Sudha Chandran Mata Ki chowki Video Explained: हाल ही में एक्ट्रेस सुधा चंद्रन के घर आयोजित माता की चौकी के वीडियो वायरल हो रहे हैं। इनमें से कुछ वीडियो में सुधा चंद्रन जहां भजन पर परफॉर्म करती नजर आ रही हैं, वहीं एक वीडियो में उनके रिएक्शन बिल्कुल काबू में नहीं हैं। सबसे ज्यादा जो वीडियो शेयर किया गया है, उनमें सीनियर एक्ट्रेस सुधा चंद्रन एकदम कंट्रोल से बाहर हैं। यहां तक कि उनको जो व्यक्ति संभाल रहे हैं, वह उनको लगभग काटने का प्रयास कर रही हैं। वीडियो देखने वालों का कहना है कि वह इस बात पर रिएक्शन दे रही हैं कि उनको पकड़ा न जाए।
सुधा चंद्रन के वीडियो पर रिएक्शन
सुधा चंद्रन का वीडियो देख कोई शॉक्ड है तो कई लोग इस पर विश्वास नहीं कर पा रहे हैं। हालांकि इसे नाटक बताने वालों की भी कमी नहीं है। लेकिन ऐसे सीन हम सभी ने अक्सर माता की चौकी या जागरण के दौरान देखे हैं जिसे आम भाषा में 'माता आना' कहा जाता है। कांतारा फिल्म में इसी तरह ही देवी का आना दिखाया गया है।
यहां सवाल वही पुराना है कि आखिर ऐसा होता क्यों है? क्या वाकई किसी पर देवी-देवता की शक्ति आ जाती है या फिर यह मन और दिमाग की एक खास अवस्था होती है?
कंतारा फिल्म में भी दिखा था 'माता आना'
लोग इसे माता आना क्यों कहते हैं?
भारत में खासतौर पर माता की चौकी या जागरण में ऐसा अक्सर देखने में आता है। भक्त अचानक रोने लगते हैं, हंसने लगते हैं, लोटने लगते बेकाबू होकर नाचते हैं या इधर उधर भागते हैं। ऐसी स्थिति में उन पर काबू पाना बहुत मुश्किल होता है। कई बार उनमें कोई दौरा पड़ने जैसे बॉडी रिएक्शंस भी दिखते हैं जैसे कि आंखें बड़ी होना, होंठ अटक जाना या मुठ्ठियां भींच लेना या फिर एक ही जगह पर स्थिर होकर बैठ जाना। ऐसे रिएक्शंस चौंकाते भी हैं, डराते भी हैं, आस्था का हिस्सा भी लगते हैं और वैज्ञानिक दृष्टि से सोचने वालों के मन में सवाल भी उठाते हैं।
क्या है 'माता आने' का अध्यात्मिक दृष्टिकोण
इस तरह 'माता आना' भक्त के समर्पण का प्रतीक है। पूजा के पूरे पीक पर जब कोई भक्त उसमें लीन होता है तो इस तरह की स्थिति बन जाती है। पंडित सुजीत जी महाराज के अनुसार, जब कोई साधक पूरी निष्ठा और निस्वार्थ भाव से अपने इष्ट को जीवन समर्पित कर देता है, तो उस देवी-देवता की ऊर्जा भक्त के भीतर प्रवाहित होने लगती है। वह कहते हैं कि गीता के अध्याय 18/66 में परम ब्रम्ह कृष्ण ने सब कुछ त्यागकर शरणागति की बात की है में भी पूर्ण शरणागति की बात कही गई है, जहां व्यक्ति खुद को ईश्वर के हवाले कर देता है। ऐसी स्थिति में भक्त माध्यम बन जाता है और उसके शब्द या भाव संदेश जैसे प्रतीत हो सकते हैं। यह कोई सामान्य अवस्था नहीं, बल्कि भक्ति की सर्वोच्च स्थिति मानी जाती है, जो लंबे समय की साधना और एकांत तप से आती है।
'माता आने' को साइंस में कहते हैं डिसोसिएटिव एपिसोड
विज्ञान 'माता आने' को किस तरह देखता है
तेज संगीत, भावनात्मक माहौल, पुरानी यादें या अंदरूनी तनाव, ये सब मिलकर दिमाग को एक ट्रान्स-जैसी अवस्था में ले जा सकते हैं। हालांकि आम धारणा के ठीक उलट साइकियाट्रिस्ट इसे किसी मानसिक बीमारी या कमजोरी का संकेत नहीं मानते हैं। यह बस उस माहौल में खुद को बहाने का क्षण होता है। अमृता अस्पताल फरीदाबाद की कंसल्टेंट साइकियाट्रिस्ट डॉ. मीनाक्षी जैन के अनुसार, ऐसे व्यवहार को मानसिक स्वास्थ्य के नजरिए से डिसोसिएटिव एपिसोड कहा जाता है। इसमें व्यक्ति कुछ समय के लिए बाहरी बहाव या कारणों की वजह से अपने व्यवहार, भावनाओं और चेतना पर नियंत्रण खो देता है। इसमें कोई हिंसा या जानबूझकर किया गया व्यवहार नहीं होता।
धार्मिक आयोजनों में ट्रान्स जैसी अवस्था क्यों बन जाती है
कोकिलाबेन धीरुभाई अंबानी हॉस्पिटल, इंदौर के कंसल्टेंट साइकियाट्रिस्ट डॉ. वैभव चतुर्वेदी बताते हैं कि भजन की लय, भीड़ की ऊर्जा और धार्मिक प्रतीक सब मिलकर उस समय के लिए मस्तिष्क की उत्तेजना बढ़ा देते हैं। इस दौरान तर्क पीछे चला जाता है और भावनाएं बहुत तीव्र हो जाती हैं। जब किसी व्यक्ति की आस्था गहरी होती है और जीवन में तनाव या भावनात्मक बोझ भी जुड़ा हो, तो आत्म-नियंत्रण ढीला पड़ सकता है। व्यक्ति इसे पूरी तरह ईश्वर को समर्पित होना महसूस करता है। विज्ञान इसे बदली हुई चेतना की अवस्था या ट्रांस कहता है, जबकि आस्था इसे देवी-शक्ति का अनुभव यानी 'माता आना' मानती है।
'माता आना' सामाजिक और सांस्कृतिक भाषा क्यों बन गई है?
भारतीय समाज में 'माता आना' एक सांस्कृतिक भाषा है, जिसके जरिए लोग अपने दबे हुए दुख, डर या आनंद को स्वीकार्य रूप में बाहर ला पाते हैं। भीड़ भी इसे पवित्र अनुभव मानकर सहारा देती है जैसा कि सुधा चंद्रन के वीडियो में देखने को मिला। कुछ लोगों के लिए यह अनुभव भावनात्मक शुद्धि और मानसिक हल्कापन भी लेकर आता है, जिसे वे जीवन बदलने वाला मानते हैं।
हालांकि सच यह भी है कि 'माता क्यों आती है'के सवाल का कोई एक जवाब नहीं है। आस्था इसे देवी-कृपा मानती है, विज्ञान इसे मन और मस्तिष्क की प्रतिक्रिया कहता है। दोनों ही दृष्टिकोण अपने-अपने संदर्भ में सही हो सकते हैं। लेकिन समस्या तब होती है जब ऐसे पलों को मजाक, ट्रोलिंग या सनसनीखेज खबर बना दिया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे मामलों में संवेदनशीलता, समझ और सम्मान सबसे जरूरी है।
