग में प्रवेश करने की परंपरा का उल्लेख मिलता है।
यह सामान्य समय में किया जाने वाला कोई धार्मिक त्योहार या रोजमर्रा की परंपरा नहीं थी। इसके संदर्भ युद्ध और हार की स्थिति से जुड़े मिलते हैं। कई ऐतिहासिक विवरणों में पुरुषों के अंतिम युद्ध के लिए निकलने और महिलाओं के जौहर करने का जिक्र साथ-साथ मिलता है। पुरुषों की उस अंतिम लड़ाई को कई संदर्भों में ‘साका’ कहा गया है। यही वजह है कि जौहर को सिर्फ आत्महत्या कहकर छोड़ देना भी इतिहास की पूरी परिस्थिति को नहीं बताता। उस समय युद्ध, सत्ता, किले की घेराबंदी और बंदी बनाए जाने का खतरा इसके संदर्भ का हिस्सा था।
आज के दौर से बहुत अलग थी परिस्थिति
मध्यकालीन युद्धों की परिस्थितियां आज से बहुत अलग थीं। किसी किले पर कब्जा होने के बाद वहां रहने वाले लोगों के साथ क्या होगा, इसकी कोई आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था नहीं थी। महिलाओं के बंदी बनाए जाने, हिंसा का शिकार होने या जीवन भर गुलाम बनाए जाने का डर ऐतिहासिक संदर्भों में मिलता है। जो सब आज की परिस्थिति से बहुत अलग है। इसलिए ही जौहर को सिर्फ 'आत्मदाह' कह देना गलत है।
जौहर को वीरता से क्यों जोड़ा गया
यहीं से कहानी थोड़ी पेचीदा हो जाती है। समय बीतने के साथ ऐतिहासिक घटनाएं सिर्फ दस्तावेजों में नहीं रहतीं। वे लोककथाओं, गीतों, कविताओं और पारिवारिक स्मृतियों का हिस्सा भी बन जाती हैं। जौहर की घटनाओं को सम्मान, साहस और आत्मबलिदान की भावना के साथ याद किया जाता है। खासकर राजपूत इतिहास की कथाओं में इसे अपने सम्मान की रक्षा से जोड़ा गया। इस नजरिए से देखने वाले लोगों के लिए जौहर सिर्फ मृत्यु की घटना नहीं बल्कि उस समय की सामाजिक सोच में सम्मान बचाने का आखिरी कदम था। और बेशक ही इस तरह का कदम उठाना वीरता का ही प्रतीक है।
महिलाओं के लिए युद्ध क्या था?
आधुनिक नजरिए से महिलाओं के सम्मान और जीने के अधिकार को लेकर कई सवाल खड़े होते हैं। और स्वरा भास्कर की टिप्पणी भी इसी से जुड़ी हुई थी। लेकिन जौहर को आज की परिस्थितियों से जोड़कर देखना कई स्तरों पर गलत हो सकता है।
जौहर की चर्चा करते समय हम अक्सर राजा, सेना, किला और युद्ध की बात करते हैं। लेकिन यह सोचना भी जरूरी है कि, उस किले के भीतर रहने वाली महिलाओं के लिए युद्ध का मतलब क्या था? उस दौर की महिलाओं के लिए युद्ध का जुड़ाव उनकी जिंदगी, परिवार, बच्चे, भविष्य और जिंदगी भर गुलाबी के डर से था।
जौहर इतिहास का एक कठिन और संवेदनशील अध्याय है, जिसे समझने के लिए उस दौर के युद्ध, सामाजिक व्यवस्था, महिलाओं की स्थिति और उनकी सुरक्षा से जुड़ी परिस्थितियों को साथ देखना जरूरी है। आज आत्मदाह या आत्महत्या को किसी समस्या का समाधान नहीं माना जा सकता, लेकिन अतीत की घटनाओं को केवल आज के नजरिए से देखकर आपत्तिजनक या गलत ठहरा देना भी इतिहास को अधूरा समझना होगा। बेहतर यही है कि जौहर को भावनाओं से नहीं, बल्कि उसके समय, परिस्थितियों और सामाजिक संदर्भ को समझते हुए देखा जाए।
